अहिंसामूरà¥à¤¤à¥€ à¤à¤—वान महावीर

शà¥à¤°à¥€ अनिल जैन
समगà¥à¤° देश à¤à¤—वान महावीर जयनà¥à¤¤à¥€ उतà¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤ªà¥‚रà¥à¤µà¤• मनाने जा रहा है। अहिंसा, संयम à¤à¤µà¤‚ तपोमय आदरà¥à¤¶ जीवन के पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤•, à¤à¤—वान महावीर को इस संतपà¥à¤¤ विशà¥à¤µ में सà¥à¤®à¤°à¤£ कर, उनके जीवनादरà¥à¤¶à¥‹à¤‚ के चिंतन à¤à¤µà¤‚ पालन की जीतनी आवशà¥à¤¯à¤•ता आज उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆ है, उतनी संà¤à¤µà¤¤: पहले कà¤à¥€ नहीं रही होगी। इसलिठआज हम पà¥à¤¨:, हमारे सà¥à¤‚दर अतीत की इस परम विà¤à¥‚ति की गौरव -गाथा गाकर, अपने राषà¥à¤Ÿà¥€à¤¯ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ को टटोलें और पà¥à¤¨: उनके मंगल मारà¥à¤— पर चलने का संकलà¥à¤ª करें।
à¤à¤¾à¤°à¤¤ में शà¥à¤°à¤®à¤£ और वैदिक, ये दो परमà¥à¤ªà¤°à¤¾à¤à¤‚ बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨à¤•ाल से चली आ रही हैं। इनका असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• काल से आगे पà¥à¤°à¤¾à¤—à¥-à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• काल में à¤à¥€ जाता है। à¤à¤—वान ऋषठपà¥à¤°à¤¾à¤—à¥-à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• काल में हà¥à¤ थे। वे जैन परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ के आदि तीरà¥à¤¥à¤•र थे और धरà¥à¤®-परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ के à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¥à¤® पà¥à¤°à¤µà¤°à¥à¤¤à¤• थे। à¤à¤—वान महावीर चैबीसवें और इस यà¥à¤— के अंतिम तीरà¥à¤¥à¤•र के रूप में मानà¥à¤¯ हैं।
à¤à¤—वान महावीर का जनà¥à¤®-सà¥à¤¥à¤¾à¤¨, गंगा के दकà¥à¤·à¤¿à¤£ में और पटना से 27 मील उतà¥à¤¤à¤° में, आया बसाड़ नाम का गांव है। वहां कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ कà¥à¤‚ड और कà¥à¤£à¥à¤¡à¤ªà¥à¤° नाम के दो उपनगर थे। ईसा से 599 वरà¥à¤· पूरà¥à¤µ, चैतà¥à¤°à¤¾ शà¥à¤•à¥à¤²à¤¾ तà¥à¤°à¤¾à¤¯à¥‹à¤¦à¤¶à¥€ के पावन दिन, à¤à¤—वान महावीर ने पिता सिदà¥à¤µà¤¾à¤°à¥à¤¥ à¤à¤µà¤‚ माता महारानी तà¥à¤°à¤¿à¤¶à¤²à¤¾ के यहाठजनà¥à¤® लिया।
तीस वरà¥à¤· की योवनावसà¥à¤¥à¤¾ में, महावीर पूरà¥à¤£ संयमी बनकर शà¥à¤°à¤®à¤£ बन गये। दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ होते ही उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ मन: परà¥à¤¯à¤µ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ हो गया। दीकà¥à¤·à¤¾ के बाद, महावीर पà¥à¤°à¤à¥ ने घोर तपसà¥à¤¯à¤¾ à¤à¤µà¤‚ साधना की। उनके महान उपसरà¥à¤—ों को अपूरà¥à¤µ कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ à¤à¤¾à¤µ से सहन किया। गà¥à¤µà¤¾à¤²à¥‹à¤‚ का उपसरà¥à¤—, संगम देव के कषà¥à¤Ÿ, शूलपाणि यकà¥à¤· का परिषह, चणà¥à¤¡à¤•ौशिक का डंक, वà¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤à¤°à¥€ के उपसरà¥à¤—, à¤à¤—वान महावीर की समता à¤à¤µà¤‚ सहनशीलता के असाधारण उदाहरण हैं। साडे बारह वरà¥à¤· की अपूरà¥à¤µ साधना के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ पà¥à¤°à¤à¥ महावीर को केवल जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की उपलबà¥à¤§à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤
à¤à¤—वान महावीर को केवल जà¥à¤žà¤¾à¤¨ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होते ही, देवगणों ने पंचदवà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की वृषà¥à¤Ÿà¤¿ की और सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤° समवसरण की रचना की। à¤à¤—वान के समवशरण में आकाश मारà¥à¤— से देव-देवियों के समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ आने लगे। पà¥à¤°à¤®à¥à¤– पंडित इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤à¥‚ति को जब मालूम हà¥à¤†, कि नगर के बाहर सरà¥à¤µà¤œà¥à¤ž महावीर आये हैं और उनà¥à¤¹à¥€à¤‚ के समवसरण में, ये देव गण जा रहें हैं, तो उनके मन में अपने पांडितà¥à¤¯ का अहंकार जागà¥à¤°à¤¤ हो उठा। वे à¤à¤—वान के अलौकिक जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की परख करने और उनको शासà¥à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤°à¥à¤¥ में पराजित करने की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ से समवसरण में आये।
à¤à¤—वान की शांत मà¥à¤¦à¥à¤°à¤¾ à¤à¤µà¤‚ तेजसà¥à¤µà¥€ मà¥à¤– मणà¥à¤¡à¤² को देखकर तथा उनकी अमृत वाणी का पान करने से इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤à¥à¤¤à¤¿ के सब अनà¥à¤¤à¤°à¤‚ग संशयों का छेदन हो गया और वे उसी समय अपने शिषà¥à¤¯à¥‹à¤‚ सहित à¤à¤—वान के चरणों मे दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हो गये। इसी पà¥à¤°à¤•ार अनà¥à¤¯ दस विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ à¤à¥€ अपनी शिषà¥à¤¯ मणà¥à¤¡à¤²à¥€ के साथ उसी दिन दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤à¥¤ से गà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¹ पà¥à¤°à¤®à¥à¤– शिषà¥à¤¯ ही गणधर कहलाये।
à¤à¤—वान महावीर ने अहिंसा, संयम, तप, पांच महावà¥à¤°à¤¤, पांच समिति, तीन गà¥à¤ªà¥à¤¤à¤¿, अनेकानà¥à¤¤, अपरिगà¥à¤°à¤¹ à¤à¤µà¤‚ आतà¥à¤®à¤µà¤¾à¤¦ का उपदेश दिया। अवतारवाद की मानà¥à¤¯à¤¤à¤¾ का खणà¥à¤¡à¤¨ करते हà¥à¤, उतà¥à¤°à¤¾à¤°à¤µà¤¾à¤¦ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ किया। यजà¥à¤ž के नाम पर होने वाली पशॠà¤à¤µà¤‚ नरबलि का घोर विरोध किया तथा सà¤à¥€ वरà¥à¤— के सà¤à¥€ जाति के लोगों को धरà¥à¤®à¤ªà¤¾à¤²à¤¨ का अधिकार बतलाया। जाति-पांति व लिंग के à¤à¥‡à¤¦à¤à¤¾à¤µ को मिटाने हेतॠउपदेश दिये। चंदनबाला पà¥à¤°à¤•रण महावीर की सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ जाति के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ संवेदना का विशेष उदाहरण है।
