World Over + 1 Lakh Readership

Vol. No. 140

March, 2012

We wish all our Patrons and Readers A Blissful Mahavir Jayanti.
 May the Principles Propagated by Bhagwan Mahavir Swami Bring
Better Understanding & Relationship in all Spheres of Human Lives.

JAIN FESTIVITIES
जीयो और जीने दो के प्रवर्तक महावीर स्वामी
: 0 के0 जैन
To celebrate Mahavir Jayanti, this message was broadcasted five time on 5th April,
2012 by All India Radio Videsh Service around the world in the voice of Shri A. K. Jain, the author. The recorded audio of  the programme can be listened by clicking on this line.

जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर, भगवान महावीर का जन्म, ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व, चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को, वैशाली गणतंत्र के, लिच्छिवी वंश के महाराज, श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशला देवी के यहाँ हुआ। यह वह समय था, जब भारत अंधविश्वासों के अंधकार में डूबने लगा था। पशुबलि और हिंसा का प्रचलन बढ़ रहा था। समन्वय की संस्कृति, जातिवाद और वर्ण विभाजन के शिकंजे में कस रही थी। ऐसे अंधकारमय समय में, क्षितिज पर अहिंसा, सत्य, और दया की जो किरणें, भगवान महावीर के, जन्म के फलस्वरूप फूटीं, उन्होंने समाज का सारा अन्धेरा तिरोहित करके, सभ्यता और संस्कृति के सूर्य की रक्षा की। ऐसे अंधकार से प्रकाश की ओर लाने वाले, महापुरुष को, निरन्तर स्मरण रखने के लिए, भारत के कोने कोने में, महावीर जयंती का पर्व, प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को, धूमधाम से मनाया जाता है।

महावीर के जन्म से पूर्व ही, कुंडलपुर के वैभव और संपन्नता की ख्याति बढ़ती गई। अत: महाराजा सिद्धार्थ ने, उनका जन्म नाम, 'वर्धमान' रखा। जैसे-जैसे महावीर बड़े हो रहे थे, वैसे-वैसे उनके गुणों में बढ़ोतरी हो रही थी। एक बार, जब सुमेरू पर्वत पर, देवराज इंद्र, उनका जलाभिषेक कर रहे थे, तब कहीं बालक बह न जाए, इस बात से भयभीत होकर इंद्रदेव ने, उनका अभिषेक रुकवा दिया। इंद्र के मन की बात भाँप कर, उन्होंने अपने अँगूठे के द्वारा, सुमेरू पर्वत को दबा कर कंपायमान कर दिया। यह देखकर देवराज इंद्र ने, उनकी शक्ति का अनुमान लगाकर, उन्हें 'वीर' के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया।

एक दिन बाल्यकाल में, महावीर महल के आँगन में खेल रहे थे। तभी आकाशमार्ग से संजय मुनि और विजय मुनि का निकलना हुआ। दोनों इस बात की तोड़ निकालने में लगे थे, कि, सत्य और असत्य क्या हैं? उन्होंने ज़मीन की ओर देखा, तो नीचे महल के प्राँगण में, खेल रहे दिव्य शक्तियुक्त अद्‍भुत बालक को देखकर, वे नीचे आएँ, और सत्य के साक्षात दर्शन करके, उनके मन की शंकाओं का समाधान हो गया । इन दो मुनियों ने उन्हें 'सन्मति' का नाम दिया। युवावस्था में, खेल के दौरान, कुछ साथियों को एक बड़ा फनधारी साँप दिखाई दिया। जिसे देखकर, सभी साथी डर से काँपने लगे। लेकिन वर्द्धमान महावीर, वहाँ से हिले तक नहीं। उनकी शूर-वीरता देखकर, साँप उनके पास आया, तो महावीर तुरंत साँप के फन पर जा बैठे। उनके वजन से घबराकर, साँप बने संगमदेव ने, तत्काल सुंदर देव का रूप धारण किया, और, उनके सामने उपस्थित हो गए। उन्होंने वर्द्धमान से कहा, स्वर्ग लोक में, आपके पराक्रम की चर्चा सुनकर ही, मैं आपकी परीक्षा लेने आया था। आप मुझे क्षमा करें। आप तो, वीरों के भी वीर 'अतिवीर' हैं। इन चारों नामों को सुशोभित करने वाले, महावीर स्वामी ने, संसार में बढ़ती हिंसक सोच को शांत करने के लिए अहिंसा के उपदेश प्रसा‍रित किए।

कुछ धर्म संघो कि ऐसी मान्यता है, कि, विद्याध्ययन के पश्चात उनका विवाह यशोदा नामक सुन्दर राजकन्या से हुआ और उन्हें प्रियदर्शन नामक कन्या रत्न भी प्राप्त हुआ। परिवार मोह महावीर को अधिक समय तक मोह-माया में बाँध कर नहीं रख पाया। फलत: माता-पिता के स्वर्ग सिधारने के पश्चात, ३० वर्ष की युवावस्था में दीक्षा लेकर, वह तपस्या के लिए निकल पड़े। गहन वनों में, ज्ञान की खोज करते हुए, उन्होंने कठोर तपस्या की, और वस्त्र एवं भिक्षा-पात्र तक का त्याग कर दिया। जैन धर्मियों का मानना है कि, वर्धमान कठोर तप द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर, जिन कहलाए। जिन से ही जैन बना है। जो अपने को जीत लेता है, वह जैन है। भगवान महावीर के विचारों को किसी काल, देश अथवा सम्प्रदाय की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। महावीर ने धर्म का मर्म, अनेकान्त और अहिंसा बताया। उन्होंने कहा, धर्म का हृदय अनेकान्त है और अनेकान्त का हृदय है समता। समता का अर्थ है परस्पर सहयोग, समन्वय, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहजता। वर्तमान युग में भी, महात्मा गांधी ने इसका राजनीति तक में सफल प्रयोग किया।

भगवान महावीर ने माना कि, अपरिग्रह के बाद भी गृहस्थी की कुछ न कुछ आवश्यकताएँ होती हैं। इसलिए गृहस्थियों को न्यायपूर्वक धन कमाना चाहिए, और आवश्यकता से अधिक धन, उन लोगों को वितरित कर देना चाहिए, जिनको उसकी आवश्यकता है। सब मानव समान हैं। फलत: दास प्रथा को उन्होंने, मानवता की अवज्ञा माना, जिसे किसी भी स्थिति में, स्वीकार नहीं किया जा सकता। भगवान महावीर, वर्ण व्यवस्था को जन्म पर आधारित करके, स्वीकार करना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा, ''कोई भी व्यक्ति जाति अथवा वर्ण से ऊँच-नीच नहीं होता। गुण और कर्म के आधार पर ही उसकी महत्ता और लघुता का अंकन होता है।'' समाज में स्त्री की समानता, के वे प्रबल पक्षपाती थे। उन्होंने हर आदर्श को पहले 'जिया तथा किया` और फिर कहा। कथनी और करनी में अन्तर न होने के कारण ही, वे अनुकरणीय आदर्श के रूप में अभिन्दनीय और वन्दनीय हो गए।

भगवान महावीर की मूल शिक्षा है - ‘अहिंसा’। भगवान महावीर ने, अपने स्वयं के जीवन से, इसे वह प्रतिष्ठा दिलाई कि अहिंसा के साथ भगवान महावीर का नाम ऐसा जुड़ गया, कि दोनों को अलग कर ही नहीं सकते। अहिंसा का सीधा-साधा अर्थ करें, तो वह होगा कि, व्यावहारिक जीवन में, हम किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं, किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दुःख न दें। ‘आत्मानः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्’’ इस भावना के अनुसार, दूसरे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करें, जैसा कि, हम उनसे अपने लिए अपेक्षा करते हैं। इतना ही नहीं, सभी जीव-जन्तुओं के प्रति अर्थात् पूरे प्राणी मात्र के प्रति, अहिंसा की भावना रखकर, किसी प्राणी की, अपने स्वार्थ व जीभ के स्वाद आदि के लिए, हत्या न तो करें और न ही करवाएं और हत्या से उत्पन्न वस्तुओं का भी उपभोग नहीं करें।

भगवान महावीर का एक महत्वपूर्ण संदेश है - ‘क्षमा’। भगवान महावीर ने कहा कि ‘खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे, मित्ती में सव्व भूएसू, वेर मज्झं न केणई’। अर्थात् ‘मैं सभी से क्षमा याचना करता हूं। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे लिए सभी प्राणी मित्रवत हैं। मेरा किसी से भी, वैर नहीं है। यदि भगवान महावीर की, इस शिक्षा को, हम व्यावहारिक जीवन में उतारें, तो फिर क्रोध एवं अहंकार मिश्रित, जो दुर्भावना उत्पन्न होती है, और जिसके कारण हम घुट-घुट कर जीते हैं, वह समाप्त हो जाएगी। व्यावहारिक जीवन में यह आवश्यक है, कि हम अहंकार को मिटाकर, शुद्ध, हृदय से आवश्यकता अनुसार बार-बार ऐसी क्षमा प्रदान करें, कि यह भावना हमारे हृदय में सदैव बनी रहे।

क्षमा माँगने से अहंकार ढलता है, तो क्षमा करने से सुसंस्कार पलता है। क्षमा शीलवान का शस्त्र है। क्षमा, प्रेम का परिधान है। क्षमा, विश्वास का विधान है। क्षमा, दिलेरी के दीपक में दया की ज्योति है। क्षमा देने से आप, अन्य समस्त जीवों को अभयदान देते हैं, और, उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का अनुसरण करेंगे, आत्मिक शांति अनुभव करेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है, जब वह अपने से बाहर हस्तक्षेप न करे, और बाहरी तत्व से विचलित न हो। क्षमा-भाव इसका मूलमंत्र है। जैन परम्परा में, दशलक्षण पर्व की समाप्ति के ठीक एक दिन बाद, एक विशेष पर्व मनाया जाता है, और वह है, क्षमावाणी पर्व। इसे संवत्सरी या क्षमा-पर्व भी कहते हैं। संपूर्ण विश्व के इतिहास में, शायद यह पहला पर्व हो, जिसमें शुभकामना, बधाई या तोहफे न देकर, कृत अपराधों के लिए सभी से माफी मांगी जाती हो। इस दिन, सभी लोग, सभी जीवों से अपने द्वारा जाने-अनजाने में किए गए, अपने समस्त अपराधों के लिए क्षमा-याचना करते हैं। क्षमा एक ऐसी अचूक औषधि है, जिसके द्वारा हम लम्बी बीमारियों से भी छुटकारा पा सकते हैं। अनुसन्धाताओं ने, यह निष्कर्ष निकाला है, कि लम्बे समय तक मन में बदले की भावना, ईष्र्या-जलन, और दूसरों के अहित का चिंतन करने पर मनुष्य भावनात्मक रूप से बीमार रहने लगता है। क्षमा वीरत्व की पहचान है। दुर्बल और विवश व्यक्ति द्वारा दी गई क्षमा का महत्व उतना नहीं हो सकता, जितना बलशाली व्यक्ति द्वारा दी गई क्षमा का। क्षमा के स्वरूप और उसकी क्रियान्वयन के संबंध में, कोई निश्चित सिद्धांत नहीं बन सकता। एक साधु अगर अपराधी को क्षमा नहीं करता है, तो उसका साधुत्व संदिग्ध हो जाता है। भगवान महावीर के साधनाकाल में कितनी ही बार, प्रतिकूल परिस्थितियाँ पैदा हो गईं। शूलपाणि यक्ष, चंडकौशिक सर्प, संगम देव आदि ने अज्ञानवश तमाम अपराध किए, पर भगवान महावीर के अंत:करण में, उन सबके प्रति प्रेम की पवित्र धारा प्रवाहित होती रही। महावीर का महावीरत्व, उनकी इस क्षमाशीलता में ही दिखाई दिया।

सभी धर्मों के महापुरूषों नें अपनें जीवन में क्षमा को विशेष स्थान दिया है। भगवान महावीर जहां क्षमा एवं अहिंसा को ''जियो और जीनें दो'' के रूप में प्रतिपादित करते हैं, तो ईसामसीह ''घृणा पापी से नहीं पाप से करनें और दुश्‍मन को भी माफ करनें'' का उपदेश देते हैं। गौतम बुद्ध जहां अपनें विरोधी की गालियों पर मुस्कुरा कर कहते हैं कि ''मैं तुम्हारी गालियां स्वीकार नहीं करता, कटु वाणी तुम्हारे ही मुखारविन्द की है, तुम्हें ही मुबारक''। राष्‍ट्रपिता महात्मा गांधी तो अहिंसा और क्षमा को वीरों का आभूषण कहते हैं। भारतभूमि के संत-ऋषियों के क्षमा के अनेक किस्से हमारी गाथाओं में रचे-बसे है। वाल्मिकी नें राहजनी छोडकर, राम की भक्ति की और वे रामायण के रचयिता बन गये। सनातन धर्म में क्षमा-संबंधी, कई आख्यान और दृष्टांत हैं। प्रतिशोध की आग में जल, रहे ऋषि विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ की हत्या के लिए, उनके आश्रम में जाना और छिपकर वार्तालाप सुनने के प्रयास में, अपनी प्रशंसा सुनकर, पश्चाताप में डूबकर, वशिष्ठजी से क्षमा माँगना, ऐतिहासिक दृष्टांत है। तपस्या में रत भगवान महावीर के कानों में, संगम ग्वाला उनको बैलों का चोर मानकर कीलें ठोंकता है, लेकिन क्षमा की शक्ति से ओत-प्रोत, प्रभु महावीर स्वामी, उसे क्षमा कर देते हैं। यह थी तीर्थंकर महावीर स्वामी, की क्षमाशीलता, यह थी उनकी अहिंसा साधना । भगवान महावीर क्षमापना के पुरोधा हैं।

