आचार्य डॉ. श्री शिव मुनि जी महाराज साहब - संक्षिप्त जीवन वृत्त

 

 

पूर्व जन्मों के उच्च संस्कारों तथा पुण्योदय से आपने पंजाब प्रांत के मलौट मंडी (जीला फरीदकोट) वासी ओसवाल वंशीय धर्मनिष्ठ लाला श्री चिरंजीलालजी जैन एवम श्रीमती विद्यादेवी जैन का कुक्षि से 18.09.1942 (भादवा सुदी नवमी विक्रम संवत 1999) को अपने ननिहाल रानियां मंडी, हरियाणा में जन्म लिया। जैसे - जैसे बालक बड़ा होने लगा उसके बुधित्मन बुद्धिमता के चरचे स्कूल से लेकर कालजे तक होने लगे। परंतु किसे पता था कि जिस बालक ने परतंत्र भारत में जन्म लिया, और स्वतंत्रता हासिल करने एवम भारत के बंटवारे की विभीषिका को स्वयं अपनी नन्हीं-नन्हीं आंखों से उन हिंसक संघर्ष को देखा, भविष्य के इस जैन संत ने बाल्यकाल में ही सांप्रदायिकता, मृत्यु और मानवता के विनाश के प्रभाव को इतने नजदीक से देखा और समय के साथ-साथ इस युवाम के अंतर्मन एक द्वंद सा हो रहा था, और बेगुनाहों के सामूहिक हत्याकांड के विनाश से परेशान युवा ने मानवता की ज्वलंत समस्या समाधान के रूप में अहिंसा को अपनाने के लिए अपने दिल के द्वारा।

विभिन्न संकृतियों नैतिकता और मूल्यों तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए आप जिनेवा टोरंटो कुवैत संयुक्त राज्य अमेरिका और दुनिया भर के कई अन्य स्थनों का भ्रमण दीक्षा के पूर्व करने गए। अंग्रेजी साहित्य हो और दर्शनशास्त्र के साथ एम. ए. करने के पश्चात भारतीय दर्मों धर्मों में मुक्ति की अवधारणा, जैन धर्म का विशिष्ट सदंर्भ पर पी.एच.डी., डी.लिट. प्राप्त की। वही ब्यक्ति जैन समाज के शीर्ष पद पर आज आसीन है। आपकी दीक्षा 17 मई 1972 को वैशाख सुदी पंचमी विक्रम संवत 2029 मलौट मंडी (जिला फरीदकोट) पंजाब में (ठीक 12.00 बजे ) दीक्षा के समय आपने सिंह गर्जना करी और कहा था कि- मैं अपने कुल का गौरव रखुंगा और सिंह की भांति दृƒढ़ता के साथ सयंम का पालन करुगाँ।

दीक्षा गुरु – बहुश्रुत, जैनागमरत्नाकर, राष्ट्रसंत, श्रमणसंघीय सलाहकार पूज्य श्री ज्ञान मुनि जी महाराज साहब की निश्रा में एक जैन संत के रूप अपना जीवन तीर्थंकारों और जैन धर्म के सिद्धान्तों एवं शिक्षा के प्रचार के माध्यम से शांति और अहिंसा के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। साथ हीI उपाध्याय प्रवर श्री फूलचंद जी महाराज साहब एवम अन्य विद्वान संतों से द्रिव्यश्रुत का ज्ञान ग्रहण कर अध्यात्म साधना के द्वारा भावश्रुत परिणित कर उसका सार रूपीˆज्ञान चतुर्विध संघ को प्रति - पादित करते रहे।

13 मई 1987 (वैशाख सुदी पुर्णिमा, विक्रम संवत 2044) में पुणे (महाराष्ट्र) साधु सम्मेलन में आपको तत्कालीन आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज साहब के द्वारा श्रमण संघ के युवाचार्य के रूप प्रतिष्ठित पद से स्म्मानित किया गया था जो कि स्थानकवासी श्रमण संघ के एक युवा गति शील संत की सर्वोच्च उपलब्धि थी। वर्ष 1999 में मुंबई में आचार्य पूज्य श्री देवेंद्र मुनि जी महाराज साहब के दु:खद निधन के पश्चात आपको 9 जून 1999 ज्येष्ठ वदी ग्यारस विक्रम संवत 2056) को अहमदनगर (महाराष्ट्र ) में श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य के रूप में स्म्मानित किया गया। चादर महोत्सव - समारोह 2 मई 2001 (वैशाख सुदी पूर्णिमा, विक्रम संवत 2058) को ऋषभ विहार दिल्ली में किया गया। साधु जन स्वयं का साधना करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सहयोग भी करते हैं‚। आचार्य स्वयं के अलावा यह भी जानते हैं,‚सोचते हैं कि संघ के अन्य सदस्यों को कौन सी और कैसी साधना उपयुक्त होगी ? कौन सा मार्ग साधन के लिए उपयुक्त होगा? आचार्य सघं का पिता होता है, वह जो करता है वही चतुर्विध संघ करता है। वह स्वयं पंचाचार का पालन होता है, तथा उस पथ पर संघ को ले जाने कुशल हस्त होता है। आचार्य पद की और अग्रसर होने पर आपने कहा था कि - मैं श्रमण संघ के अविचल और मगंल के लिये समपर्ण भाव से कार्य करुगाँ - आज श्रमण संघ सबसे वृहद लगभग 1257 साधु – साध्वियों इस चतुर्विद्ध संघ से जुड़े हुए है, जिसका संपूर्ण श्रेय आपको सबको साथ लेकर चलने एवम शांत गंभीर शैली के फलस्वरूप ही है।

