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Vol. No. 141

May, 2012


Every year a large number of birds and stray animals die due to the ill effects of dehydration. This summer the temperature may cross 40 degrees. Many birds will die due to lack of water. You can save several dying birds by placing a small pot of water at your terrace, balconies, windows and give life to birds. Please take care to see that, water does not get heated.


New Delhi, 5th April, 2012: Speaking at Mahavir Jayanti celebration, Prime Minister Dr. Manmohan Singh said that Global threat of terrorism and nuclear power faced by us can be solved by following Lord Mahavir philosophy of Peace and Non-Violence.

Prime Minister was addressing the gathering on the occasion of Mahavir Jayanti Celebration in the auspicious presence of founder of Ahimsa Vishwa Bharti the Jain Acharya Dr. Lokesh Muni at his residence 7, Race Course Road, New Delhi. He said that Lord Mahavir gave the message of Unity in Diversity. Following his teachings our country has the sacred culture of tolerance and non-violence, giving due respect to diversity and multiplicity is part of our culture and civilization. We have to strongly maintain this heritage. I am delighted to say that Acharya Lokesh, keeping this culture alive has played an important role in solving tension between different communities many times. For his remarkable contribution Government of India honored him with ‘National Communal Harmony Award 2010.

Prime Minister further said that Lord Mahavir has associated religion with spirituality. I believe that being secular is not being non-religious but being Spiritual. A person who is more religious will be more secular. We have to pass this secular and spiritual culture to future generations. A country becomes week only when it is not able to exchange with other ideology. India has never closed doors for foreign ideology but has always welcomed them. We are united in spite of much diversity because we have the ancient culture of tolerance. We have to be alert and cautious from anti social trends which challenge the Unity of our Country and creates hindrance in our development. Dr. Manmohan Singh said that communalism and insurgency is a very big challenge for unity and integrity of our country. Distracted people promote them which defames whole society and country. We have to work together to face such challenges. Releasing the first copy of magazine ‘Ahimsa Vishwa Bharti Ahwan’ Prime Minister congratulated Jain Community.

Jain Acharya Dr. Lokesh Muni on the occasion said that Lord Mahavir's philosophy has the solution for Global problems. He said that following his teachings mankind can solve the problems of terrorism, global warming, corruption, poverty, naxalism, population explosion and female foeticide. He said that following the path of non-violence, peace and harmony we can build a happy, healthy and prosperous society. Acharya Lokesh presented a gorgeous picture of Lord Mahavir to Prime Minister Dr. Manmohan Singh on the auspicious occasion. Central Minister Mr. Shri Prakash Jaiswal said that philosophy of Lord Mahavir is very relevant in present century. Shri Jaiswal also congratulated Jain Community on the Birth Anniversary of Lord Mahavir. Source:  Kenu Aggarwal, Media Convener,  Mob : 9811025332, Ahimsa Vishva Bharti, E-Mail:,


Chennai : A spirit of compassion and humanism has to be built in the people, as all religions and all the great saints’ messages are of oneness, unity, love and kindness to guide us in the right path to lead a truthful living said, Tamil Nadu Governor K Rosaiah. Delivering the guest lecture during the 2611th Janm Kalyanak celebrations of Bhagwan Mahaveer at Sri Jain Dadwadi, Ayanavaram the Governor said, “All human beings should act according to the words of Mahaveer in order to walk to the path for moksha possessing the three jewels of rational perception, rational knowledge and rational conduct. Today the world is facing challenges and requires a commitment to save the environment. We need to put in a concerted effort from all spheres to conserve and preserve nature in its pristine form.” The Governor congratulated the Jain community for their services and for their support in all spheres for the welfare of the people and society. Addressing the gathering, Acharya Rajyashsuri Ji MS said, “People are not performing violence with ignorance but with so many other reasons behind it. All human beings should join together and practice the principle of non-violence.” RK Jain IAS, Divisional Commsioner, Jodhpur, L C Jain, President, Shree Terapanthi Jain Parishad, Saints and followers were present.

अविस्मरणीय दिवस -वैशाख शुक्ला एकादशी, 2 मई 2012 - डॉ. दिलीप धींग

जैन इतिहास का एक अविस्मरणीय और अति - महत्वपूर्ण दिवस वैशाख शुक्ला एकादशी है। वैशाख शुक्ला दशमी को वर्तमान शासन नायक तीर्थंकर भगवान् महावीर का केवलज्ञान कल्याणक होता है। दूसरे दिन यानि वैशाख शुक्ला एकादशी को मध्यमपावा में श्रमण भगवान् महावीर के विराट् समवसरण की रचना हुई। इसी समवसरण में इन्द्रभूति गौतम आदि ग्यारह महापण्डितों व उनके शिष्यों सहित चार हजार चार सौ (4400) व्यक्तियों ने दीक्षा अंगीकार की, इससे श्रमण - तीर्थ की स्थापना हुई। चन्दबाला आदि हजारांं मुमुक्षुओं ने अणगार धर्म अपनाया और श्रमणी - तीर्थ की स्थापना हुई। हजारों - लाखों गृहस्थ नर - नारियांे ने अणगार धर्म अपनाया, इससे श्रावक - तीर्थ और श्राविका तीर्थ की स्थापना हुई।

इस प्रकार श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार वैशाख शुक्ला एकादशी का दिन प्रथम गणधर गौतम स्वामी, अन्य सभी गणधर, भगवान् महावीर की प्रथम शिष्या महासती चन्दनबाला सहित हजारों श्रमण - श्रमणियों का ‘दीक्षा दिवस’ है। इसी दिवस तीर्थंकर भगवान् महावीर साधु - साध्वी, श्रावक - श्राविका रुप चार तीर्थ की स्थापना करते हैं, चतुर्विध संघ बनाते हैं, अतः यह दिन तीर्थ स्थापना दिवस या संघ - स्थापना दिवस के रुप में गौरवान्वित है।

वैशाख शुक्ला दशमी को भगवान् महावीर का केवल ज्ञान कल्याणक और वैशाख शुक्ला एकादशी को तीर्थ - स्थापना दिवस, गौतम स्वामी आदि गणधर व महासती चन्दनबाला दीक्षा दिवस के रुप में सम्पूर्ण जैन समाज में दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिये। इस तिथि के साथ एक ऐतिहासिक सन्दर्भ और जुड़ जाता है कि अखिल भारतीय श्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री देवेन्द्र मुनि जी म. का आकस्मिक महाप्र्रयाण हो जाना। इसी वैशाख शुक्ला एकादशी को आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म. ने स्वर्गारोहण किया। वर्ष 2001 में राजस्थान सरकार ने आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म. की स्मृति को अक्षुण्ण रखने हेतु वैशाख शुक्ला एकादशी को सम्पूर्ण राज्य में ‘अहिंसा दिवस’ (अगता) के रुप में घोषित किया है। सम्पूर्ण जैन से कहना चाहूँगा कि जप - तप, सेवा - साधना, जीवदया - अभयदान के रुप में दशमी व एकादशी की सर्वत्र आराधना की जानी चाहिये। ज्ञात हो कि इस वर्ष वैशाख शुक्ला एकादशी 2 मई 2012 को है। Shri Tarak Guru Jain Granthalaya, Guru Pushkar Marg, Udaipur,Rajasthan-313001 Pushpendra Muni, E-Mail :

उदयपुर-अक्षय तृतीया पर हुए 241 तपस्वियों के पारणे

उदयपुर, रथ में सवार तपस्वी श्रावक-श्राविकाएं, मार्ग में धार्मिक गीतों की बिखरती स्वर लहरियां और तपस्या की आई बहार, बधाई हो के जयघोष के साथ निकली शोभायात्रा। आयोजन था सायरा क्षेत्र स्थित उमरणा गांव में अक्षय तृतीया पर आयोजित वर्षीतप पारणा महोत्सव का। श्री शील कुंवर म.सा. के शताब्दी वर्ष की श्रृंखला में हुए इस महोत्सव के दौरान देश के दूर-सुदूर क्षेत्रों के 241 तपस्वियों का पारणा हुआ। जब तपस्वी श्रावक-श्राविकाओं का इक्षुरस से सामूहिक पारणा किया गया तो पूरा पांडाल भगवान ऋषभदेव के जयघोष से गूंजायमान हो उठा।

सुबह करीब आठ बजे सेमड गांव से निकाली गई शोभायात्रा में सभी तपस्वियों को रथ में विराजमान कर 4॰ हजार स्वॉयर फीट में निर्मित समारोह स्थल तक भगवान के जयकारों के साथ लाया गया। शोभायात्रा में 11 प्रांतों के करीब 1॰ हजार श्रावक-श्राविकाओं ने अपनी सहभागिता का निर्वाह किया। शोभायात्रा करीब एक घंटे बाद श्री महावीर जैन गौशाला प्रांगण पहुंची, जहां मुख्य समारोह का आगाज हुआ।