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर, भगवान महावीर स्वामी, का जीवन ही उनका संदेश है। उनके सत्य, अहिंसा, के उपदेश, एक खुली किताब की भाँति है। महावीर ने एक राजपरिवार में जन्म लिया था। उनके परिवार में ऐश्वर्य, धन-संपदा की कोई कमी नहीं थी, जिसका वे मनचाहा उपभोग भी कर सकते थे। किंतु युवावस्था में क़दम रखते ही, उन्होंने संसार की माया-मोह, सुख-ऐश्वर्य और राज्य को छोड़कर यातनाओं को सहन किया। सारी सुविधाओं का त्याग कर, वे नंगे पैर पैदल यात्रा करते रहे। ई. से 527 पूर्व, दीपावली के दिन, इस युग के अंतिम चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर ने ७२ वर्ष की आयु में अपनी भौतिक देह, पावापुरी में त्याग कर निर्वाण प्राप्त किया। महावीर हमें, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन देते हैं। आज उनकी जयंती के दिन, हमें यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि, उनकी बताई शिक्षा को अपनायें। इससे हमारे में नैतिक गुणों का विकास होगा, साथ ही साथ अच्छे कर्म भी होंगे। भगवान महावीर के मूल मंत्र 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत पर चलकर ही हम देश, दुनिया को बचा सकते हैं। भगवान महावीर की शिक्षाएं, हमें करुणामय एवं निस्वार्थ सादगीपूर्ण जीवन की प्रेरणा देती हैं। यह त्योहार सच्चाई, अहिंसा तथा सौहार्द के प्रति सभी की प्रतिबद्धताओं को मज़बूत करने का काम करे।

धन्य अक्षय तृतीया...अक्षय तृतीया पर विशेष - 24 अप्रैल 2012 - डॉ. द्वीपेन्द मुनि

एक नन्हा सा बालक जब विद्या अर्जन के लिए विद्यालय में जाता है तो सर्वप्रथम उसे वहाँ पर अ, आ, इ सिखाई जाती है जिससे कि वह बालक अपना अध्यनन प्रारम्भ करता है। ठीक इसी प्रकार जैन धर्म में भी जब साधक प्रवेश करें तो उसे भी जैन धर्म के अ, आ इ सीख लेनी चाहिए। अ से - अक्षयतृतीया, आ से - आदिनाथ, इ से इक्षुरस। अक्षयतृतीया पर्व के साथ एक इतिहास, एक संस्कृति, एक सभ्यता, एक परम्परा जुड़ी हुई है। अक्षय का अर्थ है जिसका कभी क्षय नहीं हो। ज्योतिष के अनुसार वैशाख सुदी 3 की तिथि हजारों वर्षों में आज तक कभी क्षय तिथि नहीं हुई है। जैन परम्परा में ही नहीं, अपितु वैदिक परम्परा में भी आज का दिन अक्षयतृतीयाया आखातीज’ के नाम से प्रसिद्ध है।

वैदिक परम्परा में कहा जाता है कि जमदग्नि के पुत्र परशुराम का जन्म अक्षयतृतीया के दिन हुआ। कुछ लोग मानते हैं कि सतयुग का प्रारम्भ अक्षयतृतीया के दिन से हुआ, इसलिए यह तिथि युगादि तिथि है। भागवत में बताया है कि एक बार युधिष्ठिर ने कर्मयोगी श्रीकृष्ण से अक्षयतृतीया का महात्म्य पूछा तो उन्हानें कहा कि -‘वैशाखस्य तृतीयाश्च पूर्व विद्धां करोति यः’ अर्थात् वैशाख शुक्ला तृतीया के पूर्वान्ह में जो यज्ञ, दान, तप आदि पुण्य कार्य किये जाते हैं उनका फल अक्षय होता है। भारत देश में आज भी यह विश्वास है कि अक्षयतृतीया का दिन बिना पूछा मुहूर्त्त है। श्रमण संघ का प्रथम बृहद् सम्मेलन ईस्वी सन् 1952 में अक्षयतृतीया के दिन ही सादड़ी (राजस्थान) में हुआ जहाँ श्री वर्धमान श्रमणसंघ की स्थापना हुई तथा पूना सम्मेलन 1987 में अक्षयतृतीया के दिन ही आचार्य आनंदऋषि जी म. ने गुरुदेव श्री देवेन्द्र मुनि जी म. को उपाचार्य पद एवं श्रद्धेय श्री शिवमुनि जी म. को युवाचार्य पद का दायित्व सौंपा था।

जैन परम्परा में अक्षयतृतीया के साथ एक अत्यन्त प्रेरणादायी घटना जुड़ी हुई है, इस कारण अक्षयतृतीया का जैन धर्म में बहुत ही अधिक महत्व है, और वह है - प्रभु आदिनाथ का पारणा।

कैसे देवें आहार प्रभु को, जनता थी इससे अनजान, हीरे मोती थाली भरकर, कोई लाता कपड़ों के थान।
नहीं मिला आहार प्रभु को एक वर्ष के दरम्यान, उग्र तप था ऋषभदेव का जय भगवान धन्य भगवान।।

आदि तीर्थंकर भ. ऋषभ के कठोर तपश्चरण 13 महीने और 10 दिन के सुदीर्घ तप के पश्चात् वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन कुरुजन पद की राजधानी हस्तिनापुर पधारे। हस्तिनापुर में बाहुबली के पौत्र एवं राजा सोमप्रभ के पुत्र श्रेयांसकुमार युवराज थे। श्रेयांसकुमार ने उसी रात एक शुभ किन्तु विचित्र स्वप्न देखा कि सोने के समान दीप्ति वाला सुमेरु पर्वत श्यामवर्ण का कांतिहीन सा हो रहा है, मैंने अमृत कलश से उसे सींचकर पुनः दीप्तिमान बना दिया है। प्रातःकाल श्रेयांसकुमार स्वप्न के अर्थ पर विचार करता हुआ महलों के गवाक्ष में बैठा था कि अचानक उसे कोलाहल सुनाई दिया। देखा तो विचार में पड़ गया कि यह महामानव कौन है? इस तपस्वी को मैंने पहले कहीं देखा है, मन में ऊहापोह उठता है और मतिज्ञानावरण का क्षयोपशम होने से जातिस्मरण ज्ञान हो जाता है।

श्रेयांसकुमार ज्ञान से जान लेता है कि ये मेरे परदादा युगादिकर्ता दीर्घ तपस्वी प्रभु ऋषभदेव है और शुद्ध भिक्षा के लिए पधार रहें हैं। श्रेयांसकुमार महलों से नीचे उतरता है और प्रभु को वन्दन करके कहता है ‘पधारो प्रभु!’ अभी अभी राजमहलों में इक्षुरस से भरे 108 घड़े आये हैं आप ग्रहण करें। प्रभु ने अपने दोनों हाथों की अंजली बनाई और श्रेयांसकुमार ने उत्कृष्ठ भाव से इक्षुरस बहराया, और प्रभु का पारणा करवाया। देवों ने देवदुंदुभी बजाई और अहोदानं, अहोदानं! की घोशणा हुई। प्रभु ऋषभदेव का प्रथम पारणा होने से इस अवसर्पिणी काल में श्रमणों को भिक्षा देने की विधि का प्रथम ज्ञान देने वाला भी श्रेयांसकुमार हुआ। वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन इस दान धर्म की प्रवृति हुई। इस लिए यह तृतीया अक्षय बन गई। संसार में दान की प्रथम परम्परा का श्रीगणेश श्रेयांसकुमार ने किया।

इस प्रकार ‘अक्षय तृतीया’ का यह ऐतिहासिक पर्व संसार में तप की महिमा का प्रवर्तक होने के साथ ही दान परम्परा का प्रवाह प्रवर्तित करने वाला है। तप और दान की आराधना करने की प्रेरणा देने के कारण ही यह तृतीया अक्षय तृतीया बनी है। संपर्क सूत्र: डॉ. द्वीपेन्द मुनि, श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय,गुरु पुष्कर मार्ग, उदयपुर (राज.) 313001.

CURRENT AFFAIRS
LITIGATION OVER BODHGAYA WILL HAVE FAR REACHING AFFECT ON OTHER RELIGIOUS PLACES

A recent PIL in the Supreme Court claims exclusive Buddhist rights to the Mahavihara at Bodhgaya, which is now managed by Hindus and Buddhists. By agreeing to examine the validity of the Bodhgaya Temple Act, 1949, to nullify Hindu control over the famed vihara, the Supreme Court has inadvertently exposed, The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991, to scrutiny and opened the door for Hindu claims to historical temples they have demanded for centuries. The Government headed by Prime Minister PV Narasimha Rao passed the 1991 Act to prohibit any change in the character of any place of worship as it existed on August 15, 1947, and thus freeze disputes over religious sites seized during the medieval ages whose restitution was being demanded by the Hindu community. The Babri Masjid was excluded from the Act’s purview as it was sub-judice.

By admitting the plea on the Mahabodhi temple, the bench has taken a narrow view of the oceanic nature of native Indian tradition. In the 1920s itself, renowned archaeologist RP Chanda noted the Indus roots of Yogic tradition (possibly India’s most significant spiritual dimension), particularly the meditation forms that came to be associated with Bauddha and Jaina practice. He observed that the discoveries at Indus sites show that both traditions are indebted to the Indus civilisation for some of their cardinal ideas. Scholars now believe that what were later identified as distinct Hindu, Jaina and Bauddha spiritual streams, had common roots in the Indus civilisation. Prince Siddhartha (6th century BC) said there had been many Buddhas before him; Buddhist theology has rich genealogies of past Buddhas and the previous lives of Sakya Muni. Bodhgaya is where Gautama attained Enlightenment in this yuga; Emperor Ashoka commemorated the site with the Vajrasana (Diamond Throne) in the third century BC. Ashoka also erected a stupa, which was reconstructed as the Mahabodhi Mahavihara by Gupta kings in the seventh century AD. In the 13th century, the Mahavihara was sacked by the Turks; the Bhikshus massacred or scattered, and the site abandoned.

Around 1590, an itinerant Saivite sanyasi, Mahant Ghamandi Giri, arrived at Bodhgaya and took charge of the Mahavihara. The present Mahant is 16th in the line of succession of Mahants who rescued the Mahavihara and kept the name of Buddha alive in the dark centuries when no priestly or lay community survived to perform the prayers and rituals. In 1883, Alexander Cunningham, JDM Beglar and Rajendra Lal Mitra renovated the temple on scientific lines. Edwin Arnold, principal of Government Sanskrit College, Poona, during the Mutiny, demanded in 1885 that the temple be handed over to Buddhists; he urged Buddhist countries to espouse this cause. It was classic British divide-and-rule; in 1891, the Anagarika Dharmapala of Sri Lanka jumped into the fray.

After independence, the Bihar Legislative Assembly passed the Bodhgaya Temple Act (Bihar XVII of 1949), which created the Bodhgaya Temple Management Committee to take care of the temple and pilgrims, and ensure proper worship. The committee comprised a chairman and eight members nominated by the State Government, all of whom had to be Indians. In 1953, presiding Mahant Harihar Giri handed over the management to the then Vice-President of India, Sarvapalli Radhakrishnan. Since then, the management committee has comprised five Hindus, including the District Collector who is chairman, provided he is a Hindu, and four Buddhists. Now, 77-year-old Wangdi Tshering of Darjeeling has filed a public interest litigation, claiming that the Bodhgaya Temple Act is ultra vires Article 25, 26, 29 and 30 of the Constitution. Whatever the merits of his plea, he cannot negate the Hindu contribution in preserving the temple during the darkest centuries when hundreds of sacred temples all over the land were desecrated and even today remain in possession of forces inimical to Hindu dharma.

Mr. Tshering claims the Act violates his Fundamental Right to Freedom of Religion as enshrined in Article 25, which guarantees to every person, and not merely to citizens of India, the freedom of conscience and the right to freely profess, practice and propagate religion. He claims Article 25 encompasses the rituals and observances, ceremonies and modes of worship considered by religion to be its integral and essential part. In that case, he will have to prove that the rituals are being violated or compromised by the managing committee. The petitioner claims that Article 26 gives every religious denomination or section thereof the right to establish and maintain institutions for religious and charitable purposes; manage its own affairs in matters of religion; own and acquire moveable and immovable property; and administer such property in accordance with law. Well, the Gupta rulers who built the great Mahavihara were denominationally Hindu, and the sacred site was in the safe custody of Saivite sanyasis for centuries until the British instilled the poison of separatism into Buddhist hearts worldwide.

