शà¥à¤°à¥€ मिथिला जैन तीरà¥à¤¥, सीतामढ़ी
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इस मंदिर में 13 फरवरी 2015 को जैन धरà¥à¤® के 19वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ व 21वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर नमिनाथ की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤®à¤¾ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ की गई।
19वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ व 21वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर नमिनाथ का अवतरण सीतामढ़ी की धरती पर हà¥à¤† था।
19वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ :- जैन धरà¥à¤® के उनà¥à¤¨à¥€à¤¸à¤µà¥‡à¤‚ तीरà¥à¤¥à¤‚कर à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी का जनà¥à¤® मिथिलापà¥à¤°à¥€ के इकà¥à¤·à¥à¤µà¤¾à¤•à¥à¤µà¤‚श में मारà¥à¤—शीरà¥à¤· शà¥à¤•à¥à¤² पकà¥à¤· à¤à¤•ादशी को अशà¥à¤µà¤¿à¤¨ नकà¥à¤·à¤¤à¥à¤° में हà¥à¤† था। इनके माता का नाम माता रकà¥à¤·à¤¿à¤¤à¤¾ देवी और पिता का नाम राजा कà¥à¤®à¥à¤à¤°à¤¾à¤œ था। इनके शरीर का वरà¥à¤£ नीला था जबकि इनका चिनà¥à¤¹ कलश था। इनके यकà¥à¤· का नाम कà¥à¤¬à¥‡à¤° और यकà¥à¤·à¤¿à¤£à¥€ का नाम धरणपà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ देवी शà¥à¤°à¥€ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी ने मिथिलापà¥à¤°à¥€ में मारà¥à¤—शीरà¥à¤· माह शà¥à¤•à¥à¤² पकà¥à¤· की à¤à¤•ादशी तिथि को दीकà¥à¤·à¤¾ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ की थी और दीकà¥à¤·à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ 2 दिन बाद खीर से इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ पà¥à¤°à¤¥à¤® पारण किया था। दीकà¥à¤·à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ à¤à¤• दिन-रात तक कठोर तप करने के बाद à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी को मिथिलापà¥à¤°à¥€ में ही अशोक वृकà¥à¤· के नीचे कैवलà¥à¤¯à¤œà¥à¤žà¤¾à¤¨ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆ थी। शà¥à¤°à¥€ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ के गणधरों की कà¥à¤² संखà¥à¤¯à¤¾ 28 थी, जिनमें अà¤à¥€à¤•à¥à¤·à¤• सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ इनके पà¥à¤°à¤¥à¤® गणधर थे।à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी ने हमेशा सतà¥à¤¯ और अहिंसा का अनà¥à¤¸à¤°à¤£ किया और अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को à¤à¥€ इसी राह पर चलने का सनà¥à¤¦à¥‡à¤¶ दिया। फालà¥à¤—à¥à¤¨ माह शà¥à¤•à¥à¤² पकà¥à¤· की दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯à¤¾ तिथि को 500 साधà¥à¤“ं के संग इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ समà¥à¤®à¥‡à¤¦ शिखर पर निरà¥à¤µà¤¾à¤£ (मोकà¥à¤·) को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया था।