समारोह में श्रमण संघीय आचार्यश्री शिव मुनि के आज्ञानुवर्ती श्रमण संघीय प्रवर्तक राष्ट्रसंत गणेश मुनि शास्त्री ने कहा कि तप आत्म शुद्धि का उत्कृष्ट सोपान है। तपस्या से न केवल तन के विकार दूर होते हैं बल्कि मन के संताप और क्लेश भी नष्ट होते हैं। वे लोग धन्य हैं जो वर्षभर ही तपोधनी बने रहकर अपनी काया को कंचन किए रहते हैं। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन की तुलना इस समय कोई अन्य दर्शन नहीं कर सकता है। आज का दिन दान, तप, शीलता और भावना का समय है। धर्मावलम्बियों को चाहिए कि वे अपने जीवन में अहिंसा और संयम का समावेश करने का प्रयास करें। उन्होंने भगवान ऋषभदेव का स्मरण करते हुए कहा कि वे महान थे और उनकी तप साधना भी उच्चकोटि की थी। हमें उनके बताएं सिद्धांतों पर चलने की आवश्यकता है। इस दौरान उन्होंने श्रमण संघीय आचार्यश्री शिव मुनि और तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण की ओर से श्रमण संघीय इतिहास में पहली बार भव्य स्तर पर आयोजित इस समारोह की सफलता के लिए भेजे गए संदेश की जानकारी दी तो समूचा पांडाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
श्रमण संघीय सलाहकार श्री दिनेश मुनि ने कहा कि आज के आपाधापी के युग में जब चारों ओर का पर्यावरण प्रदूषित हुआ जा रहा है और मनुष्य कई तरह से अस्वस्थ बना हुआ है तब तप ही एकमात्र विकल्प है जो मानव समाज को तन और मन दोनों दृष्टियों से निरोग, स्वस्थ और सुखी रख सकता है। जैन दर्शन में प्रारंभ से ही तप का महत्व सर्वोपरि रूप में स्वीकार किया गया है और इसीलिए वर्षीतप का सिलसिला आत्म कल्याण के लिए प्रारंभ हुआ जो अन्यत्र शायद ही देखने को मिलेगा।

इससे पूर्व वर्षीतप पारणा महोत्सव का आगाज साध्वीवृंदों की ओर से प्रस्तुत नवकार मंत्र की महास्तुति से हुआ। तत्पश्चात साध्वी दृष्टिश्री ने आदिनाथ प्रभु के चरणों में शीश झुकाते चले भजन का संगान कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। अनामिका तलेसरा ने जहां समय की नजाकत को भांपते हुए तप जीवन में निखार लाता है गीत का प्रस्तुतिकरण किया। बगडून्दा के वरिष्ठ स्वाध्याय फूलचंद डागरिया ने ध्वजारोहण की रस्म अदा। साध्वी आभाश्री ने कहा कि तप से कर्मों की निर्जरा होती है और तप द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। डॉ पुष्पेन्द्र मुनि ने वर्षीतप का महत्व बताते हुए आदिनाथ के जीवनवृत की सारगर्भित जानकारी दी। समारोह में डॉ. द्वीपेन्द्र मुनि, रीतेश मुनि, प्रभात मुनि, डॉ. राजश्री, रूचिका, महिमाश्री, नमीताश्री, ममताश्री, सुमनश्री, वृष्टिश्री, विरक्ताश्री, विजेताश्री, विधिश्री, दीपिकाश्री, मंगलज्योति, विकास ज्योति ऋजुप्रज्ञा ने भी अपने विचारों से श्रावक समाज को लाभान्वित किया।

तपमूर्ति अलंकरण से किया सुशोभित : समारोह के दौरान श्रमण संघीय प्रवर्तक राष्ट्रसंत गणेश मुनि शास्त्री ने वर्षीतप करने और समारोह की संप्रेरिका साध्वी मंगलज्योति को तपमूर्ति अलंकरण से सुशोभित किया तो श्रावक समाज की ओर से गुरू को आदर की चादर समर्पित की गई। उन्होंने साध्वी विकास ज्योति व ऋजुप्रज्ञा को भी सम्मान के रूप में चादर प्रदान की।

श्रमण संघ का 61 वें वर्ष में प्रवेश : समारोह के दौरान जानकारी दी गई कि 60 वर्ष पूर्व आज ही के दिन अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्थानकवासी श्रमण संघ की स्थापना हुई थी। वर्ष 1952 में मेवाड की इसी धरा के प्रमुख कस्बे सादडी गांव में 22 संप्रदायों के एकीकृत से श्रमण संघ का गठन हुआ। आज का दिन प्रत्येक श्रावक-श्राविकाओं के लिए सौभाग्य का अवसर है। 51 यूनिट रक्त एकत्र : इस अवसर पर आयोजित रक्तदान शिविर में समाजजनों ने उत्साह के साथ शिरकत की। दोपहर बाद तक चले शिविर में 51 यूनिट रक्त का संग्रहण किया गया।

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Thousands of Jain families of Mumbai were pleasantly surprised to receive large sweet boxes by courier. About 136,000 sweets packets were distributed with a ornately printed invitation card to Jains living in Mumbai. These were sent to mark the commencement of the bi-centenary celebrations on April 15 of the renowned Shri Godiji Parshvanath Maharaj Jain temple (SGPMJ), in Pydhonie, south Mumbai. The temple, with a chequered history, will complete two centuries of its existence and devotion of several generations of Jains in south Mumbai. Besides a series of religious, social and cultural programmes, have also been organised by the community.

More than 200 years ago, the SGPMJ temple was first built as a teak wood structure in south Mumbai's historic Fort area, now the commercial hub of the city. According to legends, the 25-inch tall idol of Shri Godiji Parshvanath Maharaj was found in what is modern day Pakistan and brought to the erstwhile Bombay, already having a formidable reputation as a centre for domestic and international trade and commerce. The venue was chosen since a majority of the Jains, residing in the seven islands which made up Bombay, were concentrated in Fort area. However, over two centuries ago, a massive fire had engulfed the Fort area and raged for nearly four days.In those days, all houses and buildings were made of teak and other varieties of wood. They were reduced to ash. However, there is no authentic record available whether the SGPMH temple sustained damages. Left homeless, the vast majority of the residents shifted around four kms to the north, in Pydhonie and surrounding areas which were not thickly populated in those days, Bombay's total population spread across the seven isles was less than 500,000, according government records. The idol of Shri Godiji Parshvanath Maharaj was installed in a tiny new wooden temple and worshipped in right earnest by the newly re-settled Jains in Pydhonie area. Over the years, the growing city witnessed revolutionary changes - including the construction of India's first railway line from Victoria Terminus (now, renamed Chhatrapati Shivaji Terminus-CST) to Thane, later a tramway to BEST buses, the development of Mumbai as one of the top business centres in south Asia, and influx of migrants from all over India.

Pydhonie and the localities became the hub of the city's gold, silver, diamond, jewellery, hardware, iron and metals, cloth, grains, vegetables, fruits, automobile spares, plastics, pharmaceutical and other wholesale markets. Over four decades ago, the SGPMJ Temple trustees decided to go in for renovation of the temple. After much deliberations and views of experts, it was decided to renovate it from the foundation to the top, but without relocating the idol. It was converted into a gleaming white and coloured carved marble edifice, standing out prominently among the ancient buildings looming around it and the renovations, costing around Rs.8 crore, is on the verge of completion. The 18-day celebrations started on April 15 will end on May 2. The Government of India will issue a special Rs.5 commemorative stamp depicting the temple.

Kanpur: Hundreds of devotees of Lord Mahavira took out a shobha yatra amid dandiya and beating of drums here . The occasion was the 7th anniversary of Shri Jain Dada Badi Prathistha Mahotsava. The devotees, including hundreds of women and children participated in the yatra which commenced from Birhana Road and passed through Phoolbagh and Mall Road to reach Cantt. At Jain Dada Badi temple, the yatra came to an end.
The women danced and played dandiya. Dressed up in orange and red, they were witnessed holding 'kalash' on their heads. Rahul Jain, an organizer, said that the holy procession remained a colourful event and devotees pledged to follow the commitments of Lord Mahavira. Central excise commissioner Pravin Kumar Jain flagged off the shobha yatra in the morning. The devotees were chanting bhajans in praise of the Lord. A band was also arranged which blew trumpets to mark the festivities.