The PIL demands protection of the interests of minorities under Article 29. Ironically, there were no Buddhists in India at all in all the centuries that the temple, its sanctity and rituals were preserved by sanyasis. Nor is relief warranted under Article 30, as the Buddhist community is not establishing the Bodhgaya Mahavihara (which is not an educational institution anyway), but trying to grab it from its historical and civilisational guardians. As recently as 2005, a Supreme Court bench, comprising Chief Justice RC Lahoti and Justice DM Dharmadhikari and Justice PK Balasubramanyan, rejected a plea for minority status to the Jain community, saying that the practice of listing religious groups as minority communities should be discouraged. The court asked the National Commission for Minorities to suggest ways to help create social conditions where the list of notified minorities “is gradually reduced and done away with altogether”, warning that proliferation of minorities would encourage fissiparous tendencies and endanger constitutional democracy. This prophecy is now coming true; we should consider the advice of delisting communities as minorities.

Justice Altamas Kabir and Justice SS Nijjar have inadvertently encouraged separatist tendencies nurtured for over a century by colonial agencies and their proxies within the nation. Yet, Hindus have nothing to fear. Undoing the Bodh Gaya Act of 1949 could give them full control of the Mahavihara as The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991, will come into operation. And if that Act is struck down, the sectarian plea upheld, and control of the Mahavihara lost, local Hindus can forward claims to the shrines at Varanasi and Mathura, and myriad temples across the country citing the same precedent. They will not need the support of any political party or all-India organisation. Source : Sandhya Jain, www.dailypioneer.com

TEMPLES
HC TELLS BMC TO DEMOLISH KANDIVLI JAIN TEMPLE

The Bombay high court has directed the Brihanmumbai Municipal Corporation to demolish an illegal Jain temple at Kandivli (W) within a week, provided the temple authorities do not get a stay on the demolition proceedings from a lower court. A division bench comprising justice PB Majmudar and justice RD Dhanuka gave the directions to the BMC while hearing a petition, filed by three residents of Sai Baugh Estate of Kandivli (E), seeking demolition of the Jain temple and a prayer hall attached to it on the grounds that they obstructed movement and posed health problems. The assistant ward officer of R/S ward, in his affidavit submitted to court, had admitted that the structure was illegal. He even passed an order on February 29, which stated, “If the structure is not demolished by Rajanikant Shah (owner of the plot) within 15 days, the respondent will proceed as per law.” After the petitioners’ advocate had earlier said in court that the temple near the Sai Baug Estate is unauthorised, the court had said that such illegal structures are being used to make money. The court, though, was informed by Shah’s counsel that the notice under section 351 for demolition has been challenged before the city civil court and an application has also been moved seeking an injunction on the proceedings. The HC, therefore, directed the BMC to act as per law.Their petition, filed by Rajesh Surve, Shevanti Rahate and Madhukar Desai, states that the response to an RTI application had revealed that the civic body had neither sanctioned any plan for the Jain temple nor had it granted permission to build a hall on the same premises. Sai Baug Estate residents have alleged that illegal constructions have been causing water-logging during the monsoon and have ruined the drainage system of the multi-storeyed chawls.

AMAZING FACTS ABOUT PALITANA


Palitana is the largest and the greatest Jain sacred Pilgrimage Center in the world.
Click here to view more picture of Palitana temples

SAINTS
THE BIGGEST EVER JAIN MAHOTSAVA HELD IN AHMEDABAD

For the first time in Ahmedabad, 27 Jain Acharyas, more than 750 Jain monks and nuns and one lakh plus devotees celebrated the Mahamahotsava. Jain Mahotsav was organized by the Upkar Utsav Upvan Samitee. The mahotsava started from 15th March 2012 and ended on 22nd March 2012 at Sanskar Kendra, near Paldi. The event was organized to celebrate Bhagwan Adinath’s birth and Diksha, Shashan Shirtaj Shree Ramchandrasurishwarji Maharaja’s ‘Diksha Shatabdi’ and to commemorate the noble deeds of Late Sheth Shree Maneklal Mohanlal and Smt. Leelavati Maneklal, as well as to pay tribute to their son Sheth Shree Kumarpalbhai Maneklal Shah, who is a respected and benign personality in the Jain community, on the first anniversary of his heavenly abode.

The eight days long celebration included various religious and cultural events. On 15th March, the Mahotsav started with a huge Rathyatra devoted to Bhagwan Adinath’s birth and his renunciation of the world (Diksha). The 10 kilometer long Rathyatra, with a 3.5 kilometer long procession covered the areas between Anjali Char Rasta and Sanskar Kendra. The grand Rathyatra consisted of total of 12 chariots, some of which were 300 years old and sourced from various other Indian states. A 250 kg silver chariot was the prime attraction in this Rathyatra. This religious occasion was also a tribute to the luminaries of Jainism such as Acharya Shree Siddhisurishwarji Maharaja, Shashan Shirtaj Shree Ramchandrasurishwarji Maharaja, Tapasvi Samrat Shree Rajtilaksurishwarji Maharaja. Additionally, Gachhadhipati Shree Acharya Punyapalsurishwarji Maharaja, Achary Shree Muktiprabhsurishwarji Maharaja, Acharya Shree Gunisheelsurishwarji Maharaja, Acharya Shree Kirtisurishwarji Maharaja and others blessed the auspicious occasion.

The novel event featured veteran classical music maestros and classical dance concerts from all over the country, with the one aim to ensure ‘Dev Bhakti’ through which the guests experienced a holistic classical experience and a glimpse of the varied Indian music and dance forms. The entire eco-friendly theme of the event features majestic and splendid backdrops and opulent themes and decorations. During the week-long event, guests experienced Jain religious atmosphere through a never seen before walk-through art gallery, and much more. As part of this glorious celebration, for the first time in 200 years a ‘Nandishwar Pujan’ was performed. 68 separate Jinalayas (Jain Temples) were constructed on 68 separate mountains. Furthermore, more than 500 devotees worshiped 272 ‘Chaumukhi Bhagwan’ on the same stage at one time. Source: Vishal Patel, Ahmedabad, Cell: 99251 11601, E-Mail: vishal.patel@adfactorspr.com

NAME OF MUNI AJIT CHANDRA SAGAR JI ENTERED IN GUINNES BOOK OF RECORDS FOR BEING THE FASTEST SPEAKER

The Jain saint, Muni Shri Ajit Chandra Sagar Ji maharaj has recently set a record in the speed of talking. He is able to pronounce 10 to 12 words per second on the average in a clearly audible manner. and also possesses a powerful memory..He has leant by heart  22,000 shlokas out of 45,000 from Jain Agams. Having been checked by a team deputed by the Guinnes Book of Records, he has been declared first in India and second in Asia. It is a great acievement for a Jain saint.

MUNI LEKHENDRA SHEKHAR VIJAY JI HONOURED WITH ACHARYA TITLE

Kokan Kesri Muni Raj Shri Lekhendra Shekhar Vijay ji was honoured with 'Acharya'  title by all the Murti-pujak Jain sangh including "Samast Tristutik Jain Sangh'' on the 25th March, 2012. Koti Koti Vandna.

JAIN BHAGVAN MAHAVEER SWAMI FILM (A FULL MOVIE)

www.youtube.com/embed/OUSLXv8W29I

AHIMSA & VEGETARIANISM
BAN ON PUBLIC ROASTING OF COWS IN COMBODIA
Hindus have welcomed Cambodia ban on spit-roasting of cows in front of restaurants and other public places. Hindu statesman Rajan Zed, President of Universal Society of Hinduism, in a statement in Nevada (USA), said that “it was a step in the right direction”. It was a highly cruel practice, Rajan Zed thanked Cambodian Prime Minister Hun Sen for ordering this ban saying that, it ran contrary to the teachings of Theravada Buddhism, country’s official religion. Rajan Zed further said that cow was venerated among Hindus as the seat of many deities. Lord Krishna was a cowherd in early life and was protector of cows. Cambodia is known for spectacular Angkor Wat temples complex built between 9-13th centuries, which is known as mother of all temples; and dazzling rice paddies. Constitutional monarchy Kingdom of Cambodia is headed by King Norodom Sihamoni.

MADHYA PRADESH CM PLEDGES STATE ACTION AGAINST FEMALE FOETICIDE

Chief Minister Shivraj Singh Chouhan has said that the State Government is committed to curbing cow slaughter and female foeticide. A stringent law has been enacted in the State which provides with ensuring strict punishment to those found guilty of cow slaughter directly or indirectly. Chief Minister was addressing a Pratishtha Mahotsav of Jain community at village Ghasoi in Mandsaur district. The Chief Minister said that a cow sanctuary is being established in 983 acre area in Shajapur district. He said that the State Government has decided not to open new liquor shops. Chouhan said that efforts are being made to curb female foeticide by firmly implementing PNDT Act. The Chief Minister also gave information about woman empowerment schemes and farmer-friendly decisions of the State Government. Jain saint Harsh Sagar Maharat lauded the State Government’s efforts for curbing cow slaughter and female foeticide as well as towards de-addiction. He also lauded Chouhan’s efforts for restoring the idols dug out some years ago at Anand Dham Ghasoi to the Jain community. He also praised Public Relations Minister Laxmikant Sharma and former Minister Himmat Kothari in this connection. Finance Minister Raghavji, Incharge Minister Paras Chandra Jain, Madhya Pradesh State Planning Commission Vice-Chairman Babulal Jain, Rajya Sabha member Meghraj Jain, former Minister Himmat Kothari, MLAs Om Prakash Sakhlecha, Radheshyam Patidar, District Cooperative Bank Chairman Rajendra Surana, Dashrath Singh Dhariyakheri, Madanlal Rathore and other people’s representatives were also present on the occasion.

मुलायम से मिलेंगे जैन मुनि - बूचड़खानों का कड़ा विरोध

मेरठ : बूचड़खाना विरोधी आंदोलन के जनक जैनमुनि मैत्री प्रभ सागर यांत्रिक बूचड़खानों के विरोध में सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से मिलेंगे। उनका कहना है कि बसपा सरकार ने तो मेरठ समेत आठ जनपदों में स्थापित हो रहे यांत्रिक बूचड़खानों के लाईसेंस निरस्त नहीं किए, पर उन्हें उम्मीद है कि मुलायम सिंह यादव सरकार जरूर उनके इस आग्रह को स्वीकार करेगी। यदि आग्रह स्वीकार नहीं हुआ तो वे इस मामले को लेकर मेरठ को ही आंदोलन का केन्द्र बनाएंगे। जैन मुनि उप्र विधानसभा चुनाव में बागपत से बसपा प्रत्याशियों को मिली विजय से आहत है। गुजरात से फोन पर उन्होंने बताया कि जिस बसपा सरकार ने मेरठ समेत आठ जनपदों में यात्रिक बूचड़खानों को खोलने की अनुमति दी, उस सरकार का हो हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। ज्ञात हो कि अप्रैल 2011 में जैन मुनि मैत्री प्रभ सागरजी महाराज द्वारा पशु हत्या के खिलाफ चलाए गए बूचड़खाना विरोधी आंदोलन का केन्द्र बड़ौत को बनाया गया था। जैन मुनि ने बड़ौत के पांडुक शिला मैदान में 16 दिन तक आमरण अनशन किया था। अनशन के अंतिम दिन 12 मई 2011 की रात 2 बजे बसपा सरकार के इशारे पर पुलिस ने उन्हें समर्थकों सहित उठा लिया। पुलिस ने उन्हें दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में भर्ती कराया तो 13 मई को लोग सड़कों पर उतर आए। इस घटना के बाद प्रदेश सरकार ने जैन मुनि के बड़ौत में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जिस कारण वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर दो दिवसीय आमरण अनशन के बाद गुजरात चले गए थे।

JAIN ACTIVISTS CAN USE THIS FORMAT TO JOIN US IN THIS CAUSE
Please write to your CM using this format and ensure that, the slaughter houses in your state remain closed during Puryushan festival.