मंगल कलश :- यह à¤à¤—वान मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ के चरण का चिनà¥à¤¹ है। कलश मंगल का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। कलश हमें जीवन में पूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने की शिकà¥à¤·à¤¾ देता है। बाहर यातà¥à¤°à¤¾ पर जाते समय यदि à¤à¤°à¤¾ हà¥à¤† कलश दिख जाठतो यह शà¥à¤ शकà¥à¤¨ माना जाता है। कलश को धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ से देखने पर पता चलता है कि कलश का पेट बडा तथा मà¥à¤– छोटा होता है। मनà¥à¤·à¥à¤¯ को इसी पà¥à¤°à¤•ार जà¥à¤žà¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के लिà¤, सदगà¥à¤£à¥‹à¤‚ का संगà¥à¤°à¤¹ करने के लिठकलश की तरह हà¥à¤°à¤¦à¤¯ को बडा बनाना होगा। परनà¥à¤¤à¥ अपनी पà¥à¤°à¤¶à¤‚सा करने के मामले में मà¥à¤– को छोटा या बनà¥à¤¦ रखना चाहिà¤à¥¤ कलश में रखा जल लोगों की पà¥à¤¯à¤¾à¤¸ बà¥à¤à¤¾à¤¤à¤¾ है। इससे यह शिकà¥à¤·à¤¾ मिलती है कि हमारे दà¥à¤µà¤¾à¤° पर आने वाला कोई à¤à¥€ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ बिना तà¥à¤°à¤ªà¥à¤¤à¤¿ पाठनहीं लौट जाà¤à¥¤ à¤à¤—वान मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ के चरण में चिनà¥à¤¹à¤¿à¤¤ मंगल कलश हमें पातà¥à¤°à¤¤à¤¾, योगà¥à¤¯à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ देता है, उसके लिठपहले कषà¥à¤Ÿ उठाने पडेंगे, जो कषà¥à¤Ÿ सहन करेगा वही योगà¥à¤¯ सà¥à¤ªà¤¾à¤¤à¥à¤° बनेगा।
जैन धरà¥à¤® में शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤®à¥à¤¬à¤° परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी जैन धरà¥à¤® में à¤à¤•मातà¥à¤° महिला तीरà¥à¤¥à¤‚कर थी, किसी à¤à¥€ धरà¥à¤® में महिला धरà¥à¤®à¤¾à¤šà¤¾à¤°à¥à¤¯ का शायद यह à¤à¤•मातà¥à¤° उदाहरण है। शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤®à¥à¤¬à¤° परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° à¤à¤—वती मलà¥à¤²à¤¿ कà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ जी दीकà¥à¤·à¤¾ पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ शà¥à¤µà¥‡à¤¤ वसà¥à¤¤à¥à¤° को धारण किया।à¤à¤—वान मलà¥à¤²à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ देह से तीरà¥à¤¥à¤‚कर हà¥à¤à¥¤ इसे अचà¥à¤›à¥‡à¤°à¤¾à¤à¥à¤¤ (आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯ -जनक घटना) माना गया है। अननà¥à¤¤ अतीत मे जितने à¤à¥€ तीरà¥à¤¥à¤‚कर हà¥à¤, सà¤à¥€ पà¥à¤°à¥à¤· देह मे ही हà¥à¤à¥¤ इस आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯à¤œà¤¨à¤• घटà¥à¤¨à¤¾ को आकार देने वाला वà¥à¤°à¤¤à¥à¤¤ इस पà¥à¤°à¤•ार है – अपने पà¥à¤°à¥à¤µà¤à¤µ में मलà¥à¤²à¥€ पà¥à¤°à¤à¥ का जीव विदेह कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° की वीतशोका नगरी में महाबल नामक राजा