मà¥à¤¹à¤¾à¤µà¥€à¤° ने 30 वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ तक, तीरà¥à¤¥à¤•र के रूप में विचरण कर, जैन धरà¥à¤® का सदà¥à¤ªà¤¦à¥‡à¤¶ दिया। आपका अंतिम चातà¥à¤°à¥à¤®à¤¾à¤¸ पावापà¥à¤°à¥€ में हà¥à¤†à¥¤ जब वरà¥à¤·à¤¾à¤•ाल का चौथा मास चल रहा था, कारà¥à¤¤à¤¿à¤• कृषà¥à¤£à¤¾ अमावसà¥à¤¯à¤¾ के दिन, à¤à¤—वान ने रातà¥à¤°à¤¿ में चार अ़दà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¤¿ करà¥à¤®à¥‹à¤‚ का कà¥à¤·à¤¯ किया और पावापà¥à¤°à¥€ में परिनिरà¥à¤µà¤¾à¤£ को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤à¥¤ पावापà¥à¤°à¥€ बिहारशरीफ के सनà¥à¤¨à¤¿à¤•ट है। यहां पर सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤° à¤à¤µà¤‚ मनोरम जल-मंदिर है। जैन लोग इसे à¤à¤—वान महावीर की पà¥à¤£à¥à¤¯à¤à¥‚मि मानते हैं और इस पवितà¥à¤° तीरà¥à¤¥à¤à¥‚मि का दरà¥à¤¶à¤¨ कर अपने जीवन को कृतकृतà¥à¤¯ समà¤à¤¤à¥‡ हैं। निरà¥à¤®à¤¾à¤£ के समय à¤à¤—वान की आयॠ72 वरà¥à¤· थी।
à¤à¤—वान महावीर पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¥‹à¤§à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• हिंसा, पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•ारातà¥à¤®à¤• हिंसा और आशकाजनित हिंसा से उपरत थे, अनरà¥à¤¥ हिंसा की तो बात ही कहां? à¤à¤—वान महावीर अपने साधना काल में पà¥à¤°à¤¾à¤¯: मौन रहते थे। अधिकांश समय धà¥à¤¸à¤¾à¤¨à¤¸à¥à¤¥ रहते और अनाहार की तपसà¥à¤¯à¤¾ करते थे। वे अपने विशिषà¥à¤Ÿ साधना बल के आधार पर कैवलà¥à¤¯ को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤à¥¤
जनà¥à¤® के पूरà¥à¤µ गरà¥à¤à¤•ाल में ही, महावीर ने अहिंसा को आतà¥à¤®à¤¸à¤¾à¤¤à¥ कर लिया था। जैन साहितà¥à¤¯ में उनके गरà¥à¤à¤•ाल का à¤à¤• रोचक पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होता है। गरà¥à¤à¤¸à¥à¤¥ शिशॠवदà¥à¤°à¥à¤µà¤®à¤¾à¤¨ ने à¤à¤• बार विचार किया कि, जब मैं मां के उदर में सà¥à¤ªà¤‚दन-कंपन करता हूà¤, तो इससे मेरी माठको कषà¥à¤Ÿ तो होता होगा। कà¥à¤¯à¤¾ ही अचà¥à¤›à¤¾ हो, कि मैं सà¥à¤ªà¤‚दन को बंद कर दूं, ताकि मेरी माठको कषà¥à¤Ÿ ना हो। शिशॠने वैसा ही किया। शरीर को सà¥à¤¥à¤¿à¤° कर लिया। मानो की कायगà¥à¤¤à¥à¤¤à¤¿ और कायोतà¥à¤¸à¤°à¥à¤— का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया हो। उधर मां तà¥à¤°à¤¿à¤¶à¤²à¤¾ ने अनà¥à¤à¤µ किया कि गरà¥à¤ का सà¥à¤ªà¤‚दन बंद हो गया। लगता है गरà¥à¤ मृत हो गया है। इस अनà¥à¤®à¤¾à¤¨ ने माठको शोक सरोवर में निमगà¥à¤¨ कर दिया।
कà¥à¤› समय बाद गरà¥à¤à¤¸à¥à¤¥ शिशॠने विशिषà¥à¤Ÿ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ से माठकी सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ को देखा तो पता चला की काम तो उलà¥à¤Ÿà¤¾ ही हो गया। किया तो अचà¥à¤›à¥‡ के लिठऔर हो गया कà¥à¤› अनà¥à¤¯à¤¥à¤¾à¥¤ उसने पà¥à¤¨à¤ƒ सà¥à¤ªà¤‚दन शà¥à¤°à¥‚ किया तब माठको पता चला कि गरà¥à¤ सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¿à¤¤ है। वातावरण पà¥à¤¨à¤ƒ हरà¥à¤·à¤®à¤¯ बन गया। उस समय गरà¥à¤à¤¸à¥à¤¥ शिशॠने चिंतन किया कि, मेरे सà¥à¤ªà¤‚दन बंद कर देने मातà¥à¤° से माठको इतना कषà¥à¤Ÿ हो सकता है, तो यदि मैं माà¤-पिता की विदà¥à¤¯à¤®à¤¾à¤¨à¤¤à¤¾ में संनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ का पथ सà¥à¤µà¥€à¤•ार करूंगा तो उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ कितना कषà¥à¤Ÿ होगा। इसलिà¤, मैं संकलà¥à¤ª करता हूà¤, कि अपनी माता-पिता की विदà¥à¤¯à¤®à¤¾à¤¨à¤¤à¤¾ में, सनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ सà¥à¤µà¥€à¤•ार नहीं करूंगा। यह पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग पà¥à¤°à¤à¥ महावीर के गरà¥à¤à¤•ाल में होने वाली करूणा और मातृ-पितृ à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ का सशकà¥à¤¤ और विरल उदाहरण हैं।