प्रति,
(1) माननीय मुख्यमंत्री महोदय,
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(2) माननीय मंत्री महोदय,
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग,
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विषय:- जैन पर्व - “पर्यूषण पर्व” के प्रसंग पर 10 दिनों तक पशुवध गृह (बूचड़खाने) बन्द रखने एव मांस विक्रय की दुकाने भी बन्द रखे जाने के संबंध मे ।

(1) देश के उच्चतम न्यायालय, नई दिल्ली के न्यायमूर्ति श्री एच. के. सेमा एवं श्री मार्कण्डेय काटजू ने 14 मार्च, 2008 को “हिंसा विरोधक संघ विरुद्ध मिर्जापुर मोती कुरैश जमात एवं अन्य” (सिविल अपील नं. 5469, 5470, 5472, 5474, 5476, 5478, 5479-80-81/2005) के संबंध में 36 पृष्ठीय ऐतिहासिक फैसला सुनाया था । यह फैसला उच्चतम न्यायालय की बेवसाइट www.supremecourtofindia.nic.in तथा www.judis.nic.in पर एवं All India Reporter (AIR) - July, 2008 - Supreme Court, 1892 S. C. - S. C. 1903 पर भी उपलब्ध है । इस फैसले में जैन पर्व “पर्यूषण पर्व” के 9 दिनों के लिए पशुवध गृह एवं मांस की दुकानों को बंद करने हेतु अहमदाबाद नगर निगम द्वारा लगाये गये प्रतिबंध को उचित माना था। अतः गुजरात हाईकोर्ट (सिविल अपील नं. 6329/1988,दिनांक 22-06-2005) के द्वारा इस संबंध में दिये गये निर्णय को उच्चतम न्यायालय, नई दिल्ली ने पलट कर गुजरात सरकार के द्वारा जैनों के विशिष्ट पर्व “पर्यूषण पर्व” के दिनों में 9 दिनों के लिए पशुवध एवं मांस विक्रय की दुकानों को बंद करना उचित माना था।

(2) बिहार सरकार के गृह (विशेष) विभाग के उप सचिव के द्वारा पत्र संख्या- सी/जे.ए. -5501/08-8984, पटना, दिनाकं 29 अगस्त, 08 में  प्रदेशस्थ सभी जिला पदाधिकारियों का निर्देश प्रदान किया था कि जनैं का त्यौहार दिनाकं 04 सितम्बर से 14 सितम्बर, 2008 तक मनाया जाएगा। अतएव जनै त्यौहार के अवसर पर याचित आवेदन के आलोक में यथोचित कार्रवाई करने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाय।

(3) इस सम्बन्ध में राजस्थान सरकार के स्वायत्त शासन विभाग, जयपुर के सचिव के द्वारा जैन धर्म के “पर्यूषण पर्व” के 9 दिनों को अहिंसा दिवस घोषित किया था। शासनादेश क्रमांक प. 24 () (13)/नियम/डीएलबी/89/5135-5330, दिनांक 30-08-2008 में भाद्रपद शुक्ल 1, 2, 3, 4, 5, 8, 10, 14 एवं आसौज कृष्ण 1 वि. सं. 2065 के 9 दिनों तक राज्य के सभी बूचड़खाने एवं मांस-मछली की सभी दुकानें बंद रखे जाने का आदेश निर्गमित किया था।

(4) जनै-धर्म के दिगम्बर जैन समुदाय एवं श्वेताम्बर जैन समुदाय के भी अनेक व्यक्तियो, संस्थाआं, जन-प्रतिनिधियों विधायकों एवं सांसदों आदि के द्वारा दोनों ही समुदायों के द्वारा अपनी-अपनी परम्पराओं में मान्य तिथियों में पर्यूषण पर्व के अति पावन प्रसंग पर प्रदेशस्थ सभी बूचड़खाने एवं मांस विक्रय की दुकानें बंद रखे जाने हेतु माँग की जाती रही है।

(5) चूँकि वर्ष 2009 में जहाँ श्वेताम्बर जैन समुदाय के द्वारा 17 से 24 अगस्त, 2009 तक के दिनों में पर्यूषण पर्व के 8 दिनों तक धार्मिक समायोजन सम्पन्न् किया गया, वहीं दिगम्बर जैन समुदाय द्वारा 24 अगस्त से 4 सितम्बर, 2009 तक पर्यूषण पर्व के 12 दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान किया था।

(6) इस सम्बन्ध में राजस्थान शासन के निदेशालय - स्थानीय निकाय विभाग, राजस्थान, जयपुर के उप शासन सचिव के द्वारा श्वेताम्बर जैन समुदाय के द्वारा पर्यूषण पर्व के 8 दिनों यानि 17 से 24 अगस्त, 09 तक के लिये राज्य के समस्त बूचड़खाने एवं मासं - मछली की दुकानों को बंद रखे जाने हेतु प्रथमतः समसंख्यक पत्रांक क्रमांक प. 24 () (13)/नियम/डीएलबी/89/पार्ट-II438-625, दिनांक 22-07-2009 प्रसारित किया था।

(7) तत्पश्चात् दिगम्बर जैन समुदाय की माँग/भावनाओं को भी दृष्टि में रखकर इस समुदाय द्वारा पर्यूषण पर्व (दशलक्षण पर्व) के वर्ष 2009 के बारह दिनों यानि 24 अगस्त से 04 सितम्बर, 2009 तक राजस्थान राज्य के समस्त बूचड़खाने एवं मांस-मछली की दुकानों को बंद रखे जाने हेतु राजस्थान शासन के
निदेशालय - स्थानीय शासन निकाय विभाग, राजस्थान, जयपुर के उप शासन सचिव द्वारा दिनांक 28-07-2009 को पत्र क्रमांक प.24 () (13)/नियम/डीएलबी/89/पार्ट-II 647-735 आदेश निर्गमित किया था।

(8) अतएव इस आंशिंक संशोधित आदेश के अनुसार दोनों ही जैन समुदायों द्वारा मान्य अपनी-अपनी तिथियों में पर्यूषण पर्व संबंधी कुल 19 दिनों हेतु 17 अगस्त से 04 सितम्बर, 2009 तक राजस्थान प्रदेश में स्थित समस्त बूचड़खाने एवं मांस-मछली विक्रय की दुकानों को बंद रखे जाने के आदेश वर्ष 2009 में प्रसारित किए गए थे।

(9) छत्तीसगढ़ शासन के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, दाउ कल्याण सिंह भवन, रायपुर के अवर सचिव द्वारा क्र. 4124/4189/18/2006, रायपुर, दिनांक 12-08-2009 को जैन पर्यूषण पर्व के अवसर पर भाद्रपद वदी द्वादस से भाद्रपद सुदी चतुर्थी तक के 8 दिवसों तक पशुवध गृह एवं मांस बिक्री की दुकानें बंद रखे जाने एवं इस शासनादेश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने हेतु प्रदेश के समस्त कलेक्टर, आयुक्त नगर निगम तथा मुख्य नगरपालिका अधिकारी/नगरपालिका परिषद एवं नगर पंचायतों को जारी किया गया था।

(10) माननीय महोदय से निवेदन है कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा प्रदत्त उपरिलिखित फैसले के परिप्रेक्ष्य में तथा बिहार राज्य शासन, राजस्थान राज्य शासन एवं छत्तीसगढ़ राज्य शासन के द्वारा निर्गमित विभिन्न् शासनादेशों के समान ही इस वर्ष के पर्यूषण पर्व - द्वितीय भाद्रपद सुदी चतुर्थी से द्वितीय भाद्रपद सुदी चतुर्दशी तक यानी 19 सितम्बर से 28 सितम्बर, 2012 तक के दिनों में तथा आगामी प्रत्येक वर्ष के लिए भी इन्हीं तिथियों हेतु (तिथियां) के आधार पर तत्कालील वर्ष के दिनाकों का निर्धारण कराकर प्रदेश में स्थायी शासनादेश जारी करके पर्यूषण पर्व के 11 दिनों को “अहिंसा दिवस” घोषित कर उन दिवसों में राज्य के सभ बूचड़खाने, मांस विक्रय केन्द्रों को बंद करने का आदेश प्रसारित किया जाये।

(11) इस सम्बन्ध में आपके द्वारा वर्ष 2012 के पर्यूषण पर्व के उक्त 10 दिनों तक एवं आगामी प्रत्येक वर्ष हेतु स्थायी शासनादेश अतिशीघ्र प्रसारित कर आदेश की एक प्रति हमें प्राप्त हो, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ऐसा आपसे निवेदन है।

धन्यवाद !

 

CONFERENCE & EVENTS
संपूर्ण दिल्ली एवं एन. सी. आर. में आयोजित होंगे धर्मयोग ध्यान साधना शिविर

शारीरिक -मानसिक- आध्यात्मिक सुस्वास्थ्य की प्राप्ति, तनाव, व्यसन मुक्ति हेतु ग्रीष्मावकाश २०१२ (अप्रेल, मई, जून ) में परम पूज्य, मंत्र मह्रिषी, ध्यान प्रज्ञ, अध्यात्म अध्येता, धर्मयोगी संत श्री १०५ योगभूषण जी गुरुदेव की प्रेरणा एवं सान्निध्य में धर्मयोग ध्यान साधना शिविरों का अनूठा आयोजन किया जायेगा। जिसमें तनाव, व्यसन, क्रोध, निराशा, पारिवारिक कलह, से मुक्त आत्मविश्वास से भरे हुए सानंद, सुखमय एवं सफल जीवन की कलाएं तथा स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार करने की अनूठी धर्मयोगी ध्यान विधियों को सिखाया जायेगा।

संपर्क सूत्र :- 9953474775, 09548797818, 8287764553, E-Mail : dharmayog999@gmail.com, Please Visit On: www.dharmyogi.com प्रेषक : सतीश सरल, 09548797818

तेरापंथ युवक परिषद् जयपुर द्वारा काव्य-संगोष्ठी का आयोजन

तेरापंथ युवक परिषद् जयपुर द्वारा एक काव्य-संगोष्ठी का आयोजन मुनि श्री जय कुमार जी के सान्निध्य में अणुविभा केन्द्र में किया गया। इस काव्य-संगोष्ठी में तेयुप द्वारा आयोजित वृहद् कवि सम्मेलन में आये हुये कवियों ने मुनि श्री के सान्निध्य में अनेक समसामयिक विषयों पर कविता के माध्यम से अपने भावों की प्रस्तुति दी। साथ-साथ आज के समय में हो रही नकल पर भी चिन्ता व्यक्त की। परिचर्चा में कवि सुरेन्द्र दुबे जयपुरद्ध, डॉ. कीर्ति काले; दिल्ली, डॉ. कैलाष मण्डेला; भीलवाडा, गौरव शर्मा ष्लाटर-फेमष्; मुम्बई, तेजकरण शर्मा ष्बेचैनष्; जोरा, मप्र. महेन्द्र ष्अजनबीष्; दिल्ली, जगदीष सोलंकी; कोटा, वेद प्रकाष ;दिल्ली आदि कवियों ने अपने विचार व्यक्त किये। इस संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुये मुनि श्री जय कुमार जी ने कहा कि कवियों को अर्थपूर्वक एवम् शालीनता के साथ रचनाये बनानी चाहिए। आज के समय में क्षणिक लोकप्रियता के लिये फुहड. हास्य की बहुत रचनाये हो रही हैं, जो आपको कुछ समय के लिये हॅंसा तो सकती हैं पर वो लम्बे समय तक लोगों की जुबान पर नहीं रहती। अर्थपूर्ण भावपूर्ण कविता ही अमर हो सकती है, लोगों की जुबान पर रह सकती है और साथ ही साथ ऐसी रचनाये करने में स्वंय को आत्मसंतोंष की अनुभुति होगी। इस अवसर पर आपने भी उपस्थित श्रौताओं को अपनी कविताओं से मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की कुषल संयोजना में श्री कैलाष डागा व श्री विकास जैन का श्रम उल्लेखनीय रहा। Terapanth Yuvak Parishad, E-Mail : typjaipur@hotmail.com

डॉ. पाटनी की पावर थिंकिंग् पाँच भाषाओं में विमोचित -दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले में हुआ भव्य समारोह

अंतर्राष्ट्रीय लेखक व मैनेजमेंट गुरू डॉ. उज्जवल पाटनी की चर्चित कृति ‘पावर थिंकिंग‘ का भव्य विमोचन समारोह 4 मार्च की रात को वर्ल्ड बुक फेयर में आयोजित हुआ। पावर थिंकिंग 2012 के वर्ल्ड बुक फेयर में एकमात्र कृति थी जिसे एक साथ पांच भाषाओं में रिलीज किया गया। इस वजह से इसकी काफी चर्चा रही।

प्रगति मैदान, नई दिल्ली में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री प्रदीप जैन, पूर्व सीबीआई निर्देशक व लेखक जोगिंदर सिंह, भारतीय दिगम्बर जैन महासभा के अध्यक्ष श्री निर्मल कुमार जी सेठी एवं जैन राजनीतिक चेतना मंच के महामंत्री श्री रविन्द्र जैन ने ‘पावर थिंकिंग का विमोचन किया। पावर थिंकिंग अंग्रेजी, बंगाली, गुजराती, मराठी और हिन्दी में जारी की गई। ‘भारतीय जैन समाज के शीर्ष प्रतिनिधी मंडल ने शाल, स्मृति चिन्ह व श्रीफल से डॉ. पाटनी का अभिनंदन किया।