दंतार  दिगंबर जैन मंदिर से पारसनाथ की मूर्ति लूटी

हंटरगंज : वशिष्ठ नगर थाना क्षेत्र के ग्राम दंतार स्थित दिगंबर जैन धर्मशाला के मंदिर से मंगलवार की सुबह जैन के 23वें तीर्थकर भगवान पारसनाथ की मूर्ति लूट ली गई। अष्टधातु निर्मित छह इंच लंबी व चार इंच चौड़ी मूर्ति एवं तांबे के दो ओंकार मंत्र लिखित पट्टी भी लूट ली गई। घटना सुबह सात बजे घटी। जानकारी के अनुसार चोरी पांच अज्ञात लड़कों ने की है। इन्होंने पूजा गृह में मौजूद बालेश्वर प्रसाद की अपराधियों ने आंख एवं मुंह पर गमछा बांधकर अपने कब्जे में ले लिया। प्रहरी बालेश्वर प्रसाद ने इस घटना की सूचना दिगंबर जैन सिद्ध कोल्हुआ पहाड़ प्रबंध समिति के अध्यक्ष विजय जैन छाबड़ा गया एवं दंतार के वर्तमान और पूर्व मुखिया को दी है। अध्यक्ष श्री छावड़ा के निर्देश पर प्रहरी ने थाना को भी इसकी सूचना दी है। पुलिस अभी कोई कार्रवाई शुरू नहीं की है। दंतार जैन मंदिर सह धर्मशाला के प्रहरी बालेश्वर प्रसाद के अनुसार ये पूजारी की अनुपस्थिति में पूजा करने के लिए घटना की सुबह मंदिर पहुंचे थे। मंदिर परिसर स्थित आम के बगीचे में पहले से ही पांच लड़के खड़े थे। जिन्हें प्रहरी ने आम तोड़ने से मना कर दिया। इस पर ये लड़के वापस चले गए। प्रहरी मंदिर में पूजा व आरती करने की तैयारी में थे। इसी दौरान उक्त पांचों युवक मंदिर में दुबारा घुसकर प्रहरी के आंख व मुंह को गमछे से बांधकर चोरी कर चलते बने।

आचार्य श्री सुशील मुनि जी महाराज की 18वीं पुण्यतिथि मनाई गई

विश्व अहिंसा संघ, आचार्य सुशील आश्रम, अहिंसा भवन , शंकर रोड पर आचार्य श्री सुशील मुनि जी महाराज की 18वीं पुण्यतिथि अहिंसा एवं पर्यावरण दिवस के रूप में श्री विवेक मुनि के सान्निध्य में मनाई गई। जिसमें मुनि श्री कीर्तिचन्द्र जी महाराज ने कहा कि आचार्य श्री सुशील मुनि जि महाराज ने जैन धर्म के अहिंसा, अनेकान्त को केबल जाना ही नहीं अपितू उसे जीवन में जीया है। वो इसके साक्षात उदाहरण थे। ऊन्होंने जैन ए हिन्दू एकता और विश्व के धर्मों की एकता ए सदभावना के लिए काम किया। स्वामी चिदानन्द जी ने कहा कि वो अहिंसा, शान्ति के मसीहा थे उनके दिल में प्राणी मात्र के लिए अपार करूणा, दया थी। उन्हें सभी धर्मों के लोग अपना गुरु मानते थे। आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द ने कहा कि आज विश्व में पर्यावरण असन्तुलन की जो समस्या है। उसके लिए भगवान महावीर ने 26 सौ बर्ष पहले आगाह किया था और उसी बात को आचार्य सुशील मुनि जि महाराज ने पृथ्वी शिखर सम्मलेन में आज से बीस बर्ष पहले अहिंसा और चौरासी लाख जीवों के संरक्षण - संबर्धन के लिए कहा था। आचार्य अमरेन्द्र मुनि ने कहा कि उन्होंने सभी धर्मों के धर्माचर्यों को एक मंच पर लाने का अदूतीय काम किया।  जिसका उदाहरण आज हम सब के सामने है। आचर्य लोकेश मुनि ने कहा कि आचार्य जी विश्व में जैन धर्म के पर्याय बन गये हैं। विदेशों में जो उन्होंने काम किया है उसका जैन समाज और भारत देश हमेशा रिणी रहेगा। श्री विजय मुनि ने कहा कि वो धर्म एवं अध्यात्म के सूर्य थे। वो विश्व में जंहा भी गये वहाँ ज्ञान का प्रकाश ही बाँटा।  श्री विवेक मुनि ने सफल संचालन करते हुए कहा कि गुरूजी ने जो तपस्या ध्यान साधना की उससे जो अम्रत उन्होंने पाया उसे विश्व कल्याण हेतु शंकर बन के मुक्त भाव से वितरित किया।  श्रीमति सरिता जैन ने गुरु भक्ति भजन सुनाया। समारोह में श्री महामंत्रादास ए मनक मुनि , कस्तूर मुनि , सिद्धेश्वर मुनि , इजाक मालेकर और समाज के गणमान्य लोगों ने भाग लिया। मुलखराज जैन अध्यक्ष विश्व अहिंसा संघ ने सभी संतों का स्वागत किया और एस पी जैन ने सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञयापित किया। - श्री विवेक मुनि ,

क्षमा बोल नहीं सकते, तो लिख कर मांग लो ,बड़े भी छोटों से क्षमा मांगे - आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा.

क्षमा भगवान महावीर का मूल धर्म है। सारी मनुष्य जाति एक है। वे किसी का भेद नहीं करते, काले-गोरे, छोटा-बड़ा, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब सभी में एक ही आत्मा है। आत्मा में मूल गुण एक हैं। सिद्ध की आत्मा आठों कर्मों का क्षय कर सिद्धालय में जा बसी और हमारी आठों कर्मों से बंधी होने के कारण अभी संसार में भटक रही है। आत्मदृष्टि से सबको एक समान देखो। संसार के सारे जीव मेरे मित्र हैं, उन सभी से मैत्री भाव रखो। भगवान महावीर की मैत्री आत्मदृष्टि से जुड़ी है। पर हमने दृष्टि की आत्मत्व को नहीं पकड़ा, बल्कि क्रिया को पकड़कर रह गये। कोई कर्म संस्कारों से छोटा है। अगर छोटा है तो उसके लिए मंगल कामना करो, वह बदल जायेगा। क्रिया शरीर करता है जो कुछ भी हो रहा है बस उसे जानना और देखना आत्मा का मूल गुण है।

उस पर प्रतिक्रिया मत करो। आत्मदृष्टि को महत्व दो। भगवान महावीर की क्षमा आत्मदृष्टि से जुड़ी हुई है। आज मनुष्य राग-द्वेष कर रहा है, तभी तो वह कर्मों से जुड़ा है। आज जो आप को मिला है वह सब आपके पिछले पुण्य कर्मों के फल से प्राप्त हुआ है और वर्तमान में उसके संयोग में पुरुषार्थ कर अपने भविष्य को सुधार सकते हो। सभी तीर्थंकरों ने क्षमा को मूल धर्म बताया। कहीं से लो, सभी की (शिक्षा) एक है। पूर्व कर्मों के अनुसार किसी को जल्दी केवलज्ञान हुआ, किसी को देर से। आत्मा अनंत शक्तिशाली है। आज सब बंगला-गाड़ी चाहते हैं जो बाहरी क्षणिक सुख है। शाश्वत सुख तो आत्मा में है। कुछ कहते हैं क्षमा अब औपचारिक होकर सिमट गई है, लिखकर एसएमएस कर, ई-मेल कर क्षमा मांगते हैं। मैं इसको अपने अनुभव से गलत नहीं मानता। कई बार व्यवहारिक रूप से सबसे बोलकर क्षमा नहीं ली जा सकती। मेरे श्रमण संघ में भी विवाद हो गया है, बंट गया किसी कारण से। मैंने एक दिन शिरीष मुनि के साथ प्रतिक्रमण से पूर्व टहलते हुए चिन्तन किया। फिर एक पत्र सभी श्रमण-श्रावकों को लिखा। वह क्षमा-पत्र था, कि आप मुझे क्षमा करें। उसका तुरन्त फल मिला। फिर श्रमण संघ एक हो गया।

व्यवहारिकता का बहुत लाभ है। शिविरों में हम जन्मों-जन्मों की आलोचना कराते हैं। जो भी वैर-विरोध है उसे क्षमा करो। ऐसा नहीं है इससे सारे मिल जायेंगें, परन्तु जिनके मन में भाव आ जाये तो मित्र बन जाते हैं। क्षमा मांगिये, छोटों से भी, पत्नी से भी, आचार्य से भी, क्षमा में कोई भेद नहीं होता। एसएमएस, ई-मेल से भी क्षमा संस्कार वश करता है, तो यह एक साधन भी लाभदायक होगा। इस दिवस पर इस जरिये भी क्षमा मांग सकता है।