था। महाबल के छà¥à¤¹ बालसखा थे। उनके नाम थे – (१) अचल, (२) धरण, (३) पà¥à¤°à¤£, (४) वसà¥, (५) वैशà¥à¤°à¤¾à¤µà¤£ और (६) अà¤à¤¿à¤šà¤¨à¥à¤¦à¥à¤° सातो मितà¥à¤°à¥‹ ने साथ-साथ रहने का मैतà¥à¤°à¥€ -संकलà¥à¤ª किया। फ़लत : कालानà¥à¤¤à¤° में सातों मितà¥à¤°à¥‹ ने à¤à¤• साथ दीकà¥à¤·à¤¾ अंगीकार की। ‘à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ में à¤à¥€ हम à¤à¤• साथ रहे‘ इस विचार से सातो ने समान तप-जप करने का परसà¥à¤ªà¤° निरà¥à¤£à¤¯ किया। परनà¥à¤¤à¥ महाबल ने सà¥à¤µà¤¯à¤‚ की मितà¥à¤°à¥‹ पर पà¥à¤°à¤§à¤¾à¤¨à¤¤à¤¾ रखने हेतॠगà¥à¤ªà¥à¤¤ तप करना शà¥à¤°à¥ कर दिया। मन में रखी गई इसी माया के फ़लसà¥à¤µà¤°à¥à¤ª महाबल ने सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€à¤—ौतà¥à¤° का अरà¥à¤œà¤¨ किया। इसी कारण महाबल का जीव तà¥à¤°à¥à¤¤à¥€à¤¯ à¤à¥à¤µ मे मलà¥à¤²à¥€ के रूप मे जनà¥à¤®à¤¾à¥¤ मिथिला नरेश महाराज कà¥à¤®à¥à¤ की रानी पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¤à¥€ की रतà¥à¤¨à¤•à¥à¤•à¥à¤·à¥€ से मारà¥à¤—शीरà¥à¤· शà¥à¤•à¥à¤² à¤à¤•ादशी को पà¥à¤°à¤à¥ का कनà¥à¤¯à¤¾ रूप में जनà¥à¤® हà¥à¤†à¥¤ उधर शेष छà¥à¤¹à¥‹à¤‚ मितà¥à¤° à¤à¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤à¤µà¤°à¥à¤· के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ राजकà¥à¤²à¥‹à¤‚ में पà¥à¤¤à¥à¤°à¤°à¥à¤ª में जनà¥à¤®à¥‡à¤‚। वें छà¥à¤¹à¥‹à¤‚ कालकà¥à¤°à¤® से अपने -अपने राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के राजा बनें। अचल का जीव अयोधà¥à¤¯à¤¾ का राजा पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ बना। धरण का जीव चमà¥à¤ªà¤¾ का राजा चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤šà¥à¤›à¤¾à¤¯ हà¥à¤†à¥¤ पà¥à¤°à¤£ का जीव कà¥à¤£à¤¾à¤²à¤¾ नगरी का रूकà¥à¤®à¥€ नामक राजा बना। वसॠका जीव अदीनशतà¥à¤°à¥ नामक हसà¥à¤¤à¤¿à¤¨à¤¾à¤ªà¥à¤° का राजा बना। वैशà¥à¤°à¤µà¤£ का जीव कामà¥à¤ªà¤¿à¤²à¥à¤¯à¤ªà¥à¤° का राजा जतशतà¥à¤°à¥ हà¥à¤† और अà¤à¤¿à¤šà¤¨à¥à¤¦à¥à¤° का जीव काशी नरेश शंख हà¥à¤†à¥¤
दिगमà¥à¤¬à¤° परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ को मोकà¥à¤· नही हो सकता है, परनà¥à¤¤à¥ शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤®à¥à¤¬à¤° परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ इसके à¤à¤•दम विपरीत है, जैन धरà¥à¤® की शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤®à¥à¤¬à¤° परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ में सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ को à¤à¥€ मोकà¥à¤· की अधिकारी माना है।
