उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤·à¥à¤•र मà¥à¤¨à¤¿à¤œà¥€ म. सा. - संकà¥à¤·à¤¿à¤ªà¥à¤¤ जीवनवृत
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साधना के शिखर पà¥à¤°à¥à¤· विशà¥à¤µà¤¸à¤‚त उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤·à¥à¤•र मà¥à¤¨à¤¿ जी म. के जीवन पर दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤ªà¤¾à¤¤ करते हैं तो संजà¥à¤žà¤¾à¤¨ होता है कि उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पà¥à¤°à¥à¤·à¤¾à¤°à¥à¤¥ के माधà¥à¤¯à¤® से ही जà¥à¤žà¤¾à¤¨ और साधना के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में उचà¥à¤š सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया।
पू. उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ शà¥à¤°à¥€ का जनà¥à¤® आसोज शà¥à¤•à¥à¤² चौदस वि. सं. 1967 अपने ननिहाल गà¥à¤°à¤¾à¤® नांदेशमा, उदयपà¥à¤°, राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में, पालीवाल बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£ परिवार सिमटार गà¥à¤°à¤¾à¤® ( गà¥à¤°à¥ पà¥à¤·à¥à¤•र नगर ) राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ निवासी पिता शà¥à¤°à¥€ सूरजमलजी और माता शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¤à¥€ वालीबाई की रतà¥à¤¨ कà¥à¤•à¥à¤·à¤¿ से हà¥à¤†à¥¤ आपका नाम अंबालाल रखा गया। à¤à¤¸à¤¾ बताया जाता है की जिस समय आपका जनà¥à¤® हà¥à¤† पूरे सिमटार गà¥à¤°à¤¾à¤® में हरà¥à¤·à¥‹à¤²à¥à¤²à¤¾à¤¸ और खà¥à¤¶à¥€ का माहौल हो गया था।
कौन जानता था कि यह बालक बड़ा होकर चारितà¥à¤°à¤¨à¤¿à¤·à¥à¤ , शà¥à¤°à¤®à¤£à¤à¥‚षण, संयमशील मà¥à¤¨à¤¿à¤µà¤°à¥à¤¯ उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤·à¥à¤•र मà¥à¤¨à¤¿ जी महाराज* बनकर तà¥à¤¯à¤¾à¤—, वैरागà¥à¤¯ का पथिक बन अपनी जनà¥à¤®à¤à¥‚मि, कà¥à¤², समाज और अपने माता- पिता के नाम को सूरà¥à¤¯ के पà¥à¤°à¤•ाश की à¤à¤¾à¤‚ति यतà¥à¤° - ततà¥à¤° - सरà¥à¤µà¤¤à¥à¤° फैलाà¤à¤—ा?
मातà¥à¤° 9 वरà¥à¤· की उमà¥à¤° में अपनी माता शà¥à¤°à¥€ का असाधà¥à¤¯ बीमारी की वजह से निधन हो जाने की घटना ने आपको अंदर तक हिला दिया और संसार की असारता के वश आपके वैरागà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤µ जागà¥à¤°à¤¤ हो गठ। 14 वरà¥à¤· की लघॠवय में जेठसà¥à¤¦à¥€ दशमी वि. सं. 1981 को नांदेशमा गà¥à¤°à¤¾à¤®, उदयपà¥à¤° में जनà¥à¤® ले उसे अमर बनाने वाले बालक अंबालाल ने विखà¥à¤¯à¤¾à¤¤ संत पूजà¥à¤¯ शà¥à¤°à¥€ ताराचंदजी महाराज के शà¥à¤°à¥€ चरणों में जैन दीकà¥à¤·à¤¾ अंगीकार कर ली। दीकà¥à¤·à¤¾ पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ बालक अंबालाल की पहचान शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤·à¥à¤•र मà¥à¤¨à¤¿à¤œà¥€ महाराज के रूप में हो गई।
वे जà¥à¤žà¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ के लिठसजग थे। जैन à¤à¤¾à¤—वती दीकà¥à¤·à¤¾ गà¥à¤°à¤¹à¤£ करने के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ अपने गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ के सानिधà¥à¤¯ में हिंदी, संसà¥à¤•ृत, गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤à¥€, पà¥à¤°à¤¾à¤•ृत आदि à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤“ं का जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¾à¤°à¥à¤œà¤¨ किया। जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¾à¤°à¥à¤œà¤¨ करने के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ वे अपने जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की पà¥à¤¨à¤°à¤¾à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿ à¤à¥€ नियमित रूप से करते रहते थे। इसके लिठनियमित सà¥à¤µà¤¾à¤§à¥à¤¯à¤¾à¤¯, पà¥à¤°à¤µà¤šà¤¨ और लेखन और गायन वे करते रहते थे। संत जीवन में आचार - विचार की समà¥à¤œà¥à¤œà¤µà¤²à¥à¤¤à¤¾ हो, समà¥à¤¯à¤œà¥à¤žà¤¤à¤¾, विवेक कà¥à¤¶à¤²à¤¤à¤¾ तथा समाज सेवागत पटà¥à¤¤à¤¾ हो तो उस संत जीवन का लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯ हो जाना सà¥à¤µà¤¾à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤• ही है।