डायमंड बुक्स के चेयरमेन श्री नरेन्द्र वर्मा ने कहा कि भिलाई का लोहा और डा. उज्जवल पाटनी की दो खास चीजें है जो देश के हर जिले में पहुंचते हैं। केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन ने डॉ. पाटनी को अंतर्राष्ट्रीय मंच का उभरता सितारा बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. उज्जवल का आने वाला भविष्य निश्चित उज्जवल है। श्री प्रदीप जैन ने पावर थिंकिंग की जमकर प्रशंसा की। प्रख्यात लेखक जोगिंदर सिंह ने कहा कि इस पुस्तक में दी गई वर्कशीटों ने इसे एक विश्वस्तरीय पुस्तक बना दिया है। आने वाले पांच वर्षों में हम इनको विश्व के शीर्ष लेखकों में देखेंगे। भारतीय दिगम्बर जैन महासभा के अध्यक्ष श्री निर्मलकुमार सेठी ने डॉ. उज्जवल पाटनी की प्रशंसा करते हुए इसे जैन समाज की उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि आज के युवा को संस्कृति से जोड़ने की जरूरत है। गिनीज विश्वरिकार्ड होल्डर डॉ. उज्जवल पाटनी ने अपनी उपलब्धियों से विश्व स्तर पर जैन समाज का नाम रोशन किया है। इस बारे में अधिक जानकारी हेतु www.ujjwalpatni.com देखें। Source: Ashish Jain, E-Mail : ppppltd@gmail.com

RECOGNITIONS & AWARDS
MR. AVINASH CHORDIA ELECTED NATIONAL PRESIDENT OF STHANAKWASI CONFERENCE (AISSJC)

In a fiercely fought election on 4th March,2012 Mr. Avinash Chordia defeated his nearest rival Mr. Manmohan Jain by 3520 votes. Mr. Avinash Chordia polled 11121 votes whereas Mr. Manmohan Jain received 7601 votes. The elections of All India Shwetamber Sthanakwasi Jain Conference are held once in two years. For the purpose of election, the entire country is divided into 5 zones and election process takes place from 13 centers establised in different parts of the country. Traditionally, conference leadership is considered to be very prestigious position in the community. Candidates work hard for number of years and spend a lot of money to secure their positions. Saint community also actively observe the political movements in conference. Mr. Avinash Chordia is known for his dynamic persona and belongs to progressive group. He is young and visionary. This time Community Members have very high expectations from him and his new team. In past, conference leaders avoided to join main stream of Jain Diaspora and remained in the sidelines of National Jaina System. Conference executives avoided addressing national issues. The coordination with other sects, organisations and institutions was never on priority. It is hoped now, Mr. Avinash Chordia will bring organisational and functional vibrations in the Sthanakwasi Samaj. Ahimsa Foundation wishes  Mr. Avinash Chordia all the success in his endeavor to provide exciting leadership. - P. L. Jain & A. K. Jain, Ahimsa Foundation.

TEHELKA CORRESPONDENT WINS CHAMELI DEVI JAIN AWARD

Tehelka's Principal Correspondent, Tusha Mittal, was awarded the 2012 Chameli Devi Jain award for Outstanding Woman Mediaperson on Tuesday 13 March in New Delhi. Eminent personalities such as Shravan Garg, Group Editor, Bhaskar, Seema Mustaga, columnist and Director, Centre for Policy Analysis, and Pamela Philpose, Director of Women's Feature Service comprised the jury. She was unanimously selected by the Jury for her sterling reportage of life in the raw at the margins in deep interior Bengal, Orissa and Chhattisgarh, in areas riven by bloody civil strife, Naxal and vigilante violence and dangerous living along the Bangladesh border, where cattle smuggling is rife. Mittal was handed the 34th Chameli Devi Jain award by the Chief Election Commissioner SY Quraishi. Receiving the award, she said that, the work journalists do in the regions of conflict would be difficult without the help of local media persons. Speaking at the event, Quaraishi lauded the role of women in the electoral process. The award ceremony was followed by the release of a book titled "Making News, Breaking News, Her Way". The ceremony was followed by a panel discussion on "What has changed because of women in the media" featuring Barkha Dutt, Neena Vyas and Prof. Nirija Gopal Jayal from Jawaharlal Nehru University.

JAIN MINORITY ISSUE - A REPORT
REQUEST TO GOVERNMENT OF INDIA FOR RECOGNISING JAINS AS MINORITY COMMUNITY
Jain community has been demanding National Minority Status for last twenty years under the National commission for Minorities Act, 1992. Recently, on 14th Feb, 2012, at National Commission for Minorities meeting, the Commission decided to write to the Minority Affairs Ministry, Govt. of India to decide on the National Minority Status to the Jain community. We request the Union Cabinet & Minority Affairs Ministry to take an objective, fair, un-biased, judicious decision in this regard. Under Articles 27 of the International Covenant on Civil and Political Rights 1966 (ICCPR) of United Nation Human Rights, (UNHR) guarantees minority rights in the following terms: as “In those States in which ethnic, religious or linguistic minorities exist, persons belonging to such Minority groups shall not be denied the right, in community with the other members of their group, to enjoy their own culture, to profess and practice their own religion, or to use their own language.”

The concept of "Minority" is not only in India, It's around the world, as India is a signatory to the International Covenant on Civil and Political Rights. The United Nations General Assembly unanimously adopted on December 18, 1992, a Declaration on the Rights of Persons Belonging to National or Ethnic, Religious and Linguistic Minorities. Pandit Jawaharlal Nehru, India’s first Prime Minister, Who laid down the foundation of Modern, Socialist and Secular Democracy, himself clarified many times that Jains are an ancient minority. Dr Babasaheb Ambedkar under Article 25 clause II of the Indian Constitution made it crystal clear that Sikhs, Buddhists, Jains, are a distinct religious minority.

Jains have been included as a minority by notifications in States like Maharashtra, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Rajasthan, Karnataka, Chhattisgarh, Jharkhand, Uttarakhand, West Bengal, Delhi, Andhra Pradesh, Punjab State minority commission. Gujarat is the only State having a sizeable of 525,304 Jain population, which has not granted minority Status to Jain community by the Gujarat government despite several correspondences made to the Chief Minister Narendra Modi. It clearly shows the biased attitude of the Gujarat Chief Minister and its administration towards Jain minority issue and also other minorities particularly Muslims. Haryana & Gujarat are two states, who do not have their own State Minorities Commission. Even in the Census, Jains are counted separately right from 1851 to 1951-2011. According to the 2001 Census, Jains constitute 0.40 per cent of the total population & current census 2011, Jains account for 0.50 per cent of the total population of the country.

Jainism and Buddhism are tradition original and older Stamina tradition. Both the Jains and Buddhists rejects the authority of Vedas and successfully opposed the inhuman Brahmanical orthodoxy of Caste discrimination, Gender bias, the superstitious practice of animal sacrifice and denial of scriptural access to women and members of the lower caste. Jainism also did not accept the concept of Creator God that created the Universe. One must achieve their goals through their own efforts, and not by divine intervention. Jainism lays greater emphasis on rational, scientific, compassionate and ethical way of life based on complete equality. Jain tradition, the first Tirthankar and founder of Jainism Lord Rishabhdeb gave to the world the triple concept of Asi (Sword of Defence), Masi (Ink, Arts, culture, writing and Education) and Krishi (representing settled agricultural way of life).

Prime Minister Dr Manmohan Singh, while launching the Jain Manuscripts catalogue of collection in the British Library of London at New Delhi, dated 27th May, 2006 said “This ancient land of India has been home to some of the greatest religious movements and religions known to mankind, among which Jainism occupies an important place of pride. It is an important constituent of our composite culture and civilizations heritage.” “Further he said: “The rational basis of Jainism has contributed to the growth of scientific temper and the fight against superstition and blind belief. Rejecting the rigidities of doctrine, Jainism presented a new openness and in a new freshness in our approach to matters considered spiritual. This approach has helped in grappling with social, religious and even economic problems facing mankind. Jainism is part and parcel of the rich tradition of rational intellectual discourse that has flourished in this ancient land of India.

“Indeed, Mahatma Gandhi wrote that “Jainism represents the highest flight of logic. It has taken nothing for granted and has endeavoured to prove metaphysical truth by challenging the intellect”. The tradition not to take anything for granted and examine all postulates on the basis of reason and intellect needs to be followed in our own time”. Dr. S. Radhakrishnan, the former President of India, in his book "Indian Philosophy Vol I" & 6th Volume of The Cultural Heritage of India mentioned as under:

"The Bhagawat Purana endorses the view that Rishbhadeva was the founder of Jainism. There is evidence to show that so far back as the first century B.C. there were people who were worshipping Rishabhadeva, the first Tirthankara. There is no doubt that Jainism prevailed even before Vardhamana Mahaveera or Parsvanatha. The Yajurveda mentions the names of three Tirthankaras-Rishab, Ajitnath & Aristanemi."

On the occasion of the Dalit-Minority International Conference held on December 27, 2006 at New Delhi Prime Minister Dr Manmohan Singh in his speech said “ In an international conference like this it is relevant to recognize that a minority in one country or region could be a majority elsewhere. Indeed, every social and religious group can claim to be minority somewhere or the other” “Some minorities in India have done better than others. For example, in India minority communities like Jains and Sikhs have fared relatively well from the process of social and economic development” he said.

There is an irrational fallacy that all Jains are a rich minority. So by that argument Parsis are much better than the Jains, so they are included in the minority list nationally and very important is that “Minority" is not determined on the bases of their financial status, but on the bases of their population. There are thousands of Jains in India particularly in the State of Karnataka in the Belguam & Dharwad district live below poverty line (BPL) and live in severe deprivation. Even in State of Rajasthan district like Pali, Jalore, Rajsamand, Udaipur, here Jains are both educationally & economically backward. In states like Uttar Pradesh, Bihar and Jharkhand, here there are several tribal Jains, who live in such deprivation that they are found begging. This is a painful fact. May be the Prime Minister 15 point welfare program for the Minorities could help them to come out of their backwardness and deprivation.

It’s a myth that all Jains are rich minority. In the State of Karnataka, where Jain community have already been granted OBC Status by the Govt. of Karnataka. Here Jains in Belgaum and Dharwar District of Karnataka State live in severe deprivation and are sending their children to beg for food and other basic needs. They are not been literate, as they have never gone to School. In Uttar Pradesh and Bihar, Jharkhand, here we have tribal Jains, who have preserve ancient Jain religion, but they live in severe poverty and do not have access to their basic needs like Food, education, health-care, housing or economic opportunity. Here also Jains are found to be begging for their basic needs. In forest or in farms, they do some labour work and earn their livelihood through meagre wages daily. In Rajasthan’s Marwar and Mewar regions like Pali, Jalore, Barmer, Sirohi, Udaipur, Bhilwara, Pratagarh, Chittorgarh and Rajsamand district, here Jains are most educationally and economically backward and also been victims of communal riots some years back from the communal saffron forces. In the Kutch region of Gujarat, there are several Jains who live Below Poverty Line & have no source of livelihood. Even in rural Maharashtra, here thousands of Jains live distress and poverty. They are mostly poor farmer and small shop-keepers.

Jainism in Tribal Communities- According to the famous report of Sachar commission report, 2.6% of total Jains belong to the tribals. Jainism is widespread amongst tribal communities of India. We can see Jainism amongst tribal communities all over India, including Gujarat, Rajasthan, Punjab Jammu & Kashmir, Karnataka, Maharashtra, Bengal etc. Some of such tribal communities are traditionally Jains, others are converted to Jainism in recent days. Some of the tribal communities amongst which there are considerable number of followers of Jainism are, Kurumba/Kuruba (Karnataka), Gadaria, (Gujarat), Meena (Rajasthan), Gujjar (all over western India), Bakarwal (Kashmir). Two big tribal communities Saraak (Bengal and Jharkhand) and Parmar, Solanki Kshatriya (Gujarat) are well known tribal Jain communities.

According to Justice Sachar Commission report & Justice Ranganath Misra commission both Jains & Parsis do not believe in caste system or any kind of discrimination based on Gender and hence there is no Schedule caste (SC) category among Jains and Parsis. When Communal riots broke out in Gujarat in 2002, it was Jain Acharya Mahapragya, who led the Ahimsa Yatra, not only preached but practised ahimsa as an instrument for extinguishing the flames of communalism and healing the wounds of fellow Indian citizen. Nonviolence, compassion, Anekāntavāda or dialogue with an open mind, inclusive policies can become an antidote not only to nuclear destruction but also to terrorism, naxalism, communalism and separatist tendency. Later the Indian Government felicitated him with the Indira Gandhi Award for National Integration for the year 2002.

Supreme Court on Minority Rights - In the opinion of the Eleven judges constitutional bench of the Supreme Court of India hearing a petition filed by T.M.A. Pai Foundation v/s State of Karnataka, in this order dated Oct 31, 2002, the court through its judgement upheld the rights of both religious & linguistic minorities to establish and administer educational institutions of their choice, as the petition was primarily filed for the administrative & management rights of minority educational institution and judgment was not for declaring any community, a minority either at the State or National level . This judgement creates no hurdle or obstruction in granting National Minority Status to the Jain community in India, as the judgement must be read in letter and spirit.