आज क्षमा तभी सार्थक होगी, जब बड़ा, बड़ा होते हुए भी छोटों से क्षमा मांगे, हमसे बच्चा भी क्षमा भाव सीखेगा। क्षमा दोनों ओर से मांगी जाती है। क्षमा की आवश्यकता शुरू से ही थी, लेकिन अब ज्यादा हो गई है। मेरे पास कोई संत आ जाये, मैं किसी के पास चला जाऊं, मैं हाथ जोड़कर सबसे क्षमा मांग लेता हूँ और शायद यही क्षमा की प्रभावना बढ़ाने का सीधा फार्मूला है। छोटी-छोटी बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लें। जीवन साधनामय बनायें। अपनी ईगो को खत्म करना होगा, तभी क्षमा का भाव जन्म लेगा। क्षमा मांगने से हमेशा व्यक्ति बड़ा होता है। जब मनुष्य साधना में डूबता है, तो फिर ईगो टूटने में देर नहीं लगती। महावीर की साधना भेद विज्ञान की साधना है। उन्होंने शरीर को नहीं आत्मा पर जोर दिया। शिविरों में भगवान महावीर के आदर्शों की साधना कराता हूँ, जिससे परिवर्तन आता है। मेरे पास साधना शिविर कर लें, समझ आ जायेगा। अपनी आलोचना करना कठिन तो है, पर असंभव नहीं। आज भगवान महावीर की अहिंसा, अनेकान्तवाद, अपरिग्रह, स्याद्ववाद की नितांत आवश्यकता है।

Acharya Shree Shiv Muniji Maharaj Saheb,,, E-Mail: & Facebook :

'कभी भी क्रोध न करें' - पंडित रत्न विनय मुनि जी महाराज

पंडित रत्न विनय मुनि जी महाराज ने जाखल के जैन स्थानक में प्रवचन करते हुए कहा कि आज संसार में क्रोध बड़ी भारी समस्या है। इस क्रोध से बच्चे, बूढ़े सभी परेशान हैं। क्रोध पर चिंतन करना होगा। क्रोध जिस वस्तु के साथ जुड़ जाता है व खराब हो जाती है। नरेश मुनि जी ने कहा कि यदि मन में क्रोध की गांठ बन जाए तो उसे लंबे समय तक न होने दें, क्योंकि यह गांठ कभी कैंसर की गांठ न बन जाए। इसलिए हमें क्रोध नहीं करना चाहिए, यदि हो गया तो उसे लंबे समय तक नहीं करना चाहिए। नरेंद्र मुनि जी ने कहा कि धर्म की सोच में समता व आनंद मिलता है, गुणों का विकास होता है। इसलिए हमें धर्म की सोच बढ़ानी है, दुनियां की सोच नहीं बढ़ानी। जो अच्छाई बुराई हमारे मन में आती है, यह सब हमारी सोच का नतीजा है। उन्होंने कहा कि गुरुओं के बोल पर श्रद्धा रखो, विश्वास रखो, ऊंचे उठते जाओगे। जैसे पेड़ ऊंचा उठता है उस पर फल लगता है तो वह झुकने लगता है तभी उसमें मिठास आती है। इसी तरह झुकना व नमना सीखने वाला इंसान कभी जिंदगी में मार नहीं खाएगा, उसे हर जगह सम्मान प्राप्त होगा।

आचार्य महाप्रज्ञ का द्वितीय महाप्रयाण दिवस आयोजित

उदयपुर। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, उदयपुर की ओर से आध्यात्म जगत के पुरोधा आचार्य महाप्रज्ञ का द्वितीय महाप्रयाण दिवस मुनि राकेश कुमार के सानिध्य में अशोकनगर विज्ञान समिति में आयोजित किया गया। इस अवसर पर मुनि ने मंगल उद्बोधन में कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ ज्ञान के अक्षय कोष थे। उन्होंने आगम साहित्य विवेचन कर जनता का महान उपकार किया। वे अतिन्द्रीय ज्ञानी तथा समण संस्कृति के उज्जवल नक्षत्र थे। उन्होंने अहिंसा की केवल सूक्ष्म व्याख्या ही नहीं की बल्कि अपना सम्पूर्ण जीवन अहिंसा की प्रयोगशाला के रूप में जिया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख हस्तीमल जैन ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ विनम्रता, विद्वता तथा समर्पण के पर्याय थे। भाजपा के शहर जिला अध्यक्ष दिनेश भट्ट ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ करूणा और अहिंसा के मूर्तरूप थे। मुनि सुधाकर ने कहा आचार्य महाप्रज्ञ ने समर्पण भाव से मानव जाति की सेवा की तथा शिक्षा जगत को जीवन विज्ञान के रूप में महान अवदान दिया। इस अवसर पर तेरापंथ सभा के मंत्री राजकुमार फत्तावत ने संयोजकीय व्यक्तित्व में आचार्य महाप्रज्ञ के अवदानों की चर्चा करते हुए उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर डॉ. के.एल. कोठारी, डॉ. एल. एल. धाकड़, हंसराज बोहरा, श्रीमती सुमन डागलिया, कंचन मोनी, प्रवीणा सिंघवी, पुष्पलता भण्डारी, मिनी सिंघवी, विनीत जैन, राकेश चपलोत, बजरंग श्यामसुखा आदि के विचार प्रस्तुत किये।

जैन धर्म में क्षमा -By Dr. C. Devakumar
जैन धर्म विश्व का एकमात्र ऐसा धर्मं है जो हर प्राणी को एक सा समझता है – आगम ‘एगे आया’ कह कर संसार के क्षुद्रतम प्राणी चींटी कीड़े मकौड़े इत्यादि से लेकर विशालतम जीव हाथी तथा महानतम जीव अरिहंत परमात्मा की आत्मा में कोई अंतर नहीं समझता। इस धर्म की दृष्टि में सभी जीव एक सामान हैं ]न केवल कीड़े मकोड़े अपितु वनस्पति एवं अग्नि जल वायु आदि को भी उसी सम्पूर्ण ज्ञान वान एवं शक्तिमान आत्मा का धारक मानता है। यह समानता का भाव स्वतः ही एक जीव को दूसरे जीव का सम्मान करना सिखलाता है। जिस प्रकार हमारे देश का संविधान हमें Right to live तथा Right to free expression अर्थात अपनी इच्छा से जीवन जीने तथा अपने मन की बात स्वतंत्रता से कहने का अधिकार देता है उसी प्रकार जैन दर्शन प्रत्येक जीव को इस स्वतंत्रता का धारक मान कर अपने जीवन का स्वयं निर्माता मानता है। जब एक जीव दूसरे जीव का सम्मान करता है तो बहुत से मनोवैज्ञानिक स्तरों से गुज़रता है- जब पौद्गलिक शरीर का सम्मान करता है तो अहिंसा के स्तर पर होता है, जब पौद्गलिक आकर्षण का सम्मान करता है तो प्रेम भाव से अभिभूत होकर करुणा, वात्सल्य, स्नेह आदि के स्तर पर अपने भाव प्रकट करता है। अहिंसा की परिणिति भी दया रूप में होती है तो प्रेम की परिणिति भी दया रूप में होती है। यह सुनने में कुछ अटपटा लग सकता है कि प्रेम में दया कैसे? अहिंसा में प्रेम का समावेश तो स्पष्ट ही है कि किसी जीव को मन वचन काया से दुःख न पहुंचाने का संकल्प ही अपने आप में क्षमा है। प्रेम भाव में दया का स्वरुप समझने के लिए हमें अपने स्वयं के व्यवहार को ही नज़दीक से देखना होगा। एक नौकर जिस पे हमारा प्रेम भाव नहीं है उससे यदि कोई कीमती कांच की वस्तु टूट जाती है तो उसे हम बुरी तरह से डांटते हैं परन्तु यदि हमारे बच्चे से वही वस्तु टूटती है तो प्रायः अभिभावक यह कहते पाए जाते हैं ‘आगे से ध्यान रखना, दूसरी आ जायेगी’। यहाँ प्रेम से क्षमा उपजती है।जिस पर स्नेह होता है उसे क्षमा करना हमारे लिए बहुत सरल है परन्तु जिस पर हमारा स्नेह नहीं है या जिसने हमें हानि पहुंचाकर हमारे क्रोध को जगाने का काम किया है उसे क्षमा करना हमारे लिए बहुत कठिन हो जाता है। महावीर की क्षमा इसी बिंदु से प्रारंभ होती है - ‘धर्मामृत’ में गाली देने वाले पर भी चित्त को प्रसन्न रखने को क्षमा के उदाहरण के रूप में दिया गया है, अर्थात जब कोई हमारा बुरा करे तो भी उसके प्रति मन में दुर्विचार न लाकर उसके कल्याण की भावना क्षमा है। क्रोध का निमित्त मिलने पर भी मन में प्रसन्नता रखना क्षमा है – यही साधुता का भाव है। धर्मामृत में कहा गया है कि क्षमा भाव से निम्न सुख प्राप्त होते हैं:
१. व्रत
२. शील
३. सम्मान
४. लोक के दुखों से छुटकारा
५. परलोक के दुखों से छुटकारा
क्रोध से मात्र अपयश, और लोक परलोक के दुःख ही मिलते हैं। आगमों में क्षमा के अपूर्व उदाहरण प्राप्त होते हैं – जब भरत बाहुबली द्वंद्व में भरत को मारने के लिए उठाई हुई मुष्टि को अत्यंत बलशाली बाहुबली क्षमा धारण कर लोच के लिए स्वयं अपने सर पर ले जाते हैं और वीतरागी बन जाते हैं। क्षमा धारण करने पर उन्हें उपर्लिखित सभी लौकिक एवं अलौकिक सुख प्राप्त हुए। दूसरी तरफ द्वैपायन ऋषि का उदाहरण भी हमारे सामने है जहां उनका क्रोध पूरी की पूरी द्वारिका नगरी को ही भस्म कर देता है। आज भी वह क्रोध उनके अपयश का कारण है। यह क्रोध अंतरंग को भी जला देने वाली अपूर्व अग्नि है,मानसिक बुद्धि (दृष्टि) का नाश करने वाला अन्धकार है, अनिष्ट करने वाला प्रेत है – ऐसे क्रोध को केवल क्षमा ही शांत कर सकती है। यह बात क्रोध करने वाले के लिए भी तथा क्रोध सेहन करने वाले दोनों के लिए सत्य है। सामर्थ्य होते हुए भी बदला न लेना – इस परिभाषा के अनुसार क्षमा प्रतिकार को रोकने का एक सशक्त उपकरण है।