पà¥à¤°à¤à¥ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी की आयॠ55,000 वरà¥à¤· थी, पà¥à¤°à¤à¥ के देह की ऊंचाई 25 धनà¥à¤· थी। मारà¥à¤—शीरà¥à¤· शà¥à¤•à¥à¤² पकà¥à¤· à¤à¤•ादशी को अशà¥à¤µà¤¨à¥€ नकà¥à¤·à¤¤à¥à¤° में पà¥à¤°à¤à¥ ने दीकà¥à¤·à¤¾ गà¥à¤°à¤¹à¤£ की, पà¥à¤°à¤à¥ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी का साधनाकाल मातà¥à¤° 6 दिन का था। इसके पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ पà¥à¤°à¤à¥ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ जी को पौष कृषà¥à¤£ दूज के दिन निरà¥à¤®à¤² केवलजà¥à¤žà¤¾à¤¨ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¥€ हà¥à¤ˆ और पà¥à¤°à¤à¥ पाà¤à¤š जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के धारक हो गये। इसके पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ पà¥à¤°à¤à¥ ने साधà¥, साधà¥à¤µà¥€ व शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤•, शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤¿à¤•ा नामक चार तीरà¥à¤¥à¥‹ को सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया और चार तीरà¥à¤¥à¥‹ की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ करने के कारण सà¥à¤µà¤¯à¤‚ तीरà¥à¤¥à¤‚कर कहलाये। पà¥à¤°à¤à¥ ने चैतà¥à¤° अमावसà¥à¤¯à¤¾ के दिन समà¥à¤®à¥‡à¤¦ शिखर जी में निरà¥à¤µà¤¾à¤£ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया और पà¥à¤°à¤à¥ अरिहंत से सिदà¥à¤§ कहलाये।
21वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर नमिनाथ :- पà¥à¤°à¤à¥ नमिनाथ जी जैन धरà¥à¤® के 21वें तीरà¥à¤¥à¤‚कर है। पà¥à¤°à¤à¥ नमिनाथ जी का जनà¥à¤® मिथिला के इकà¥à¤·à¥à¤µà¤¾à¤•ॠवंश में शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤£ मास के कृषà¥à¤£ पकà¥à¤· की अषà¥à¤Ÿà¤®à¥€ तिथि को अशà¥à¤µà¤¿à¤¨à¥€ नकà¥à¤·à¤¤à¥à¤° में हà¥à¤† था। इनकी माता का नाम विपà¥à¤°à¤¾ रानी देवी और पिता का नाम राजा विजय था।
पà¥à¤°à¤à¥ नमिनाथ जी का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• चिहà¥à¤¨ नील कमल था। पà¥à¤°à¤à¥ की देह का रंग सà¥à¤¨à¤¹à¤°à¤¾ था। पà¥à¤°à¤à¥ नमिनाथ जी जनà¥à¤® से ही तीन जà¥à¤žà¤¾à¤¨ (शà¥à¤°à¥à¤¤à¤œà¥à¤žà¤¾à¤¨, मतिजà¥à¤žà¤¾à¤¨ , अवधिजà¥à¤žà¤¾à¤¨ ) के धारक थे। आपकी आयॠ10 हजार वरà¥à¤· थी और कद 90 फà¥à¤Ÿ ऊंचा। आपका कà¥à¤®à¤¾à¤° काल ढाई हजार वरà¥à¤· और राजà¥à¤¯ काल 5 हजार वरà¥à¤· का रहा।
पà¥à¤°à¤à¥ ने आषाढ कृषà¥à¤£ दशमी के दिन दीकà¥à¤·à¤¾ गà¥à¤°à¤¹à¤£ की , दीकà¥à¤·à¤¾ के समय पà¥à¤°à¤à¥ को मनः परà¥à¤µ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¥€ हà¥à¤ˆ और पà¥à¤°à¤à¥ चार जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के धारक हो गये ।पà¥à¤°à¤à¥ नमिनाथ जी के साधनाकाल की अवधी 9 माह की थी। 9 माह के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ मारà¥à¤—शीरà¥à¤· शà¥à¤•à¥à¤² à¤à¤•ादशी के दिन पà¥à¤°à¤à¥ को निरà¥à¤®à¤² कैवलय जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¥€ हà¥à¤ˆ , पà¥à¤°à¤à¥ सरà¥à¤µà¤œà¥à¤ž , जिन , केवली ,अरिहंत पà¥à¤°à¤à¥ हो गये।