D.A.V. College v/s State of Punjab 1971, Supreme Court said, that minority status of a person or group of either religious or linguistic is to be determined by taking into consideration the entire population of the country through Central legislation & State minorities through should be determined by taking into consideration the entire population of the State through State legislation. This means National and State Minorities Commission are entirely two different commissions taking into consideration the population of a given community at the National and State level. e.g., Hindus are a minority in the State of Punjab, Jammu & Kashmir, Nagaland, Mizoram and Meghalaya, therefore Hindus must be included in these respective State Minorities commission. Even in the Bal Patil v/s the Union of India,2005, the Supreme Court said that it was for the Central Government to decide on the recommendation of the National Commission for Minorities that Jain must be declared National Minority. (This Order after T.M.A. Pai Foundation judgement of 2002). In a another case division bench of the Supreme Court of India in the case, Committee of Management Kanya Junior High School Bal Vidya Mandir, Etah, U.P. V/S Sachiv, U.P. Basic Shiksha Parishad, Allahabad, U.P.,Civil Appeal No. 9595 of 2003, decided On: 21.08.2006, Supreme Court of India in one line if I para phase the Judgement that said that Jain are a National Minority. (This Order after T.M.A. Pai Foundation judgement of 2002).

In case the Jain community is not included in the National Commission for Minorities by the Central Govt, this will be inconsistent with and also contravenes Articles 14, 15, 16, 25, 29 & 30 of the Indian Constitution that guarantee, right to equality, right to equality before law, equality of opportunity, freedom of conscience and protect the citizens from discrimination by the State on grounds of religion, language, caste or creed and rights of minorities to their protection of their cultural, religious and educational rights.

As the Union Cabinet had already approved 103rd constitutional Amendment bill chaired by our Prime Minister Dr Manmohan Singh, which has the power to define National Minority in the country, thus grant Constitutional Status to NCM and this bill makes way for the Jain community to be declared National Minority. (Dated Dec 19, 2008, Union Cabinet cleared this bill). Even Article 29 & 30 of the Indian constitution recognises that Religious & linguistic minority have a Fundamental Right to run & manage and administer their own educational & religious Institution. Which gives direct protection to Jain religious pilgrimage, which are illegally taken over by fundamentalist forces and Jains will have a right to set-up their own education institute and thus manage and give their community students administration up to 50%. Eg St. Stephen’s College, New Delhi & St. Xavier’s College, Mumbai who are Christian Minority institute.

Both the Justice Sachar Commission report & Justice Ranganath Misra commission clear states "Jains are distinct religious minority” report has already been tabled in Parliament. Ranganath Misra report further validates that Jains and Parsis are the only two communities, which in theory and practice do not have caste system or have Scheduled Caste category. Jainism emphasis that all women and men have equal status.

Three times the National Commission for Minorities has recommended to the Central Govt. to include the Jain community in the National Commission for Minorities. The first recommendation of the NCM dated 01.11.1994:- Justice Mohd Sardar Ali Khan sent a letter to Shri Sitaram Kesari, the than Union Minister for Welfare on the basis of the commission’s 172nd meeting, held on 3-10-1994 and reached the unanimous conclusion that prima facie “the Jains belong to a separate religion, quite distinct from the Hinduism and that, therefore, they deserve to be included in the list of Minorities already notified by the Govt. of India on the October 23, 1993.”

The Second recommendation on 22.02.1996 vide letter no. 10103/95- NCM, Shri Tirlochan Singh, Secretary, NCM sent a letter to Shri K.B. Saxena, Secretary to the Govt. of India, Ministry of Welfare on the basic of commission’s meeting held on 05.02.1996 as follow: - The Commission after considering this issue at its meeting held on 5.2.1996 “that a statuary recommendation be made to the Govt. of India for inclusion of Jains in the list of minority community.” I am accordingly directed to convey to the Govt. of India “the above recommendation of the Commission under Section 9(1) (C) of the NCM Act, 1992 to include Jains in the list of Minorities.”

The Third time the National Commission for Minorities forwarded the representation dated 30.08.2007 of Vishwa Jain Sangathan for declaring ‘Jain religion’ as national religious minority to the Ministry of Minority Affairs, dated 17.09.2007 by letter no 81/71/04-NCM without any objection. (This recommendation after T.M.A. Pai Foundation judgement of 2002).

National Commission for Minorities Act, 1992 currently consists of the following communities: Muslims, Christians, Parsis, Sikhs, and Buddhists.

We request to the Union Cabinet & Ministry Minority Affairs, Govt. of India to recognise Jain community as a minority community by issuing a notification under the provisions of the National Commission for Minorities Act., 1992.

DIKSHA
1. Mumuksha Lalita Bokadia daughter of Smt. Uddhav kunwar and Shri Champal Lal ji Bokadia hailing from Jodhpur accepted Bhagwati Diksha at Vill. Kuchera, Dist. Nagore on the 2nd February, 2012 with the blessings of Pravartak Shri Roop Muni Ji maharaj belonging to Shwetambar Sthanakwasi sect.Apart from many other saints from same sect, Shri Nityanand Vijay Ji maharaj from Moorti-pujak sect was also present to give his blessings. Large number of devotees were also present to grace the occasion. After diksha, Lalita was renamed as sadhwi Labdhi Prabhi Ji. She will join the sadhwi group with Shri Kamal Prabha Ji maharaj.

2. Mumukshu Kusum Behn and Mumuksha Shri Aditya Mehta both accepted Diksha in the Sthanakwasi sect at village mahidpur, near Badnavar (M.P.) on the 5th February, 2012 with the blessings of Ganadheesh Shri Umesh Muni Ji maharaj (Anu). They were renamed as Shri Kalsi Ji maharaj and Shri Aditya Muni Ji maharaj. Reception in the honour of these sadhwi was organised earlier at Badnavar on the 3rd February.Several dignitaries and devotees were present at the reception.

3. Mumuksha Sheetal Chordia from Chennai accepted diksha in the Sthankwasi sect at Ratlam in the holy presence and blessings of Pravartak Shri Ramsh Muni Ji maharaj and other saints, Sadhwi Pramukha Pravartini Shri Chandan Bala Ji maharaj and several others. Shri Kesari Mal Ji Burad, Chairman of Jain Conference and other office-bearers were also present on the austere occasion.

4. Km. Darshana Chopra from Jalgaon (Maharashtra), studying in B.A. First year and Km. Shweta Bohra from Ahmed Nagar, having passed B.Sc. and M.A. accepted Bhagwati Diksha at Pali (Rajasthan) in with the blessings of Sadhwwi Gyan Prabha Ji on the 5th March, 2012.. Accompanying other sadhwi, they have already travelled about 2500 m Km. by now.

5.Shreepal And Dhruvit From Vapi Become Jain Monks, Vapi : It was an emotional moment not only for the parents of two young boys, but also for over 2,000 people, who had gathered to witness their initiation into monkhood . Shreepal Desai (24) and Dhruvit Dasadia (14), who belong to well-to-do families, bid farewell to their parents after taking 'diksha' of Jain monk from Acharya Yasho Varma Maharaj Saheb. Shreepal was re-christened Soham Yash Vijayji Maharaj and Dhruvit as Arhham Yash Vijayji Maharaj. Acharya Yasho Varma Maharaj, Acharya Ajit Yash Maharaj and Acharya Ratnabhushan were among those who blessed the two young monks.

6. Km. Dipti and Chahat Jain will be provided diksha at Panipat on 1st April, 2012 in the holy presence of Sthanakvasi saint Upadhyay Shri Ramesh Muniji, Upparvartak Dr Rajinder Mujniji, Yuva Sant Shri Surender Muniji, Maha Sadhvi Kusum Prabhji and many other saints. Large scale arrangements have been made by Panipat Jain Sangh to celebrate the event. Devotees are expected from across the India to attend the programme. Diksha event will include a very long procession passing through various areas of Panipat and thereafter several rituals etc.

MISCELLANEOUS
आगरा दिगंबर जैन समाज में शतप्रतिशत शिक्षहोगी

आगरा, दिगंबर जैन महा समिति की बैठक में बच्चों को शिक्षित किये जाने पर जोर दिया गया। संकल्प लिया,धन के अभाव में कोई विद्यार्थी अशिक्षित नहीं रहेगा। महासमिति की उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल की बैठक अग्रवन, वाटर वर्क्स चौराहा पर आयोजित की गयी। शुभारंभ एमएस जैन, अध्यक्ष उत्तरांचल, प्रदीप जैन पीएनसी, भोलानाथ जैन, पवन जैन, अनूपचंद जैन और चंदाबाबू जैन ने संयुक्त रूप से किया। मंगलाचरण आशा सोनी ने किया। राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय जैन ने कहा कि अब तक जैन समाज 94 प्रतिशत ही शिक्षित है। अब उसे शत प्रतिशत शिक्षित बनाना होगा। दिंगबर जैन समाज के प्रत्येक बालक-बालिका की शिक्षा में गुणवत्ता पर ध्यान दिया जायेगा। इसके लिए गांव-गांव जाकर जैन समाज के विद्यार्थियों का अध्ययन किया जायेगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 15 जनपदों का चयन किया जा चुका है। समारोह में स्वरूपचंद जैन मारसंस, मुन्नालाल जैन, अनूपचंद जैन, जगदीश प्रसाद जैन, अशोक जैन पूर्व डिप्टी मेयर आदि ने विचार व्यक्त किये। निरंजन कुमार जैन, सुमत कुमार जैन, एमएस जैन ने अतिथियों का स्वागत और सुमत जैन ने संचालन किया।

NAGPUR SPIRITUAL COUNSELLOR MANJU JAIN USES FILMS TO SPREAD HER STUDY

Adding a different hue to the ongoing International Film Festival in the city, Manju Jain as presented two documentaries, 'A Tale of the Jain Saint' and 'Kavya Ka Karishma'. The two films, a documentary and an animation have been made with the objective of introducing the audience to the spiritual heritage of India and also how it can also be a mean of healing.

An MBA and a Company Secretary by profession, Manju Jain is actively pursuing the cause for social good. Deeply religious, Manju has studied the scriptures to cull out what could be of immense social use and is now disseminating the information through these two short films. She says, "I had been watching the lives of the Jain monks for years and realized that, the general public describes a Jain monk as someone who does not even adorn clothes. What they miss out on is how much hardships they endure. They walk for miles together in a day and survive only on one meal had at ten in the morning." The film, made in February 2010, was first shown at the International Art Festival hosted by Nagpur University. Manju Jain wishes to take her films to Cannes festival. Manju has also delved deep in the scriptures and says that the 48 Bhaktambar shlokas written by Acharya Manntunga Charya 600 years back hold the cure for many physical diseases. Made in animation format the film depicts all shlokas and also their curative value. "It is not traditional animation. We shot it at the Jain International School in Nagpur and later using a technology called green curtain it was turned into animation format. Sarika Pendse and her husband Sanjay acted in the film." It was a German professor who had first translated these shlokas from Sanskrit to German in 1875. Jain says that she took up this task and got a translation done in French. The film was made in 2011. "I want to make 48 films dedicated to each shloka and want it to be shown on Pogo and Disney channels. If they can make films on Bhim and Ram, which are very popular, then I am hopeful that this too would click. My aim is to inform the children about the healing powers of these shlokas," she says.

SURESH JAIN’S ARREST THROWS UP UNANSWERED QUESTIONS

The arrest of Sena MLA Suresh Jain has created many new controversies in the Maharashtra politics. The questions are being raised about the the timing of Jain’s arrest. One wonders, why the arrest was not made at the time of lodging the FIR six years ago. The FIR was lodged against the Khandesh Builders Limited, allegedly a front company of Jain, for irregularities in 2006, when the MLA was in the ruling NCP. His name was spared then. A Sena leader has claimed that Jain’s arrest has the political background.

PRIEST ARRESTED FOR THEFT AT JAIN TEMPLE PUNE
A priest was arrested on Saturday for allegedly stealing ornaments worth Rs 4.8 lakh from the famous Jain temple at Khadki Bazaar temple. The suspect, Arjunsinh Tirusinh alias Shivpratapsinh Rajput (22) of Gujarat, worked as a priest with the same temple before quitting his job a few months back. The police launched a probe after the theft of 8.5 kg silver ornaments of the idol from Munisurat Swami Bhagwan Jain temple came to light on Saturday morning.The identity of the suspect was not known then as investigations had revealed that a man had committed the theft by opening the temple door with a set of keys. Police said they zeroed in on the former priest as investigations had revealed that the theft was committed by a person who was aware of the temple's functioning. In an hour's time, the police recovered the stolen ornaments from Rajput who had hidden it in his room near the temple. Later he was taken into custody. Rajput had quit the job as a priest after the death of his mother a month ago, but he later started staying with his brother. Rajput told the police that he committed the crime for quick money. Jadhav has directed temple officials to install a CCTV camera, appoint trained guards and to form a committee to take review of security and to keep ornaments in safe custody.

IDOLS STOLEN FROM BOKARO JAIN TEMPLE

A nearly three-decade-old Jain temple in the heart of Bokaro steel city was robbed of three ashtadhatu idols and 13 silver parasols — approximately valued at around Rs 12 lakh. The daring incident is a grim reminder of the desecration of idol and theft at the centuries-old Rajrappa temple in Ramgarh district, which triggered a wave of resentment and security tizzy in the state in July 2010. Sources at the Sri Digambar Jain Mandir, which is situated on NH-23 in Sector II-D of the steel city, said the culprits had taken away the 13-inch-tall idol Lord Parshwanath and 11-inch idols of Lord Mahavir and Lord Shantinath. All the three ashtadhatu idols were plated with gold and studded with diamonds. The silver parasols, on the other hand, were of different sizes (three big and rest small) and together they weighed around 3kg. President of Digambar Jain Samiti Mahendra Kumar Jain said the idols were on their respective singhasans (thrones) at 8pm on Wednesday, when the aarti was performed. The gate of the temple was closed after that.