हम चर्चा कर चुके हैं कि दया की भावना पर ही संसार में जीवन टिका है – यदि माता पिता बच्चे द्वारा उनको दिए जाने वाले कष्टों के लिए बच्चे को क्षमा नहीं कर पाएंगे तो संतति संरक्षण न होने से सभी जातियां प्रजातियां विनाश को प्राप्त हो जायेंगी। क्षमा शब्द क्ष तथा मा दो शब्दों से मिल कर बना है – मा का अर्थ होता है – असंतुलन,असुविधा, प्रतिकूल, दुःख, अनिष्ट इत्यादि, क्ष का योग होने से इन सबका क्षय हो जाता है अतः मा के दुष्प्रभाव अथवा प्रतिकूलता को समाप्त करना ही क्षमा है।यह परिभाषा हमें एक बड़ा ही सरल समीकरण प्रदान करती है :

क्षमा = संतुलन, सुविधा,सुख एवं इष्ट
जब हमारे व्यवहार में क्षमा नहीं रहती और हम दूसरों की आत्मा को पर समझ कर उसे चोट पहुंचाते हैं तभी व्यक्ति विशेष, समाज विशेष तथा सम्पूर्ण विश्व में असंतुलन, असुविधा, प्रतिकूलता, दुःख, अनिष्ट आदि दिखाई देता है। क्षमा सीधे तौर पर क्रोध का क्षय करने वाली है।

क्षमा का उद्गम समझ लेने के पश्चात आइये अब समझें कि क्षमा की प्रक्रिया क्या है – इस प्रक्रिया को तीन चरणों में बाँट सकते है।

१. अपने वचन और काया के द्वारा दूसरों को हुए कष्ट के लिए पश्चात्ताप करना (प्रबुद्ध आत्माएं तो मन में आये बुरे विचारों केलिए भी पश्चात्ताप करती हैं।
२. पश्चात्ताप के भावों को वचन द्वारा प्रकट करना दूसरा चरण है।
३. जो कुछ बुरा हम कर चुके हैं उसके बदले अब अच्छा या और अधिक अच्छा करना – यह क्षमा का अंतिम चरण है।
यह क्रोधी द्वारा क्षमा का साधारण सा गणित है, अब देखें जिस पर क्रोध किया गया है वह बेचारा कैसे क्षमा करे :
१. जब क्रोधी अभिमान छोड़ कर क्षमा मांगे तो उसे स्वीकार करे
२. यदि क्रोधी अपने स्वाभाव को न छोड़ता हुआ सतत हानि पहुँचाने को तत्पर रहता है तो उसे अनदेखा तो करे किन्तु साथ ही उसे समझाने का प्रयत्न करता हुआ क्षमा की राह पर लाये। यदि आवश्यकता हो तो उसे पुरस्कृत भी करे।
३. यदि बुरा करने वाला आपसे अधिक शक्ति शाली है तो भी उसके प्रति किस प्रकार का दुर्भाव न रखता हुआ उसके बुरे कृत्यों/अपकार को भूल कर उसे ह्रदय से क्षमा दान दे। सदा यह विचार मं में रखे कि यह क्रोधी जीव अज्ञानी है तथा मद के पाश में जकडा हुआ है।
४. अज्ञान भ्रम अथवा माया से उत्पन्न होता है , जिस प्रकार मदिरा पीने वाला मतवाल रहता है तथ अपनी सुध बुध खो देता है उसी प्रकार यह जीव भी क्रोध, अहंकार आदि के मद में अपना असल स्वभाव भूल बैठा है। इसने दया धर्म को याद नही रखा इसीलिए यह विपरीत कार्य कर रहा है। एक बार यदि इसे यह समझ में आ जाये कि वह दूसरे के अधिकारों का हनन कर बुरा काम कर रहा है तो वह क्षमा का धारक हो कर सम भाव में आ जायेगा।

समाज में व्यक्तियों में मतभेद होना स्वाभाविक है , यह कोई अपराध नहीं है। अनेकांत वाद का दृष्टिकोण हमारे मतभेदों को दूर करने वाला उपकरण ह। “संभव है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो सकूं, फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की मैं रक्षा करूँगा।” इसी भाव के साथ विभिन्न विचारधारों वाले व्यक्ति एक समाज के रूप में इकट्ठे हो कर रह सकते हैं।
१. बहुत अधिक मोह राग और द्वेष हिंसा को बढ़ावा देते हैं।  मोह एक मिथ्या अवधारणा है जिसके प्रभाव में हम जड़ वस्तुओं यथा गृह , जायदाद, स्वर्ण, संपत्ति ,पत्नी, पुत्र आदि को अपना माने की भूल कर बैठते हैं। राग भी मोह का एक परिष्कृत रूप है। राग और मोह का विरोध द्वेष को जन्म देता है। संसारी जीव राग द्वेष और मोह से पूर्णतः मुक्त तो नहीं हो सकता किन्तु यदि वह क्षमा को धारण कर लेता है तो रागद्वेष मोहादि को कम, बहुत कम करता हुआ अपनी गति सुधार सकता है। इसी हेतु जैन धर्म में पर्युषण पर्व का प्रावधान है जिसके अंतर्गत क्षमा की आराधना करता हुआ प्राणी संसार में वह चार गति, चौबीस दंडक, चौरासी लाख जीव योनी के सभी प्रकार के जीवों से मिच्छामि दुक्कदं कह कर क्षमा मांगता है। यह और कुछ नहीं अपितु स्वयं को अहंकार के मद से बचाए रखने का एक तरीका है।  जैन समुदाय क्षमा को मात्र आध्यात्मिक स्तर पर ही न अपना कर सामाजिक स्तर पर भी इसे मान्यता प्रदान करवाता है।  क्षमावणी पर्व इसका जीता जागता उदाहरण ह।  संवत्सरी के अतिरिक्त महवीर जयंती पर भी दया धर्म की आराधना कर क्षमा धर्म का पालन किया जाता है।
क्षमा तथा कायरता में अंतर
क्षमा कायरता नहीं है – क्षमा और कायरता में जो मूलभूत अंतर है वह है सामर्थ्य का। जो शक्ति न होने के कारण प्रतिकार नहीं करता वह क्षमा शील नहीं कायर है। परन्तु जो बल शील होते हुए भी अपने प्रति अपकार करने वाले को कष्ट न दे कर समता से उसे क्षमा करता है वही सही अर्थों में क्षमा शील है। कायर के मन में क्षमा नहीं बदला लेने की भावना होती है वहीं क्षमाशील के मन में बदले की नहीं क्षमा की भावना होती है।

क्षमा को साक्षात् धर्मं कहते हुए इसकी परिभाषा आचार्यों ने निम्न शब्दों में भी दी है – क्रोध के उत्पन्न होनेके साक्षात् बाहरी कारण मिलने पर भी जो थोडा भी क्रोध नहीं करता है उसके उत्तम क्षमा धर्मं होता है। कुराल काव्य में क्षमा करने वालों को तपस्या करने वालों से भी बड़ा कहा गया है –
“महान्तः सन्ति सर्वे पि क्षीण कायास्तपस्विन:
क्षमावन्तमनुख्याता: किन्तु विश्वे हि तापसा:”
अर्थात उपवास करके तपस्या करने वाले निस्संदेह महान हैं परन्तु उनका स्थान उन लोगों के पश्चात है जो अपनी निंदा करने वालों को क्षमा कर देते हैं।  क्षमा धारी मुनियों की सर्वत्र महिमा का गान किया जाता ह। यह कथन प्रायः सभी धर्मों पर लागू होता है अतः क्षमा मात्र जैन धर्म की बपौती नहीं है अपितु प्रत्येक धर्म इसको अपने में समाहित करता है। परन्तु महावीर की क्षमा क्षमाधारियों की ऐसी विलक्षण विशेषताओं को धारण किये है कि सामान्य क्षमा को अपने में समेटे हुए यह क्षमाधारी को साधू, मुनि एवं वीतरागी की श्रेणी में ला खड़ा करती है। तभी तो कहा जाता है ‘क्षमा वीरस्य भूषणं’।  कायर तो कभी क्षमा कर ही नहीं सकता।  क्षमा करने के लिए बड़े जिगर वाला होना ज़रूरी है।