à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ महावीर का साधनाकाल घोर कसà¥à¤Ÿà¤®à¤¯ रहा था। शूलपाणि यकà¥à¤· और संगम देव ने à¤à¤•-à¤à¤• रात, पà¥à¤°à¤à¥ को बीस बीस मारणनà¥à¤¤à¤¿à¤• कषà¥à¤Ÿ दिये। जिनको पà¥à¤¨à¥‡ और सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ मातà¥à¤°à¤¾ से काया कांप उठती है। शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° अà¤à¤¿à¤¨à¤¿à¤·à¥à¤•मण के बाद कई महीनों तक महावीर का देह को जहरीले मचà¥à¤›à¤°, कीड़े आदि नोचते रहे और उनका रकà¥à¤¤ पीते रहे। लाॠदेश के अनारà¥à¤¯ लोगों ने à¤à¤—वान को बहà¥à¤¤ यातनाà¤à¤‚ दी। मारा, पीटा शिकारी कà¥à¤¤à¥à¤¤à¥‹à¤‚ को पीछे लगाया। चणà¥à¤¡ कौशिक सांप ने काटा। गà¥à¤µà¤¾à¤²à¥‹à¤‚ ने कानों में किलà¥à¤²à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ ठोकी, पावों में आग जलाकर की खीर पकाईठफिर à¤à¥€ समता के सà¥à¤®à¥‡à¤°à¥ महावीर अडोल और अकमà¥à¤ª रहे। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¯à¥‹à¤—, तपोयोग और अनà¥à¤¤à¤®à¥Œà¤¨ में लीन रहे। उनकी चेतना सदा असà¥à¤ªà¤°à¥à¤¶ योग के शिखर पर पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ित रही। वे आतà¥à¤® केंदà¥à¤°à¤¿à¤¤ थे।
महावीर का पूरा साधना काल समता की साधना में बिता। उनके सामने अनà¥à¤•ूल और पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•ूल दोनों ही पà¥à¤°à¤•ार के परीषह उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपनी सहिषà¥à¤£à¥à¤¤à¤¾ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उन परीषहों को निरसà¥à¤¤ किया। उनकी समता की साधना थी।
शोध विदà¥à¤µà¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ के मत से महावीर को कोई à¤à¤¸à¤¾ दिवà¥à¤¯ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ था, जिससे, वह अपने पà¥à¤°à¤¾à¤£ ऊरà¥à¤œà¤¾ को चेतना के किसी à¤à¤¸à¥‡ बिनà¥à¤¦à¥ पर केंदà¥à¤°à¤¿à¤¤ कर लेते थे, जिससे शरीर पर घटित होने वाली किसी à¤à¥€ घटना का उनकी चेतना पर पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ नहीं पड़ता था। वह गà¥à¤£ उनका विलकà¥à¤·à¤£ असà¥à¤ªà¤°à¥à¤¶à¤¯à¥‹à¤— ही था।
महावीर का सबसे महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚त अनेकानà¥à¤¤à¤µà¤¾à¤¦ व सà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤µà¤¾à¤¦ है। महावीर ने कहा है कि सà¤à¥€ मत और सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚त पूरà¥à¤£ सतà¥à¤¯ या पूरà¥à¤£ असतà¥à¤¯ नहीं हैं। सापेकà¥à¤· दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से विचार करने पर सà¤à¥€ दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण सतà¥à¤¯ ही पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤¤ होते हैं। इसलिà¤à¤à¤…पने अपने मत या सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚त पर अड़े रहने से