विसà¥à¤¤à¥ƒà¤¤ जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¾à¤°à¥à¤œà¤¨ के कारण ही आज उनके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित विपà¥à¤² साहितà¥à¤¯ उपलबà¥à¤§ है। उनके à¤à¤• पà¥à¤°à¤®à¥à¤– शिषà¥à¤¯à¤°à¤¤à¥à¤¨ आचारà¥à¤¯ पद पर पदासीन किये गये। ये थे - आचारà¥à¤¯ शà¥à¤°à¥€ देवेनà¥à¤¦à¥à¤° मà¥à¤¨à¤¿à¤œà¥€ म. à¤à¤• पà¥à¤°à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤ साहितà¥à¤¯ मनीषी के रूप में à¤à¥€ पà¥à¤°à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤ थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अनेक कालजयी गà¥à¤°à¤‚थ रतà¥à¤¨à¥‹à¤‚ की रचना कर à¤à¤• कीरà¥à¤¤à¤¿à¤®à¤¾à¤¨ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया।
वरà¥à¤· 1964 में आचारà¥à¤¯ समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ पूजà¥à¤¯ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ आनंद ऋषि जी महाराज साहब के ततà¥à¤µà¤¾à¤§à¤¾à¤¨ में शिखर समà¥à¤®à¥‡à¤²à¤¨ अजरामरपà¥à¤°à¥€, अजमेर में आयोजित होने जा रहा था। उस समय आचारà¥à¤¯ शà¥à¤°à¥€ आचारà¥à¤¯ शà¥à¤°à¥€ नहीं अपितॠउपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ थे और शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ पà¥à¤°à¤®à¥à¤– कारà¥à¤¯ संचालक थे।समà¥à¤®à¥‡à¤²à¤¨ में पूजà¥à¤¯ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ बंबई से विहार कर राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पधार रहे थे। शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ में कई गà¥à¤¤à¥à¤¥à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ उलà¤à¥€ हà¥à¤ˆ थी, जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤²à¤à¤¾à¤¨à¥‡ हेतॠगà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ शà¥à¤°à¥€ को आपके मधà¥à¤° सहयोग की आवशà¥à¤¯à¤•ता थी। अतः गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ शà¥à¤°à¥€ से संपरà¥à¤• करने हेतॠराजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ केशरी, धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ योगी शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤·à¥à¤•र मà¥à¤¨à¤¿à¤œà¥€ महाराज अपने संत मंडल के साथ गà¥à¤²à¤¾à¤¬à¤ªà¥à¤°à¤¾ पधारें। पूजà¥à¤¯ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ à¤à¥€ à¤à¥€à¤²à¤µà¤¾à¤¡à¤¼à¤¾ से गà¥à¤²à¤¾à¤¬à¤ªà¥à¤°à¤¾ पधारे ।आपने गà¥à¤°à¥ वंदना कर à¤à¤•ांत में गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ से चरà¥à¤šà¤¾ कर सà¤à¥€ गà¥à¤¤à¥à¤¥à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को सà¥à¤²à¤à¤¾ दिया और गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ की चिंता को दूर कर दिया। ततà¥à¤ªà¤¶à¥à¤šà¤¾à¤¤ विजय नगर, बà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤° और अजमेर में à¤à¥€ आप दोनों साथ साथ ही रहे।
उस समय तो आप यà¥à¤µà¤¾ ही थे और अपनी जà¥à¤žà¤¾à¤¨ à¤à¤µà¤‚ संयम साधना के लिठचरà¥à¤šà¤¿à¤¤ हो चà¥à¤•े थे। शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ की à¤à¤•ता के लिये आपने सेतॠका काम किया। आपके अथक परिशà¥à¤°à¤® का परिणाम यह हà¥à¤† कि सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤•वासी जैन समà¥à¤ªà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ के अनेक आचारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ /संघ पà¥à¤°à¤®à¥à¤–ों ने शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ की à¤à¤•ता के लिये à¤à¤• सà¥à¤µà¤° में समरà¥à¤¥à¤¨ किया और अपने-अपने पदों का विसरà¥à¤œà¤¨ à¤à¥€ कर दिया। अंतत: शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ का गठन हà¥à¤†à¥¤à¤¸à¤à¥€ लोग आपकी पà¥à¤°à¤•ृषà¥à¤Ÿ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾ को देखकर विसà¥à¤®à¤¿à¤¤ थे। आपके विशेष पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ से आचारà¥à¤¯ पद पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ करने का समारोह उलà¥à¤²à¤¾à¤¸ पूरà¥à¤µà¤• संपनà¥à¤¨ हो पाया। कम आयॠके होने के बावजूद आपको शिकà¥à¤·à¤¾ मंतà¥à¤°à¥€ का उतà¥à¤¤à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤¿à¤¤à¥à¤µ सौंपा गया था।
वरà¥à¤· 1976 में जब आपका वरà¥à¤·à¤¾à¤µà¤¾à¤¸ रायचूर (करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿà¤•) में था। संवतà¥à¤¸à¤°à¥€ महापरà¥à¤µ के दिन आपको "उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ पà¥à¤°à¤µà¤°" के पद से विà¤à¥‚षित किया गया।