The theft was first noticed around 4.30am by the temple’s 54-year-old caretaker Ram Dular Singh, who has been staying on the premises with his family for 26 years. Singh, as is his routine, woke up before dawn to clean the temple premises only to find a window grille in the main hall dismantled. He found a screw driver on the floor and the three idols missing, and reported the matter to founder member Indra Chandra Jain. The latter informed police. Sri Digambar Jain Mandir, which attracts a daily footfall of 500-odd devotees, was built in 1983. The stolen idols were, however, ferried in 1992 from Jaipur in Rajasthan. President of Bokaro Chamber of Commerce Sanjay Baidya said the thieves left behind a few silver worshipping tools, but cleaned out the idols, hurting the sentiments of the Jain community as a whole. Coal Belt DIG Laxman Singh, Bokaro SP Kuldeep Dwivedi and Intelligence Bureau officers rushed to the spot in the morning for investigations. A sniffer dog was also pressed into service.

लोनी श्रीपार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चोरी

गुलाब वाटिका कालोनी के श्रीपा‌र्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में शुक्रवार की रात चोरों ने अष्टधातु की तीन मूर्ति, एक छत्र व दानपात्र में रखी लाखों की नकदी चोरी कर ली। मंदिर में चोरी की घटना से पुलिस में हड़कंप मच गया। पुलिस के साथ-साथ डॉग स्क्वायड व फिंगर प्रिंट की टीम मौके पर पहुंची। इस मंदिर में 20 वर्ष के दौरान चोरी की यह दूसरी घटना है।

गुलाब वाटिका कालोनी में श्रीपाश्‌र्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर है। शुक्रवार की रात चोर मंदिर की दीवार फांदकर दूसरी मंजिल पर पहुंचकर दरवाजे का ताला तोड़कर अंदर घुस गए। उन्होंने दानपात्र का ताला तोड़कर उसमें रखी नकदी चोरी कर ली। इसके उपरांत ऊपरी हिस्से के चैनल में लगे ताले को तोड़ दिया और यहां रखी अष्टधातु की तीन मूर्तियां चोरी कर ली। घटना के समय मंदिर के नीचे बने कमरे में व्यवस्थापक रिंकू व उसकी मां उर्मिला सोए हुए थे। शनिवार सुबह दूसरे व्यवस्थापक वेद प्रकाश मंदिर पहुंचे तभी चोरी होने का पता चल सका। उसने तत्काल ही घटना की सूचना मंदिर प्रबंधन समिति के पदाधिकारियों के अलावा पुलिस को दी। मंदिर में चोरी होने की सूचना मिलने पर थोड़ी देर बाद ही थाना प्रभारी अवनीश दीक्षित पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और मौका मुआयना किया। दोपहर को पुलिस अधीक्षक ग्रामीण अजय कुमार मिश्रा भी मौके पर पहुंचे। व्यवस्थापक वेदप्रकाश का कहना है कि चोरी गई अष्टधातु की तीन मूर्तियों की कीमत अनमोल है। इसके अलावा दानपात्र से भी कई महीने से नकदी नहीं निकाली गई थी। जिससे उसमें भी करीब तीन लाख रुपये थे। उन्होंने बताया कि वर्ष 1992 में भी इस मंदिर से चोरों ने अष्टधातु की पांच मूर्तियां चोरी कर ली थीं। पुलिस अभी तक इस चोरी के मामले का भी खुलासा नहीं कर सकी है। चोरी की सूचना मिलने पर डॉग स्क्वायड व फिंगर प्रिंट की टीम भी मंदिर पहुंची और जांच पड़ताल की। लेकिन कोई सुराग हाथ नहीं लग सका। व्यवस्थापक वेद प्रकाश ने घटना की तहरीर लोनी थाने में दी है। उधर मंदिर में चोरी की दूसरी घटना से जैन समुदाय के लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

बांसवाड़ा जैन मंदिर चोरी का पर्दाफाश
दानपुर थाना पुलिस ने गत 4 फरवरी की मध्यरात्रि को छोटी सरवन स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में प्रतिमाएं, छत्र, मुकुट एवं अन्य सामान की चोरी का राजफाश कर दिया है। पुलिस ने शनिवार को इस मामले में अभियुक्त मोतीलाल पुत्र हुकमचंद गणावा निवासी बस्सी मकवाना, विशाल पुत्र नानु मईड़ा निवासी पीपलवा, नानु पुत्र शांतिलाल डामोर निवासी सागवाडिया तथा दिलीप पिता देवजी डिंडोर निवासी लिमथान को गिरफ्तार किया है। पुलिस की विज्ञप्ति में बताया गय कि इन लोगों ने अपने दो अन्य साथी राजू पिता दलजी चारेल निवासी सागवाडिया, मुकेश पिता सेवालाल चरपोटा निवासी सागवाडिया के साथ उक्त वारदात करना स्वीकार किया है। इन लोगों ने अपने दो साथी को गुजरात के वापी में चोरी करते हुए गिरफ्तार होना भी बताया। इन लोगों ने कुछ प्रतिमाएं नकली धातु की होने की जानकारी पर उन्हें गेमन पुलिया में फैकना बताया है। पुलिस अधीक्षक अमनदीप सिंह कपूर ने बताया कि गोताखोर लगातार इन प्रतिमाओं की तलाश करवाई जा रही है वहीं चोरी के आभूषण को बरामद करने के प्रयास किये जा रहे हैं। ये अभियुक्त पूर्व में भी लूट, डकैती, चोरी, नकबजनी के कई प्रकरणों में लिप्त पाए गये और कई जिलों में चालान भी हुए हैं।

BOOKS ON JAINISM

A HANDBOOK OF JAINOLOGY - By Acarya Bhuvanabhanu, An English translation of Jain Dharma Ka Parichaya by Prof K. Ramappa, 2006 22 x 14 cm 242 pages, Hardcover - This is a very powerful work, a well thought out introduction to varies aspects of the Jain religion. It conveys the essence of the Jain scriptures which were composed thousands of years ago, in Prakrit and Sanskrit. The seemingly technical content of the Jain Agamas has been lucidly conveyed. Complex philosophical ideas are explained in a reader-friendly manner. Upon reading this work, one comes away with a very clear and unequivocal idea of the Jain doctrine. This book is compulsory reading for anyone who wishes to study Jainism.Each chapter is fairly short, and is followed by simple questions. If you can answer those questions correctly, you have understood the chapter. This book is the ideal text for students of Jainism, Indian Philosophy and Comparative Religion. It has been heavily subsidised by the Jain community, so that it may be spread far and wide by readers and scholars alike.

The author, Gacchadhipati Acarya Bhuvanabhanu Suri was one of the leading Jain scholars of the 20th century. He was the Gacchadhipati of the Tapa Gaccha, in the illustrious lineage of Gacchadhipati Acarya Dana Suri and Gacchadhipati Acarya Prema Suri. His ascetic order, now under the headship of Gacchadhipati Acarya Jayaghosha Suri, is perhaps the largest ascetic order in the Jain community. Acarya Bhuvanabhanu Suri was a profound scholar of Prakrit, Sanskrit, Tarka, Nyaya and Agama. His gift was to be able to explain advanced concepts of philosophy in the simplest language. His exhaustive Gujarati commentary on Acarya Haribhadra’s Sanskrit gloss on the Shakra Stava, known as the Parama Teja, is said to be one of the masterpieces of the 20th century and places Acarya Bhuvanabhanu in the same class of scholarship as Acarya Haribhadra, Acarya Hemacandra and Mahopadhyaya Yashovijaya. Source : Himanshu Parek, E-Mail : him_parekh@yahoo.co.in

JAIN CALENDAR FOR THE MONTH OF APRIL, 2012
(VIR SAMVAT 2538 JAIN CALENDAR VIKRAM SAMVAT 2068)
Produced By Mr. Kishor B. Shah E-Mail: kshah12179@aol.com

 

Aatham | Chaudas | Pancham | Bij | Agiyaras

 

Jain Festival

 

Auspicious Day

CHAITRA - APRIL 2012 - VAISHAKH
Mon Tue Wed Thu Fri Sat Sun

Avoid Green & Root Vegetables Date : 3 | 5 | 8 | 11 | 13 | 16 | 20 | 23 | 26 | 29
Avoid Root Vegetables
Date: 1 | 4 | 6 | 7 |15 | 19 | 24 | 25 | 28 | 30
Jain Festival
Date : 1-6 - Ayambil Oli
Date: 6 - Poonam and Ayambil Oli Finishes
Date : 7 - Ayambil Oli Parna
Date : 24 - Varshitap Parna
Auspicious Day
Date : 1 - Sumatinath Nirvan Kalyanak
Date : 4 - Mahavirswami Janma Kalyanak
Date : 6 - Padmaprabhu Kevalgnan Kalyanak
Date : 7 - Kunthunath Nirvan Kalyanak
Date : 8 - Shitalnath Nirvan Kalyanak
Date : 11 - Kunthunath Diksha Kalyanak
Date : 11 - Shitalnath Chavan Kalyanak
Date : 15 - Naminath Nirvan Kalyanak
Date : 19 - Anantanath Janma Kalyanak
Date : 20 - Anantanath Diksha & Kevalgnan Kalyanak
Date : 20 - Kunthunath Janma Kalyanak
Date : 25 - Abhinandan Chavan Kalyanak
Date : 28 - Dharmanath Chavan Kalyanak
Date : 29 - Abhinandan Nirvan Kalyanak
Date : 29 - Sumatinath Janma Kalyanak
Date : 30 - Sumatinath Diksha kalyanak

30
Sud Nom
1
Sud Nom
2
Sud Dasam
3
Sud Agiyaras
4
Sud Baras
Teras
5
Sud Chaudas
9
Vad Ekam
7
Vad Ekam
8
Vad Bij
9
Vad Trij
10
Vad Choth
11
Vad Pancham
Vad Chhath
12
Vad Satam
13
Vad Aatham
21
Vad Amas
22
Sud Ekam
16
Vad
Agiyaras
17
Vad Baras
18
Vad Baras
19
Vad Teras
20
Vad Chaudas
21
Vad Amas
22
Sud Ekam
23
Sud Bij
24
Sud Trij
25
Sud Choth
26
Sud Pancham
27
Sud Chhath
28
Sud Satam
29
Sud Aatham

DEV LOK GAMAN
गणाधीश श्री उमेश मुनि जी म. को श्रद्धा सुमन अर्पित - समाज की क्षति अपूर्णीय: दिनेश मुनि

उदयपुर दिनांक: 20 मार्च 2012 - 18 मार्च 2012 को उज्जैन (मध्यप्रदेश) में आकस्मिक देवलोकगमन को प्राप्त श्रमण संघ गणाधीश श्री उमेश मुनि जी. म. को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए श्रमण संघीय सलाहकार दिनेश मुनि ने कहा कि उनके आकस्मिक देवलोक गमन से समाज को जो क्षति हुई है वह अपूर्णीय है। जन जन के मन में धर्म आस्था का सूर्य दीप्तिमान करने वाले महान साधक का अवसान हुआ है जिससे समाज व संघ पर वज्रघात हुआ है। उनका व्यक्तित्व व कृतित्व संप्रदाय से परे था। उनके आध्यात्मिक विचार प्रत्येक आध्यात्मिक रसिक के लिए बेहद उपयोगी है। उन्होनं गद्य व पद्य में प्रचुर लिखा, मौलिक व प्रामाणिक लिखा। जैन धर्म और श्रमण संघ के लिए उनका बहुआयामी एवं व्यापक योगदान रहा, मूल्यांकन करते हुए वर्ष 1997 में तत्कालीन श्रमण संघीय तृतीय आचार्य सम्राट् श्री देवेन्द्र मुनि जी म. ने आपश्री को ‘जिनशासन गौरव’ की उपाधि दी थी। आगे कहा कि धर्मसाधना उनका जीवन लक्ष्य था, दृढनिष्ठा उनका प्रगतिपथ था, विवेक और विचार उनके मार्गदर्शक थे, और यश प्रतिष्ठा मान सम्मान उनके अनुगामिनी थे। उन्होंने अपनी तपष्चर्या व अद्वितीय साधना के द्वारा जैन संस्कृति के गौरव को बढाया हैं। वे हमेशा समाज के उत्थान व अहिंसा की बात करते थे। इस अवसर पर डॉ. द्वीपेन्द्र मुनि, डॉ. पुष्पेन्द्र मुनि, ग्रन्थालय के सहमंत्री मानसिंह रांका, देवेन्द्र धाम के मंत्री गणेशलाल गोखरु, अहिंसा विचार मंच के अध्यक्ष डॉ. दिलीप धींग, सोहन कुंवर जैन महिला मंडल की मंत्री भारती करणपुरिया, देवेन्द्र महिला मंडल की अध्यक्षा सुधा भंडारी आदि ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए निष्काम कर्मयोगी बताया। पुष्पेन्द्र मुनि E-Mail: pushpendramuni@gmail.com