संघरà¥à¤· बà¥à¤¤à¤¾ है। आज जो वरà¥à¤— संघरà¥à¤·, अशानà¥à¤¤à¤¿ और शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का अनà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤•रण बढ़ रहा है, उसे रोकने में अनेकानà¥à¤¤ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿, सहअसà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¥‚मिका अदा कर सकती है। महावीर ने कहा था, कि पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• इनà¥à¤¸à¤¾à¤¨ यदि अपने सà¥à¤µà¤°à¥‚प को पहचान ले, तो सà¥à¤µà¤¯à¤‚ à¤à¤—वान बन जाता है। महावीर का à¤à¤—वान सृषà¥à¤Ÿà¤¿ संचालक नहीं हैं। महावीर का à¤à¤—वान à¤à¤—वतà¥à¤¤à¤¾ को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ इनà¥à¤¸à¤¾à¤¨ है। महावीर ने सà¥à¤µà¤¯à¤‚ को पहचानने के तीन सूतà¥à¤° दिये à¤à¤•ांत, मौन, और धà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¥¤ महावीर ने तप à¤à¥€ किया था, उपवास का तप। उपवास यानी, आतà¥à¤®à¤¾ में वास करना। à¤à¥‹à¤œà¤¨ छूटना उसका सहज परिणाम था। महावीर के लिठधà¥à¤¯à¤¾à¤¨ और उपवास अलग अलग नहीं थे। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ और उपवास दोनों का ही अरà¥à¤¥ है, आतà¥à¤® केनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¿à¤¤ अवसà¥à¤¥à¤¾à¥¤
महावीर की साधना हमारे जीवन की पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤—à¤à¥‚मि है। हम केवल महावीर के अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¥€ बनकर ना रहे जायें। सà¥à¤µà¤¯à¤‚ के à¤à¥€à¤¤à¤° धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ की जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ जलाकर महावीर को पà¥à¤°à¥à¤¨à¤œà¥€à¤µà¤¿à¤¤ करें। जो महावीर चले गये, वो लौटकर नहीं आ सकते। किंतॠहमारे à¤à¥€à¤¤à¤° का महावीर जरूर जाग सकता हैं। महावीर ने कहा था, अपà¥à¤ªà¤£à¤¾ सचà¥à¤šà¤®à¥‡ सेजà¥à¤œà¤¾à¤‚ मेतà¥à¤¤à¤¿ à¤à¥‚à¤à¤¸à¥ कपà¥à¤ªà¤, सà¥à¤µà¤¯à¤‚ सतà¥à¤¯ को खोजें और à¤à¤µà¤‚ सबके साथ मैतà¥à¤°à¥€ करें। महावीर ने कहा था जीओ और जीने दो। इस पà¥à¤°à¤•ार का महावीर के पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚तों कि आज à¤à¥€ उतनी ही आवशà¥à¤¯à¤•ता है, जितनी उस समय थी। आवशà¥à¤¯à¤•ता सिरà¥à¤« उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ गहराई से समà¤à¤•र अपनाने की है।
महावीर जयंती का यही पवितà¥à¤° पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग निमितà¥à¤¤ बने महावीर को जीने का, महावीर को जानने का, इसी से महावीर के मारà¥à¤— पर चलने में गौरव à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤¸à¤¨à¥à¤¨à¤¤à¤¾ की अनà¥à¤à¥‚ति होगी।
मैं इस शà¥à¤ पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग पर, आप सà¤à¥€ को महावीर जयनà¥à¤¤à¥€ के शà¥à¤ अवसर पर हारà¥à¤¦à¤¿à¤• बधाई देता हूà¤à¥¤
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लेखक : अनिल कà¥à¤®à¤¾à¤° जैन
अधà¥à¤¯à¤•à¥à¤·
अहिंसा फाउंडेशन
21, सà¥à¤•ीपर हाउस, 9, पूसा रोड़, नई दिलà¥à¤²à¥€, फोन : 9810046108
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