
श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र मुनि जी म. सा.
तमिलनाडु सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए राज्य के 52 प्रमुख मंदिरों में 1 सितंबर 2026 से कैमरे वाले मोबाइल फोन भीतर ले जाने पर रोक लगा दी है। श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश करने से पहले अपने मोबाइल फोन निर्धारित काउंटर पर जमा कराने होंगे। इस निर्णय के पीछे उद्देश्य मंदिरों की पवित्रता, शांति और आध्यात्मिक वातावरण को बनाए रखना तथा अनावश्यक फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, सेल्फी और सोशल मीडिया रील्स पर अंकुश लगाना है।
यह निर्णय केवल तमिलनाडु के मंदिरों तक सीमित चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए। जैन समाज और जैन मंदिरों के प्रबंधकों के लिए भी यह आत्ममंथन का अवसर है।
आज जैन मंदिरों में भी कई बार ऐसा दृश्य दिखाई देता है कि श्रद्धालु भगवान के सामने तो खड़ा है, लेकिन उसका ध्यान भगवान की प्रतिमा से अधिक मोबाइल के कैमरे पर है। दर्शन से पहले फोटो, पूजा के बीच फोटो, मंदिर की सजावट की फोटो और फिर तुरंत सोशल मीडिया पर स्टेटस—“मैं अमुक मंदिर आया।”
क्या यह बताने की चिंता कि “मैं मंदिर आया हूं”, कहीं इस प्रश्न से बड़ी तो नहीं हो गई कि “मैं मंदिर क्यों आया हूं?”
जैन दर्शन हमें अंतर्यात्रा, संयम, अपरिग्रह और आत्मावलोकन की प्रेरणा देता है। भगवान की प्रतिमा के सामने खड़े होकर भी यदि हमारा मन लगातार मोबाइल की स्क्रीन, कैमरे और सोशल मीडिया की दुनिया में भटकता रहे, तो हमें स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए—
हम मंदिर में भगवान को देखने आए हैं या अपनी तस्वीर दुनिया को दिखाने?
यह मोबाइल रखने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की आलोचना नहीं है। मोबाइल आज जीवन की आवश्यकता भी बन चुका है। आपातकालीन परिस्थितियां हो सकती हैं और अनेक व्यावहारिक कारणों से मोबाइल साथ रखना आवश्यक हो सकता है। इसलिए समाधान पूर्ण कठोरता नहीं, बल्कि धार्मिक स्थल की गरिमा के अनुरूप मर्यादा और सुव्यवस्था में खोजा जाना चाहिए।
तमिलनाडु में मोबाइल जमा करने के लिए सुरक्षित काउंटर, रसीद और निर्धारित शुल्क जैसी व्यवस्था की गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि मुख्य उद्देश्य फोटोग्राफी, वीडियो, सेल्फी और रील्स जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करना है।
तो क्या जैन मंदिरों में भी ऐसी व्यवस्था पर विचार नहीं होना चाहिए?
गर्भगृह और पूजा क्षेत्र में मोबाइल का उपयोग पूर्णतः निषिद्ध हो।
फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के संबंध में स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा, अभिषेक और आराधना के दौरान मोबाइल का प्रयोग न किया जाए।
विशेष आयोजनों में सोशल मीडिया के लिए अनावश्यक शूटिंग और रील बनाने पर मर्यादा निर्धारित हो।
आवश्यकता हो तो मंदिर के प्रवेश द्वार पर सुरक्षित मोबाइल जमा केंद्र बनाए जाएं।
क्योंकि मंदिर में आने का उद्देश्य “कंटेंट बनाना” नहीं, चेतना जगाना होना चाहिए।
आज हमें यह तय करना होगा कि मंदिर में बिताए गए कुछ क्षण ऐसे भी हों, जब न कोई नोटिफिकेशन हो, न कैमरा, न स्टेटस और न रील—सिर्फ भगवान हों और हमारा मन हो।
लेकिन मंदिर परिसर में बिताया गया एक सच्चा आध्यात्मिक क्षण शायद हमारे पूरे जीवन की दिशा बदल दे।
तमिलनाडु का यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने इसे केवल “मोबाइल की समस्या” नहीं माना, बल्कि धार्मिक स्थलों की गरिमा, पवित्रता और श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक अनुभव से जोड़कर देखा है।
अब यही प्रश्न जैन समाज के सामने भी है—
क्या जैन मंदिरों में भी मोबाइल के उपयोग की मर्यादा तय करने का समय आ गया है?
अंततः प्रश्न बहुत सरल है, लेकिन उत्तर हमें भीतर तक झकझोर सकता है—
Ahimsa Foundation warmly welcomes information, photographs, literature, articles, and other meaningful contributions for publication on this web portal: www.jainsamaj.org | ✉ CAINDIA@HOTMAIL.COM
We also invite advertisements and sponsorship support to help us expand the reach of this social initiative and promote public awareness of Jain ideology.
Related
Related
Related