आपको à¤à¤¾à¤°à¤¤ सरकार के महामहिम राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤ªà¤¤à¤¿ शà¥à¤°à¥€ जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¥€ जेलसिंह जी के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ देहली में आपके 74 वे जनà¥à¤®à¤¦à¤¿à¤µà¤¸ पर "विशà¥à¤µà¤¸à¤‚त" की उपाधि से विà¤à¥‚षित किया गया जो कि सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤•वासी जैन समाज और शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ के लिठबड़े ही गौरव की बात है।
पू. उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ शà¥à¤°à¥€ ने संयमी जीवन में जप और धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ साधना को विशेष सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ दिया। जैन शà¥à¤°à¤®à¤£ कà¤à¥€ à¤à¥€ अपनी लबà¥à¤§à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ नहीं करते हैं। किनà¥à¤¤à¥ जिस साधक को लबà¥à¤§à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हो जाती हैं, वे सà¥à¤µà¤¤: उनके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दी जाने वाली मांगलिक के माधà¥à¤¯à¤® से पà¥à¤°à¤•ट होने लगती है। उनके जीवन में अनेक पà¥à¤°à¤•ार के अतिशय घटित हà¥à¤à¥¤ पू. उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ शà¥à¤°à¥€ अनेक वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ से 12 बजे के समय धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ साधना के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ मांगलिक फरमाया करते थे। उनकी मांगलिक से अनेक à¤à¤µà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¾à¤£à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के कषà¥à¤Ÿ दूर हà¥à¤à¥¤ उनकी समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं का अनायास ही समाधान हो गया और आगे का मारà¥à¤— पà¥à¤°à¤¶à¤¸à¥à¤¤ हो गया।
जीवन के अंतिम समय में आप उदयपà¥à¤° में अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯ शिषà¥à¤¯ आचारà¥à¤¯ पूजà¥à¤¯ शà¥à¤°à¥€ देवेंदà¥à¤° मà¥à¤¨à¤¿à¤œà¥€ के शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ के तृतीय आचारà¥à¤¯ पद के चादर महोतà¥à¤¸à¤µ जो कि चैतà¥à¤° सà¥à¤¦à¥€ पंचमी 28.03.1993 को होना था के लिये अतà¥à¤¯à¤‚त ही हरà¥à¤·à¤¿à¤¤ और उलà¥à¤²à¤¾à¤¸à¤¿à¤¤ थे*। अचानक आपका सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ खराब हà¥à¤† और नाक से अतà¥à¤¯à¤§à¤¿à¤• खून बहने से आप गंà¤à¥€à¤° बीमार हो गà¤à¥¤ *अपने अंत समय में अपने शिषà¥à¤¯ देवेंदà¥à¤° से चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² नवमी 01.04.1993 को कहा कि - मैं अब कà¥à¤› ही समय का मेहमान हूं अब मेरा अंतिम समय आ गया है मà¥à¤à¥‡ चौविहार संथारा करवा दो। सबकी राय से उनà¥à¤¹à¥‡ जागà¥à¤°à¤¤ अवसà¥à¤¥à¤¾ में चौविहार संथारा करवाया, कà¥à¤› ही समय पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ वे पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤‚त मà¥à¤¦à¥à¤°à¤¾ में बिना हिले डà¥à¤²à¥‡ सोते रहे। चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² à¤à¤•ादशी 03.04.1993 को रातà¥à¤°à¤¿ 9 बजकर 18 पर मिनिट पर वह जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿à¤·à¤¿à¤–ा निसà¥à¤ªà¤‚द हो सà¥à¤µà¤°à¥à¤—ारोहण के पथ à¤à¤µà¤¸à¤¾à¤—र की ओर महापà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤£ कर गई। आपकी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ में शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤·à¥à¤•र गà¥à¤°à¥ सà¥à¤®à¤¾à¤°à¤• धाम, गà¥à¤°à¥ पà¥à¤·à¥à¤•र रोड उदयपà¥à¤° में à¤à¤•à¥à¤¤à¥‹à¤‚ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ निरà¥à¤®à¤¿à¤¤ करवाया गया।
आप अपने जीवन के अंतिम समय तक शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ की à¤à¤•ता के लिठकठोर अधà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¯ करते रहे। आप जैसे मूरà¥à¤§à¤¨à¥à¤¯ संतों से ही शà¥à¤°à¤®à¤£ संघ की गौरव गाथा आज à¤à¥€ गूंज रही है।
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लेखक :- सà¥à¤°à¥‡à¤¨à¥à¤¦à¥à¤° मारू, इंदौर ( +91 98260 26001)
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