जैन धर्म का एव महत्व पूर्ण नारा है- जियो और जीने दो। आधुनिक मानव इसका पालन न करता हुआ हिंसा को अपने जीवन में लाकर दुःख एवं अशांति को निमंत्रण दे रहा ह। परस्परोपग्रहो जीवानां को भूल कर वह स्वार्थ वश एनी जीवों को भयंकर यातनाएं दे रहा है। आधुनिक युग में महावीर की क्षमा को गांधी जी के एक थप्पड़ के बाद दूसरा गाल आगे कर देने के भाव में समझा गया तो अत्याधुनिक युग में फिल्म ‘ लगे रहो मुन्ना भाई में फूल दे कर क्षमा भाव का परचम लहराया गया। अतः हमें यह समझ लेना चाहिए कि क्षमा कोई पुरातन पंथी वस्तु नहीं है अपितु यह आधुनिक युग की भी मांग है। यदि जैन धर्म की क्षमा की अवधारणा को सही प्रकार से समझ कर आत्मसात कर लिया जाए तो सम्पूर्ण संसार में सुख एवं समृधि का वास हो जायेगा।

The author of the article is Dr. C. Devakumar, FNAAS, Assistant Director General, Education Planning & Development, ICAR and Editor, NAAS, Krishi Anusandhan Bhawan - II, New Delhi-110012, Mob : 08010509335


Ahmadabad: Palitana is a well-known Jain pilgrim town, with thousands of Jain visiting the temple every year. Palitana is about 70 kms from Bhavnagar about 400 kms from Ahmadabad. Palitana Municipal Committee buckling under the pressure of the Jain religious leadership passed a resolution in its general body to ban the sale of meat and other non-vegetarian food, including eggs, within the municipal limits. The decision would be implemented after inviting objections from the residents of the town with a population of over one lakh, with 25 per cent of it being Muslims. According to the local government officials, about 40 per cent of the town population is non-vegetarian. A municipal official told this reporter that apart from Muslims, many Hindu communities like Kolis are also non-veg and opposing the decision. Out of two non-veg hotels in the town, one is run by a Sindhi Hindu and another by a Muslim.

BJP leader and municipality president Pravinbhai Gadhvi told the mediapersons that the decision was taken following the demand of the Jain religious leadership. He said that some Jain religious leaders led by Maharajsaheb Maitriprabhasagar in March this year had sat on a dharna demanding ban of meat in the town. He had threatened to self-immolate himself if the municipality did not accept the demand. Gadhvi said that the municipality passed the resolution to bring a ban. However, before implementing the decision, the municipality would collect objections from the residents and then recommend to the state government to issue a notification imposing the ban. BJP is in majority in the municipality, occupying 30 seats in a house of 36. Municipality's chief executive officer J L Dave said: We will invite objections from the people as it is a policy matter. We can't take a decision on our own. Depending on the response of the people, we will write to the state government''. He said that everything would depend on the reactions of the people to the municipality. Another official said that the decision was taken by the municipality under political pressure as Jains were politically very influential in the state and contributed a lot to the BJP election coffers. However, the official said that the decision for a ban was not as per constitutional provisions.


New Delhi, 18 April 2012: Prime Minister Dr. Manmohan Singh Chaired the third meeting of National River Ganga Basin Authority at his residence. Dr. Manmohan Singh addressing the meeting said that Ganga is the soul of India. Faith and beliefs of crores of Indians is associated with Ganga, so Authority Ganga will make pure and true efforts by giving special attention to restore the ancient dignity of Ganga to keep its prosperity safe for future generations. Prime Minister further said that we have to make special efforts to create a balance between envirment conservation of Ganga and its Basin’s present situation and Economic growth and development. Increasing Urbanization, Industrialization and Population is not only polluting the Ganga water but also endangering the water capacity and existence of Ganga. Melting of Ice-Hills and Environmental changes are making adverse effect on flow of Ganga. We are facing a very complex challenge. I assure you on behalf of Central Government that we will take positive action in this direction with top priority. On the Occasion Founder of Ahimsa Vishwa Bharti Jain Acharya Dr. Lokesh Muni, Swamy Avimukteshweranand Saraswati of Ganga Sewa Abhiyan, Kalkipithadishwar Acharya Pramod demanded that no dam should be constructed on Ganga. CM of Uttrakhand Mr. Bahuguna, CM of Jharkhand Mr. Munde, Representative of Bengal CM, Water Expert Mr. Rajender Singh, Dr. Ravi Chopra, Prof. R. S. Siddique also expressed their views.


New Delhi, 14 April 2012: The second session of Guru Sangmam organized in Tyagraj Stadium, New Delhi was attended by more than 250 recognised spiritual leaders from all over the country. The Jain community was represented by Acharya Dr. Lokesh Muni, Founder of Ahimsa Vishwa Bharti. The other prominent spiritual leadership included names like Shri Satguru Jaggivasudev Ji, Jagatguru Shivratri Desikendra Mahaswamy Ji, Jagatguru Ramanandacharya Swamy Hansdev Ji, Swamy Chidanand Saraswati Ji of Parmarth Niketan figured prominently,

Addressing the daylong session Shri Satguru Jaggivasudev Ji said that Spiritualism and Science are two sides of the same coin. Object of both is to search the truth. India will have to lead the world for Spiritual Freedom. Spiritual development of a person automatically destroys evils of society. Acharya Dr. Lokesh Muni Ji, Founder of Ahimsa Vishwa Bharti said that religion creates a bond between us, it does not create differences. On the path of religion, violence, hatred, fears and dislike has no space. He said that when different political parties can govern the country together for five years, why can’t different religious leaders work together? Acharya Lokesh expressed his hope that Guru Sangmam will provide a platform for different religious Gurus to come together for establishing India as Spiritual Power. Jagatguru Ramanandacharya Swamy Hansdev Ji said that presently the whole world is facing the fear of War, Violence and Terrorism, but violence and terrorism cannot solve any problem. Peace is essential for development. Guru Sangmam will promote non-violence, peace and harmony. Swamy Chidanand Saraswati Ji of Parmarth Niketan said that Guru Sangmam is an announcement of Non- Communal, Innovative Religious Revolution. People from all religions can join us for Spiritual Freedom to create Spiritual Consciousness in the whole world.

On the occasion Shri Mahamantradas from ISCKON, Acharya Roopchndra Muni, Shri Amrendra Muni, Shri Vivek Muni, Mahamandaleshwar Shri Maheshwaranand Giri (Rajsthan), Swamy Adhyatmanad Saraswati (Gujrat), Swamy Prabhakaran Nanda Saraswati (Kerala), Shri Nishananda Guruji (Karnataka), Balarishi Shri Vishwasrasini Ji (Tamilnadu), Swamy Atam Chetnaya Ji, Swamy Sajeev Shivyog (Punjab) and many others expressed their views. Courtesy: Pankaj Vidyarthi, M: 9717809161. For further information contact : Ahimsa Vishwa Bharti, Founder: Acharya Dr. Lokesh Muni, Website :, E-mail -, E-mail: , M. No. 91-9313833222 91-9660102645


Recognising the presence and contribution of Indian community in United States, the White House hosted an interactive meeting with Hindu, Buddhist, Sikh and Jain leaders to listen to their concerns and issues. Addressing a meeting , Paul Monteiro, Associate Director, White House , observed that the Dharmic American community is interested in all the issues that everyone is interested in, healthcare and security. As we see it, in America, the seva movement is a tool of social justice, a way to deal with community issues. The eastern Dharmic traditions share many commonalities. Anju Bhargava of Hindu American Seva Charities (HASC) said we are trying to understand how can we engage with each other collectively. For the event, HASC had partnered with many Buddhist, Hindu, Jain and Sikh organisations, including Council of Hindu Temples, JAINA, Soka Gakkai International-USA and others to create a coalition. Former US Senator Harris Wofford, advisor to Martin Luther King and the pioneering force behind the creation of Peace Corps said this room, where the conference is being held, is the Indian Treaty room, where many things have happened, and history can be made here with this Dharmic undertaking. Kenneth Bedell, Policy Advisor, shared the announcement of Together for Tomorrow, a programme initiated by the Department of Education and White House Faith OFBNP to re-emphasis the idea that education is not just the responsibility of the teachers and schools, or of the parents, but of the whole community. Bill Aiken, Public Affairs Director of Soka Gakkai Buddhist Association said, this conference marked an expansion and deepening of the dialogue between the administration and the Buddhist, Hindu and Jain and Sikh communities, and recognition of the growing contribution these faiths are making in American society,

अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के आचार्य रामलाल की जयन्ती समारोह पूर्वक मनाई
कपासन। अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के आचार्य श्री रामलाल म.सा. का 60वां जन्म जयन्ती महोत्सव साधुमार्गी जैन संघ व समता युवा संघ के संयुक्त तत्वावधान में विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ मनाया गया। समता युवा संघ अध्यक्ष संतोष चण्डालिया के अनुसार महामंत्र नवकार का सामूहिक जाप, सामायिक व्रत व आचार्यश्री रामेश चालीसा की आराधना 3 बजे से 4 बजे आचार्य रामेश के जीवन पर आधारित प्रश्नों का संयोजन पूर्व अध्यक्ष अनील जैन के सानिध्य में सम्पादित किया गया जिसमें बालक महिला व पुरूष वर्ग प्रश्नों के उत्तर देने वालों को मोमेन्टो प्रदान किये गये। संयोजन संघ मंत्री अशोक बाघमार ने किया। समारोह लक्ष्मीलाल चण्डालिया की पुत्री दिपीका चण्डालिया ने सुखाडिय़ा युनिवर्सिटी से एम.कोम. में गोल्ड मेडल प्राप्त करने पर संघ अध्यक्ष महेन्द्र चण्डालिया द्वारा सम्मानित किया

For the first time in history of Jain religion diksha ceremony was organised outside the Indian frontiers. Sadhvi Sanghamitraji, (known as Mangalamji before diksha) will be offered badi diksha at California, USA on April 10th, 2012 . Sadhvi Sanghamitraji is associated with Veerayatn, Bihar, India, since her childhood. At the young age of 6 years, she memorized Bhaktamar, Kalyan Mandir and Tatwartha Sutra and other Jain Stotras. She has been blessed with the opportunity of studying scriptures and ancient languages such as Sanskrit and Prakrit under the divine and scholarly guidance of Param Pujya Gurudev Amar Muniji Maharaj and Acharya Shri Chandanaji Maharaj. She is also blessed with an enchanting melodious voice. Jain Diksha (initiation) occurs in two phases. The initial Diksha, and within 6 months, the final (Badi) Diksha. Mangalam's initial Diksha took place under Acharya Shri Chandanaji at Veerayatan, Rajgir, Bihar, India on December 20th 2011. During the initiation process she was given a new name Sadhvi Sanghamitra. The Badi Diksha took place at the Jain Center of Northern California, Milpitas (San Francisco) California on April 10, 2012. On behalf of the community Jaina Education Committee ( educational wing of Jaina, USA ) actively participated and supported the ceremony programmes. A book was also published by Jaina Education Committee on the occasion. Book contains information about Diksha ceremony procedures, brief information of Veerayatan mission, Acharya Shri Chandanji's message, Sadhvi Shri Sanghamitraji's life, Veerayatan Palitana project. The Diksha procedures sutras from the Jain Agams - Nandi Sutra and Dasvaikalik Sutra were recited by Sadhivi Shree Sanghamitraji and the entire audience joined in the recitation with Sadhviji. Acharya Shri Chandanaji and Sadhvi Shri Subhamji explained the meaning. Courtesy : Pravin K. Shah, E-Mail :, UTube Videos - Deeksha Samaroh of Sadhvi Sanghmitra Ji and

Delhi, The Union Cabinet is likely to consider a proposal that seeks to do away with the requirement to disclose religious affiliation for registration of marriages. Sikhs also may be allowed to register their marriages under a separate law. The move has been prompted by the consideration to help those opting for inter-faith marriages, along with the need to make registration of marriages a simpler affair. It is recognized that those who marry outside their religion face harassment, including from the conservative sections of the bureaucracy. As for the demand of Sikh bodies, they have argued that their marriages should be, as is the case with other minority communities – Muslims, Christians, Jews, Parsis – registered under a separate law. Marriages of Sikhs along with those of Buddhists and Jains are currently registered under the Hindu Marriage Act: an arrangement which is being opposed by many Sikhs as part of their pursuit for a distinct identity. These groups argue that their demand can be accepted by amending the Anand Marriage Act, 1909. The Cabinet will be required to factor in view that meeting the demand will spark similar pitches from Jains and Buddhists: two other communities that have so far been comfortable with the practice, where their marriages are registered under the Hindu Marriage Act.

Madurai : In an effort to create awareness on the rich heritage of Jainism in Madurai, second year MA English students of Fatima College have come out with a documentary film on the subject. The documentary called 'The Caves of Wisdom' speaks about the growth of Jainism in Madurai by 3 BC and how the Jain monks took abode in the hillock caves surrounding Madurai. In the film, epigraphist and retired archaeologist V Vedachalam and R Venkataraman, retired history professor, MKU narrate the rich Jain heritage in Madurai. Releasing the documentary film in the college premises, Venkataraman said that the Jains were the ones who shaped the education system in Tamil Nadu. Jain monks contributed to the growth of the language and many components of Tamil grammar. Ancient Tamil brahmi letters found in the caves around Madurai are the best example how the caves functioned as education centres, he said. N Ganesan, assistant director, archaeology department was also present for the release function.

The documentary presents the existing Jain caves like Arittapatti, Thiruparankundram and Yanamalai with the exclusive space for Anamalai and the struggle of the local people protecting the hillock against the proposal of Sculpture City proposed in the hillock. P Sivakumaran of Yanamalai Pathukappu Iyakkam narrates in the movie how granite barons are trying to take the hillock into their hands in the name of Sculpture City and the struggle of those fighting to protect it as a heritage monument. Over a period of five months, 19 students worked on the research and production of the documentary film with the help of the Centre for Development Communication of Dhan Foundation. S Jescilla, one of the students said that it was an eye-opening experience to learn about the Jain heritage in Madurai which was often confined just as the temple city. It was a great exposure for us to know the rich heritage of the city which had been the centre of Jainism in the south, she quipped. S Geetha, associate professor of the department said that documentary film making was a paper for the MA English students and the department had already produced six documentary films earlier. Jain heritage in Madurai was not documented before and it was a great experience for the department. Through the documentary, we want to sensitise people about the importance of saving the hillocks with the Jain monuments," she said.


India Post has issued a 5/- stamp on Godi Parasnath Temple, a famous Jain Temple situated at Pydhonie, Mumbai on 17th april 2012. Hon. Min .of State for Comm. Milind Deora released this stamp in a function at Mumbai. Constructed in 1812 by Moti Shah, a wealthy Jain businessman, Godiji is among the most prominent community temples in the city. The 200 years will be complete on 1stMay 2012, but the programmes started from 14th April 2012. Over a lakh-and-a-half Jain families in the Mumbai city have already served the sweets to celebrate 200 years of this Temple. From next month, they will be able to hear devotional songs by professional singers, lectures by prominent saints and participate in a grand two-km procession to celebrate the occasion. The celebrations will include a grand lunch programme on May 1 for eight lakh Jains. They will not have to come here, since food will be available at all the Jain temples across the city. The two-storeyed, all-marble structure already boasts around 86 marble idols, two crystal idols, and 76 small silver idols, among others. Named after the 23 Tirthankar of the Jains -Bhagwan Parshvanath - this idol came from a temple in Godipur, Pakistan, thus lending the word “Godiji” to the temple’s prefix.

Hundreds of years ago, after several experiences of miracles and dreams the original idol was installed in Godi village in the desert-region of Tharparkar (now in Pakistan ). It is said that just because of this, the idol became renowned as Shree Godi Parshvanath. A number of ancient and impressive installed idols of Godiji Parshvanath are present today. Among them this idol of Godiji Parshvanath in the Pydhuni locality of Bombay is very delightful, miraculous and very ancient. From the ancient temple of Hamirpur in Rajasthan, this idol was brought to Bombay and installed in Fort in the beginning of the eighteenth century. The fort locality caught a terrible fire in the year 1859 of the vikram era. The fire lasted for 72 hours and caused a ruin worth lakhs of rupees. Therefore, many Jain families of the fort locality came to settle in the Pydhuni locality. Therefore, it was decided to move this idol of Shree Godiji Parshvanath to another place.