पà¥à¤°à¤à¥ ने चार घाती करà¥à¤®à¥‹ का नाश कर परम दà¥à¤°à¥à¤²à¤ कैवलय जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¥€ हà¥à¤ˆ थी। पà¥à¤°à¤à¥ पाà¤à¤š जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के धारक हो गये ।इसके पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ पà¥à¤°à¤à¥ नमिनाथ ने चार तीरà¥à¤¥à¥‹ की साधà¥/ साधà¥à¤µà¥€ व शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤•/ शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤¿à¤•ा की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ तीरà¥à¤¥à¤‚कर कहलाये । पà¥à¤°à¤à¥ का संघ विसà¥à¤¤à¥ƒà¤¤ था।
पà¥à¤°à¤à¥ ने समà¥à¤®à¥‡à¤¦ शिखरजी में वैशाख कृषà¥à¤£ चरà¥à¤¤à¥à¤¦à¤°à¥à¤¶à¥€ के दिन निरà¥à¤µà¤¾à¤£ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया। पà¥à¤°à¤à¥ के मोकà¥à¤· के साथ ही पà¥à¤°à¤à¥ ने अषà¥à¤Ÿ करà¥à¤®à¥‹ का कà¥à¤·à¤¯ किया और सिदà¥à¤§ हो गये।
तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸ ने मिथिला को अà¤à¥‚तपूरà¥à¤µ नगरी लिखते हà¥à¤ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ व नमिनाथ के बारे में आदरà¤à¤¾à¤µ पà¥à¤°à¤•ट किया है।
शà¥à¤°à¥€ नमिनाथ चालीसा
सतत पूजà¥à¤¯à¤¨à¥€à¤¯ à¤à¤—वान, नमिनाथ जिन महिà¤à¤¾à¤µà¤¾à¤¨ ।
à¤à¤•à¥à¤¤ करें जो मन में धà¥à¤¯à¤¾à¤¯, पा जाते मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿-वरदान ।
जय शà¥à¤°à¥€ नमिनाथ जिन सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€, वसॠगà¥à¤£ मणà¥à¤¡à¤¿à¤¤ पà¥à¤°à¤à¥ पà¥à¤°à¤£à¤®à¤¾à¤®à¤¿ ।
मिथिला नगरी पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥à¤¤ बिहार, शà¥à¤°à¥€ विजय राजà¥à¤¯ करें हितकर ।
विपà¥à¤°à¤¾ देवी महारानी थीं, रूप गà¥à¤£à¥‹à¤‚ की वे खानि थीं ।
कृषà¥à¤£à¤¾à¤¶à¥à¤µà¤¿à¤¨ दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯à¤¾ सà¥à¤–दाता, षोडश सà¥à¤µà¤ªà¥à¤¨ देखती माता ।
अपराजित विमान को तजकर, जननी उदर वसे पà¥à¤°à¤à¥ आकर ।
कृषà¥à¤£ असाà¥- दशमी सà¥à¤–कार, à¤à¥‚तल पर हà¥à¤† पà¥à¤°à¤à¥- अवतार ।
आयॠसहस दस वरà¥à¤· पà¥à¤°à¤à¥ की, धनॠपनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹ अवगाहना उनकी ।
तरà¥à¤£ हà¥à¤ जब राजकà¥à¤®à¤¾à¤°, हà¥à¤† विवाह तब आननà¥à¤¦à¤•ार ।
à¤à¤• दिन à¤à¥à¤°à¤®à¤£ करें उपवन में, वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠमें हरà¥à¤·à¤¿à¤¤ मन में ।
नमसà¥à¤•ार करके दो देव, कारण कहने लगे सà¥à¤µà¤¯à¤®à¥‡à¤µ ।
जà¥à¤žà¤¾à¤¤ हà¥à¤† है कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° विदेह में, à¤à¤¾à¤µà¥€ तीरà¥à¤¥à¤‚कर तà¥à¤® जग में ।
देवों से सà¥à¤¨ कर ये बात, राजमहल लौटे नमिनाथ ।
सोच हà¥à¤† à¤à¤µ- à¤à¤µ ने à¤à¥à¤°à¤®à¤£ का, चिनà¥à¤¤à¤¨ करते रहे मोचन का ।