मधुमेह की बीमारी से ग्रसित योगीन्द्रसागरजी ने देह त्यागी

सागवाडा। दिगम्बर जैन समाज के पट्टाचार्य योगीन्द्रसागरजी महाराज का रविवार दोपहर 12.05 बजे जैन बोर्डिग में समाघि मरण हुआ। समाघि के समाचार कुछ ही समय में वागड, मेवाड सहित पूरे राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात एवं मुंबई आग की तरह फैल गए। इससे लोगों के सागवाडा पहुंचने का क्रम सा लग गया। आचार्य के देह त्याग के समाचार मिलते ही जैन समाज के प्रतिष्ठान बंद हो गए। समाज के सेठ दिलीपभाई नोगामिया ने बताया की 52 वर्षीय पट्टाचार्य योगीन्द्रसागरजी महाराज लम्बे समय से मधुमेह की बीमारी से ग्रसित थे। कुछ समय पूर्व महाराज के पैर में गेगरिन हो गया था। महाराज सिर्फ आयुर्वेदिक दवाइयों का ही सेवन कर रहे थे। उदयपुर के रविन्द्रनाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकों का एक दल पिछले दिनों महाराज के इलाज करने के लिए आया था। लेकिन, योगीन्द्रसागरजी महाराज ने ऎलोपैथी पद्धति से ईलाज कराने से मना कर दिया था। महाराज का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने से गत एक माह से महाराज के दर्शनों के लिए लोगों का तांता लगा हुआ था।

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2. Saurabh Jain,Digambar,Panchsheel Garden,Delhi,Arts
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4. Ashwin Desai,Swetambar,Kolkata,West Bengal,Business
5. Dr. Mahendra Dongaonkar,Digambar,Parbhani,Maharashtra,Medical
6. Maitri Jain,Swetambar,Jalandhar,Punjab,Service
7. Prithive Raj Baid,Swetambar,Viswas Nagar,Delhi,Business
8. Kamal Samria Jain,Digambar,Sanwer,Madhya Pradesh,Service
9. Rajesh Samria Jain,Digambar,Indore,Madhya Pradesh,Service
10. Sanjay Kumar Jain,Digambar,Kolkata,West Bengal,Service
11. Akash Jain,Swetambar,Jalgaon,Maharashtra,Industrialist
12. Pravin Rajoba,Digambar,Sangli,Maharashtra,Management
13. Kishor Jain,Swetambar,Bhiwandi,Maharashtra,Business
14. Mahaveer Katariya,Swetambar,Bangalore,Karnataka,Business
15. Priyanka Parmar,Swetambar,Pali,Rajasthan,Student
16. N. B. Akiwate, Digambar,Pune,Maharashtra,Engineer
17. Manoj Kumar Dhoka,Swetambar,Dhoka,Rajasthan,Business
18. Naman Lunawat,Swetambar,Kareli,Madhya Pradesh,Student
19. Pratap Dharamshi,Swetambar,Mumbai,Maharashtra,Academics
20. Harsh Jain,Digambar,Guwahati,Assam,Business
21. Ratna Rammurthy,Swetambar,Mumbai,Maharashtra,Service
22. Hardik Sanghani,Swetambar,Rajkot,Gujarat,Engineer
23. Mahaveer Prasad Jain,Digambar,Dungarpur,Rajasthan,Business
24. Lalit Kumar Patodi,Digambar,Indore,Madhya Pradesh,Business
25. Rajendra Kumar Saraf,Swetambar,Jodhpur,Rajasthan,Finance
26. Alok Jain,Digambar,Harda,Madhya Pradesh,Management
27. Swapnil Sanghai,Digambar,Sengaon,Maharashtra,Student
28. Sourabh Tejawat,Swetambar,Udaipur,Rajasthan,Arts
29. Devendra Kumar Bokadia,Swetambar,Surat,Gujarat,Law
30. Vimlesh Doshi,Swetambar,Ahmedabad,Gujarat,Management
31. Deepika Karnavat,Swetambar,Pune,Maharashtra,Others
32. Rajesh Kumar Jain,Digambar,Raipur,Chhatisgarh,Consultancy
33. Pradeep Kothari,Swetambar,Jaipur,Rajasthan,Business
34. Jayesh Gangar,Swetambar,Nani Daman,Daman & Diu,Management
35. Devendra Kumar Jain,Digambar,Lalitpur,Uttar Pradesh,Engineer
36. Munna Lal Jain,Digambar,Bhopal,Madhya Pradesh,Service
37. Anil Kumar Pipara,Swetambar,Hyderabad,Andhra Pradesh, Business
38. Neelam Jain,Swetambar,Ludhiana,Punjab,Others
39. Abhinandan Jain,Swetambar,Ludhiana,Punjab,Socialwork
40. Pradeep Kumar Jain,Digambar,Shanker Nagar,Delhi,Law
41. Ashok Kumar Sethia,Swetambar,Nokha,Rajasthan,I.T
42. Anurag Jain,Digambar,Rajgarh Colony,Delhi,Law
43. Manoj Shah,Swetambar,Ahmedabad,Gujarat,Others
44. Tarun Jain,Swetambar,Ludhiana,Punjab,Finance
45. Rajendra Kumar Jain,Digambar,Banswara,Rajasthan,Law
46. Mithun Shah,Swetambar,Mumbai,Maharashtra,Others
47. Gautam Chand Bothra,Swetambar,Balotra,Rajasthan,Business
48. Mukul Sangawat,Digambar,Udaipur,Rajasthan,Engineer
49. Mohan Lal Jain,Swetambar,Bhilwara,Rajasthan,Retired
50. CA Navratan Tater,Swetambar,Dilshad Colony,Delhi,Finance
51. Deepak Vora,Swetambar,Vadodara,Gujarat,Others
52. Sharad Bhandari,Swetambar,Phalodi,Rajasthan,Marketing
53. Ratnakar Annigeri,Digambar,Hubli,Karnataka,Consultancy
54. Surajmal Jain,Digambar,Kota,Rajasthan,Retired
55. Akirat Jain,Swetambar,Kanpur,Uttar Pradesh,Business
56. Ujjval Jain,Swetambar,Sarwar,Rajasthan,Politics

57. Rajeev Jain,Swetambar,Ludhiana,Punjab,Business
58. Varun Jain,Digambar,Meerut,Uttar Pradesh,Arts
59. Shrimant Nandagaon,Digambar,Bangalore,Karnataka,Others
60. Navneet Jain,Swetambar,Jodhpur,Rajasthan,Consultancy
61. Pradeep Jain,Swetambar,Shahdra,Delhi,Business
62. Divya Oswal,Swetambar,Pune,Maharashtra,Media
63. Mukund Kumar Jain,Swetambar,Ranpur,Gujarat,Arts
64. Manish Jain,Digambar,Raipur,Chhatisgarh,Business
65. J. K. Jain,Digambar,Sagar,Madhya Pradesh,Service
66. Ashish Jain,Digambar,Muzaffar Nagar,Uttar Pradesh,Student
67. Ajit Doshi,Swetambar,Mumbai,Maharashtra,Retired
68. Kalyanee Jain,Digambar,Pune,Maharashtra,Others
69. Rajesh Aherkar,Digambar,Aurangabad,Maharashtra,Government
70. Rakesh Kumar Jain,Digambar,Indore,Madhya Pradesh,Government
71. Avinash Bora,Swetambar,Nashik,Maharashtra,Business
72. Abhijeet Bora,Swetambar,Nashik,Maharashtra,Engineer
73. Puneet Jain,Swetambar,Samana,Punjab,Business
74. Naveen Kanthaliya,Swetambar,Udaipur,Rajasthan,Service
75. Nikunj Sheth,Swetambar,Ahmedabad,Gujarat,Arts

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BRIDES

 

 

BRIDES
1. Krimi Parekh,40,Swetamber,Ahmedabad,Gujarat,Others
2. Ashta Jain,31,Swetamber,Jaipur,Rajasthan,Service
3. Divya Oswal,26,Swetamber,Pune,Maharashtra,Others
4. Shipra Jain,34,Digamber,Dharampura,Delhi,Business
5. Rupal Jain,29,Digamber,Khandwa,Madhya Pradesh,Service
6. Nidhi Shah,27,Digamber,Mumbai,Maharashtra,Divorcee
7. Chandni Shah,22,Swetamber,Patan,Gujarat,Computer
8. Rima Kothari,27,Swetamber,Kuwait,Business
9. Sonal Jain,27,Digamber,Bhopal,Madhya Pradesh,Others
10. Srujal Shah,28,Digamber,Gandhi Nagar,Gujarat,Service
11. Rajshi Jain,26,Digamber,Agra,Uttar Pradesh,Service
12. Chandana Rajendra,30,Digamber,Bengaluru,Karnataka,Service
13. Akanksha Jain,23,Digamber,Andrews Gunj,Delhi,Computer
14. Poonam Kucheriya,24,Swetamber,Pune,Maharashtra,Engineering
15. Pooja Shah,25,Swetamber,Gokak,Karnataka,Service

GROOM
GROOMS
1. Laxmipat Bohra,35,Swetamber,Beawar,Rajasthan,Service
2. Ashish Jain,27,Digamber,Old Mahaveer Nagar,Delhi,Engineering
3. Shobhit Jain,32,Digamber,Dehra Dun,Uttarakhand,Law
4. Naveen Jain,31,Swetamber,Alwar,Rajasthan,Engineering
5. Amit Jain,30,Digamber,Shahadra,Delhi,Engineering
6. Piyush Pahade,31,Digamber,Navi Mumbai,Maharashtra,Engineering
7. Deepak Kumar Oswal,34,Swetamber,Ganj Basoda,Madhya Pradesh,Business
8. Umesh Shah,41,Swetamber,Ahmedabad,Gujarat,Divorcee
9. Vikas Kumar Baid,26,Swetamber,Shahadra,Delhi,Business
10. Manish Jain,Patodi,32,Digamber,Raipur,Chhtisgarh,Business
11. Kunal Bagadia,27,Swetamber,Kandivali West,Maharashtra,Business
12. Dharnesh Jain,36,Digamber,Mysore,Karnataka,Business
13. Kalpesh Tatiya,27,Swetamber,Pimpalner,Maharashtra,Medicine
14. Keyur Ramesh Kothari,28,Swetamber,Surendra Nagar,Gujarat,Business
15. Kamlesh Jain,32,Swetamber,Pune,Maharashtra,Service
16. Sanyam Palecha,26,Swetamber,Nimbahera,Rajasthan,Engineering
17. Mahavir Halingale,22,Digamber,Sangli,Maharashtra,Service
18. Vikram Kumar Palrecha,31,Swetamber,Kottur,Karnataka,Business
19. Ankur,24,Swetamber,Bhilwara,Rajasthan,Business
20. Priyank Jain,29,Digamber,Ashok Nagar,Madhya Pradesh,Engineering
21. Amit Kumar Tater,30,Swetamber,Udaipur,Rajasthan,Service
22. Vikram Jain,27,Digamber,Thane,Maharashtra,Engineering
23. Ravi Kumar Jain,35,Digamber,Indore,Madhya Pradesh,Service
24. Amit Jain,34,Swetamber,Rohini,Delhi,Business
25. Arvind Jain,27,Swetamber,Pune,Maharashtra,Computer
26. Prasan Kumar Sancheti,33,Swetamber,Ahmedabad,Gujarat,Business

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1. R. K. Lunia,Raipur,Chhatisgarh,Investments
2. Hanuman Garments Pvt. Ltd.,Shadara,Delhi,Textiles
3. Arihant Consultancy,Adajan,Gujarat,Finance
4. Arihanta Gems & Jewe,Bangalore,Karnataka,Jewellary
5. Kothari Electricals,Jaipur,Rajasthan,Electricals/Electronics
6. S. K. Stickers & Car,Chennai,Tamil Nadu,Trading
7. Omshanti Agancies,Pune,Maharashtra,Trading
8. Ravi Pugaliya & Associates,Kolkata,West Bengal,Real Estate
9. Rainbow Packaging,Indore,Madhya Pradesh,Trading
10. Rajendra Saraf& Associates,Jodhpur,Rajasthan,Chartered Accountants
11. Urvish Book Store,Surat,Gujarat,Books/Stationary
12. Green Indai Gasoline,Kolhapur,Maharashtra,Consultants
13. Publication,Jaipur,Rajasthan,Books/Stationary
14. Mahavir Sales Corpor,Vadodara,Gujarat,Exporters/Importers
15. Lakhani & Lakhani,Mumbai,Maharashtra,Chartered Accountants
16. R. T. Annigeri & Associates,Hubli,Karnataka,Chartered Accountants
17. Janbhawna Sandesh,Bhola Nath Nagar,Delhi,Publications
18. Kumbhat Advisors,Surat,Gujarat,Chartered Accountants
19. Samyak Furnishing,Raipur,Chhatisgarh,Textiles
20. Navin Agro Industry,Cuttack,Orissa,Industry
21. Alteza Pharma,Aurangabad,Maharashtra,Medical

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