In the year 1868 of the vikram era, a splendid Jain temple was built, the splendid idol of Godiji parshvanath was installed in the new temple. Thereafter, on the second floor an idol of Shri Chintamani Parshvanath Bhagavan was installed and thereafter the idol of Shri Sharmila Parshvanath Bhagavan was intalled in a separate temple. Thus, three birthdays are observied every year. Recently, keeping the idol of the MULANAYAKA just where it is, the whole temple is renovated with marble from Makrana. Tall pillars, gorgeous peak and dome decorate the temple as if it were a plane of Gods. The Sangha of Shri Vijayadevasuri Gaccha looks well after the administration of this Jina temple.Five years ago, the temple had eight shikhars. Shikhar is the triangular-shaped sacred symbol situated at the top of a temple. The Jain saints however felt that it would be auspicious to have a nine-shikhar Jain temple. With the guidance and blessings of Acharya Suryodaysagarji Maharaj, who had taken shelter at the temple for the months of Chaturmas at that time, the devotees decided to build the nine shikhars, and install a 31-inch idol of Shree Parshwanath.Finally, on a 31-inch idol of Shree Suvarna Parshwanath Bhagwaan made with an alloy of five elements unveiled at the Lord Parshvanaths Godiji Jain temple in Pydhonie. The idol was made in Palitana in Gujarat , which is the holy place of the Jains. First silver, copper, brass and bronze were used for the molding of the idol. The idol will then be coated with 5 kgs of solid gold. Courtsey: Sudhir Jain, Chairman Jainism Philately Group e.mail:

जैन ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी पर धोखाधड़ी का प्रकरण
करीब १३ वर्ष पूर्व जयसिंहपुरा जैन मंदिर से गायब हुए सोने के जेवरात व बर्तनों के मामले में न्यायालय ने संज्ञान लिया है। वर्तमान पदाधिकारियों द्वारा लगाए परिवाद पर कोर्ट ने ट्रस्ट के एक पूर्व पदाधिकारी पर धोखाधड़ी का प्रकरण दर्ज कर पुलिस को उसे पेश करने के निर्देश दिए हैं। श्री दिगंबर जैन मंदिर ट्रस्ट, नमकमंडी अध्यक्ष प्रकाशचंद्र कासलीवाल व सचिव अनिल गंगवाल ने फरवरी में पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष से लेकर सचिव तक रहे राजस्व कॉलोनी निवासी नरेंद्र बिलाला के खिलाफ जिला एवं सत्र न्यायालय में परिवाद दायर किया था। आरोप था कि करीब 13 वर्ष पहले मंदिर को दान में मिले 41 चांदी के बर्तन, दो स्वर्ण कलश व 9 आभूषण तत्कालीन पदाधिकारी बिलाला धोखे से घर ले गए। बर्तनों की जगह पालिश किए बर्तन रख दिए। न्यायाधीश सुनील अहिरवार ने ट्रस्ट के रिकार्ड को देखते हुए हाल ही में बिलाला पर धारा 406420 के तहत प्रकरण दर्ज कर दिया। कोर्ट ने माधवनगर पुलिस को निर्देश दिए कि वे 27 अप्रैल को बिलाला को कोर्ट में पेश करें

The Basic Thought of Bhagavan Mahavir - by Dr Jay kumar Jalaj English translation by GF Burhanpurkar, Edited by Axel Järvengren & Peter W-O Berglin, Published by Hindi Granth Karyalay, Mumbai, English 2012 24 cm x 18 cm 24 pages, ISBN 978-81-88769-77-3 Paperback Rs. 25, Also available as an e-book on Amazon. Mahavir attained omniscience after realising the true nature of reality. His knowledge transcended barriers of space and time, so that he could see the past, present and future concurrently. Self and non-self became evident. All substances in the world, together with all their manifestations, became manifest to him, as clear as a gooseberry held in the palm of one's hand. And all of this was spontaneous, effortless, without conation or the need for sensory perception.

The attainment of omniscience enabled Mahavir to assimilate within himself the mutual relationship between entities and set standards of appropriate behaviour which allowed each living being the space to live in peace and tranquility with all others. He perceived the eternal truths of anekanta (many-sidedness of reality), syadvada (contextual concomitance of each substance in the universe), ahimsa (non-violence), aparigraha (detachment from external substances), acaurya (refraining from taking what does not belong to one) and bramacarya (purity of mind and body) and underlined the key importance of tolerance and mutual respect for harmonious coexistence with all living beings in the universe. He knew that if one waters the roots of a plant, one need not water its flowers, fruits and leaves - hence his tremendous emphasis on tolerance and mutual respect, the cornerstones of a peaceful existence. Mahavir, victorious in the struggle between self and non-self, realised the importance and uniqueness of the soul, its distinctness from the body, and the nonidentical nature of the body with the soul. Mahavir's supreme detachment from all that existed other than his soul has been beautifully captured by Indian sculpture, which depicts him either in seated or standing position, with eyes half closed, but aware and alert - awake to the self and inattentive to the external world. Mahavir knows himself. Knowing oneself is knowing everything. The primary focus of the omniscient soul is itself. This work was originally written in Hindi in 2002 upon the request of the government of Madhya Pradesh, on the occasion of the 2600th birth anniversary of Lord Mahavir. The author, in simple, contemporary, yet powerful language reveals to us the teachings of Mahavir. Now translated into several languages, it has sold more than 80,000 copies worldwide. Hindi Granth Karyalaya , Mumbai , e. mail:

Magnopanishad - By Upadhyaya Yashovijaya, Hindi and Gujarati translations by Acarya Kalyanabodhi, English translation by Manish Modi, Fully illustrated in four colours and printed on art paper, 2012 22 x 14 cm 20 pages, Paperback, Can any spiritual benefit be derived sans self-immersion? Supreme bliss - supreme happiness - supreme serenity - supreme awareness - call it what you want. It is the complete immersion of one’s consciousness in the supreme self that leads to lasting peace and happiness. One who has not immersed himself in the atman, has wasted his life, irrespective of his worldly achievements. Such a person may seem successful in the eyes of others, but his spiritual quotient shall remain nil.On the other hand, one who has dipped in the nectar of the atman, has attained the jewel of all treasures - self realisation. So come, immerse yourself in the supreme self - the atman. This text carries the original verses by Upadhyaya Yashovijaya, along with a clear and lucid translation in Hindi, Gujarati and English. The USP of this book is the gorgeous artwork. It is a slim book printed on art paper and designed to be as attractive as a coffee table book. Source : Yashodhar Modi, E- Mail :

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Aatham | Chaudas | Pancham | Bij | Agiyaras


Jain Festival


Auspicious Day

Mon Tue Wed Thu Fri Sat Sun

Avoid Green & Root Vegetables Date : 2 | 5 | 7 | 10 | 13 | 16 | 19 | 23 | 26 | 29
Avoid Root Vegetables: Date: 1 | 3 | 4 | 6 | 11 | 14 | 18 | | 24 | 25|30 |
Jain Festival -Date: 6 - Poonam
Auspicious Days
Date : 1 - Mahavirswami Kevalgnan Kalyanak
Date : 3 - Vimalnath Chavan Kalyanak
Date : 4 - Ajitnath Chavan Kalyanak
Date : 11 - Shreyansanath Chavan Kalyanak
Date : 13 - Munisuvrata Janma Kalyanak
Date : 14 - Munisuvrata Nirvan Kalyanak
Date : 18 - Shantinath Janma & Nirvan Kalyanak
Date : 19 - Shantinath Diksha Kalyanak
Date : 26 - Dharmanath Nirvan Kalyanak
Date : 30 - Vasupujya Chavan Kalyanak

Sud Dasam
Sud Baras
Sud Teras
Sud Chaudas
Sud Poonam
Vad Bij
Vad Trij
Vad Choth
Vad Pancham
Vad Chhath
Vad Satam
Vad Aatham
Vad Nom
Vad Dasam
Vad Baras
Vad Teras
Vad Amas
Sud Ekam
Sud Ekam
Sud Bij
Sud Trij
Sud Choth
Sud Pancham
Sud Chhath
Sud Satam
Sud Aatham
Sud Nom
Sud Dasam

जैन साध्वी राजकुमारी को दी श्रद्धाजलि
पंचकूला, जैन साध्वी राजकुमारी की श्रद्धाजलि सभा का आयोजन जैन भवन सेक्टर-15 में किया गया। इसमें साध्वी वीर कान्ता, संतोष, वीना, रक्षा, सुव्रता, श्रुति, डॉ. प्रवीण, रजनी, ज्योति, अर्पिता, समीक्षा, आशा एवं ख्याति के सानिध्य में मनाया गया। इस अवसर पर मदन लाल जलालपुर, डॉ. केएस चुग, राकेश जैन, राधेश्याम जैन, जेपी जैन, बालमुकन्द जैन, एसएन जैन, जिया लाल जैन, डीसी जैन, शील कुमार जैन, मनोहर जैन व नेम कुमार ओसवाल ने साध्वी को श्रद्घासुमन अर्पित किए। इस दौरान मंच का संचालन डीसी जैन व जेपी जैन ने किया। अंबाला श्री संघ ने गुरुणी महाराज का समाधि स्थल अंबाला में बनाने के लिए अस्थि कलश के लिए पंचकूला श्री संघ से निवेदन किया। श्री संघ ने साध्वी जी के आदेश पर अस्थि कलश अंबाला श्री संघ को समर्पित कर दिया। वहीं जैन धर्म के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट श्रीमुनि जी महाराज का संदेश भी पढ़कर सुनाया गया। साध्वी वीरकान्ता जी के मंगल पाठ से श्रद्धाजंलि सभा का संपन्न हुआ।

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