आपने आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मारामजी महाराज के समस्त साहित्य की पुनः प्रकाशन करवाकर जैन साहित्य की मंजूषा को भर दिया है। आपकी सादगी, मानवता, त्याग और भक्ति का ब्यक्तिगत उदाहरण मानव अस्तित्व के मूल दर्शन का गहन ज्ञान अत्यंत प्रशंसनीय है और हमेशा अनुयायियों पर गहरा प्रभाव डालता है। जीवन जगत तथा आध्यात्त्म का गहन अनुभव रखने वाले युग प्रधान, आध्यात्त्म योगी, क्रांत द्रष्टा, आचार्य सम्राट पूज्य गु†देव श्री शिव मुनि जी म. सा. ने" मानव मात्र के कल्याणार्थ, आत्मा के उत्थान, उत्कृष्टता एव विकास हेतु वर्ष 2022 को वैराग्य वर्ष घोषित किया है। गौतम स्वामी गुप्त तपस्या करते थे, आप भी गुप्त तपस्वी है कभी तप व साधना की चर्चा नहीं करते। वर्षों से एकांतर उपवास के साथ आभ्यंतर तप के रूप में सतत स्वाध्याय व ध्यान तप में लीन है। वैराग्य की प्ररिभाषा-आशा का उपशन कर, समस्त इच्छाओं को त्याग कर निर्मल हुए अपने चित्त को सहजता से आत्मा साक्षात्कार करने में स्थिर कर, भोगों की और से मन को हटाकर, आत्मा साक्षात्कार मे लीन हो जाना ही सच्चा वैराग्य है। आज दो दशकों से भी अधिक समय से आप ध्यान के विभिन्न तरीकों पर शोध करते हुए एवं ध्यान के तरींकों को परिष्कृत करके अपनी खुद का अनुभवी और परिणाम उन्मुख तकनीकों को विकसित कर रहे हैं आपकी ध्यान पद्धति से लाखों अनुयायियों को लाभ हो रहा है। ध्यान शिविर में आप प्रेरित करते हैं कि हमारे शरीर के पांच कोशो को कैसे साफ किया जाए शरीर–भौतिक शरीर, करण शरीर, मानव शरीर, बौद्धिक शरीर, और आनंद शरीर है। ध्यान के अभ्यास से शरीर की सफाई शरीर और मन के रोग दूर होना, प्यार करने वाला, आत्माविश्वास से भरा प्राकृतिक नेतृत्व गुण ब्यक्ति में आते है।

समाज के प्रत्येक वर्ग के विकास हेतु आपके द्वारा योजनाएं बनाई गई है, एवम निरंतर कार्यरत है - बाल संस्कार एवम धार्मिक प्रशिक्षण के लिए गुरुकुल पद्धति - श्री सरस्वती विद्या केंद्र, नासिक, - साधु – साध्वी / श्रावक - श्राविकाओं के जीवन में आनंद की उपलब्धि हेतु सेवा केंद्र - भगवान महावीर मेडिटेशन एंड रिसर्च सेंटर दिल्ली - देश - विदेश में जैन धर्म प्रचार - प्रसार हेतु स्वाथ्याय एवम ध्यान साधना हेतु प्रयास-देश भर में दिवसीय ध्यान साधना शिवर का आयोजन।

आपको अब तक प्राप्त अवार्ड:
1.साई मियां मीर इंटरनेशनल अवार्ड - 2005
2.महात्मा गांधी सर्विस अवार्ड 4 - 2006
3.सर्व धर्म महासंघ के मुख्या संरक्षक
4. ए. पी. जे. अब्दुल दुल कलाम विश्व शांति पुरस्कार - 2020
 

 

 

लेखक :- सुरेन्द्र मारू, इंदौर ( +91 98260 26001)

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www.jainsamaj.org
R221122


 



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