परम दिगमà¥à¤¬à¤° वà¥à¤°à¤¤ करूठअरà¥à¤œà¤¨, रतà¥à¤¤à¤¨à¤¤à¥à¤°à¤¯à¤§à¤¨ करूठउपारà¥à¤œà¤¨ ।
सà¥à¤ªà¥à¤°à¤ सà¥à¤¤ को राज सौंपकर, गठचितà¥à¤°à¤µà¤¨ ने शà¥à¤°à¥€à¤œà¤¿à¤¨à¤µà¤° ।
दशमी असाॠमास की कारी, सहस नृपति संग दींकà¥à¤·à¤¾à¤§à¤¾à¤°à¥€ ।
दो दिन का उपवास धारकर, आतम लीन हà¥à¤ शà¥à¤°à¥€ पà¥à¤°à¤à¥à¤µà¤° ।
तीसरे दिन जब किया विहार, à¤à¥‚प वीरपà¥à¤° दें आहार ।
नौ वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ तक तप किया वन में, à¤à¤• दिन मौलि शà¥à¤°à¥€ तरॠतल में ।
अनà¥à¤à¥‚ति हà¥à¤ˆ दिवà¥à¤¯à¤¾à¤à¤¾à¤¸, शà¥à¤•à¥à¤² à¤à¤•ादशी मंगसिर मास ।
नमिनाथ हà¥à¤ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के सागर, जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¥‹à¤¤à¥à¤¸à¤µ करते सà¥à¤° आकर ।
समोशरण था सà¤à¤¾ विà¤à¥‚षित, मानसà¥à¤¤à¤®à¥à¤ थे चार सà¥à¤¶à¥‹à¤à¤¿à¤¤ ।
हà¥à¤† मौनà¤à¤‚ग दिवà¥à¤¯ धवनि से, सब दà¥à¤– दूर हà¥à¤ अवनि से ।
आतà¥à¤® पदारà¥à¤¥ से सतà¥à¤¤à¤¾ सिदà¥à¤§, करता तन ने ‘अहम॒ पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ ।
बाहà¥à¥Ÿà¥‹à¤¨à¥à¤¦à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में करण के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾, अनà¥à¤à¤µ से करà¥à¤¤à¤¾ सà¥à¤µà¥€à¤•ारा ।
पर…परिणति से ही यह जीव, चतà¥à¤°à¥à¤—ति में à¤à¥à¤°à¤®à¥‡ सदीव ।
रहे नरक-सागर परà¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤, सहे à¤à¥‚ख – पà¥à¤¯à¤¾à¤¸ तिरà¥à¤¯à¤¨à¥à¤š ।
हà¥à¤† मनà¥à¤œ तो à¤à¥€ सकà¥à¤²à¥‡à¤¶, देवों में à¤à¥€ ईषà¥à¤¯à¤¾-दà¥à¤µà¥‡à¤· ।
नहीं सà¥à¤–ों का कहीं ठिकाना, सचà¥à¤šà¤¾ सà¥à¤– तो मोकà¥à¤· में माना ।
मोकà¥à¤· गति का दà¥à¤µà¤¾à¤° है à¤à¤•, नरà¤à¤µ से ही पाये नेक ।
सà¥à¤¨ कर मगन हà¥à¤ सब सà¥à¤°à¤—ण, वà¥à¤°à¤¤ धारण करते शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤• जन ।
हà¥à¤† विहार जहाठà¤à¥€ पà¥à¤°à¤à¥ का, हà¥à¤† वहीं कलà¥à¤¯à¤¾à¤£ सà¤à¥€ का ।
करते रहे विहार जिनेश, à¤à¤• मास रही आयॠशेष ।
शिखर समà¥à¤®à¥‡à¤¦ के ऊपर जाकर, पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤®à¤¾ योग धरा हरà¥à¤·à¤¾ कर ।
शà¥à¤•à¥à¤² धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ की अगà¥à¤¨à¤¿ पà¥à¤°à¤œà¤¾à¤°à¥€, हने अघाति करà¥à¤® दà¥à¤–कारी ।
अजर… अमर… शाशà¥à¤µà¤¤ पद पाया, सà¥à¤°- नर सबका मन हरà¥à¤·à¤¾à¤¯à¤¾ ।
शà¥à¤ निरà¥à¤µà¤¾à¤£ महोतà¥à¤¸à¤µ करते, कूट मितà¥à¤°à¤§à¤° पूजन करते ।
पà¥à¤°à¤à¥ हैं नीलकमल से अलंकृत, हम हों उतà¥à¤¤à¤® फ़ल से उपकृत ।
नमिनाथ सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ जगवनà¥à¤¦à¤¨, ‘रमेश’ करता पà¥à¤°à¤à¥- अà¤à¤¿à¤µà¤¨à¥à¤¦à¤¨ ।
जाप: … ॠहà¥à¤°à¥€à¤‚ अरà¥à¤¹ शà¥à¤°à¥€ नमिनाथाय नम:
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R20092022
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