à¤à¤•à¥à¤¤à¤¾à¤®à¤° पाठ- हिनà¥à¤¦à¥€
à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ यà¥à¤•à¥à¤¤ निज शीश à¤à¥à¤•ा, जब देव वनà¥à¤¦à¤¨à¤¾ करते हैं,
उनके मà¥à¤•à¥à¤Ÿ मणी रतà¥à¤¨à¥‹à¤‚ में, दिवà¥à¤¯ तेज जो à¤à¤°à¤¤à¥‡ हैं ।
मिथà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¤® कर दूर जीव को, à¤à¤µà¤¦à¤§à¤¿ में सà¥à¤ªà¤¦ गहले,
à¤à¤¸à¥‡ शà¥à¤°à¥€ जिनराज चरण को, विधि सहित वंदन पहले ।।1।।
ततà¥à¤µ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ से पूरà¥à¤£ सà¥à¤µà¤°à¥à¤—पति, इनà¥à¤¦à¥à¤°à¥‹à¤‚ ने महिमा गाई,
à¤à¤¾à¤µ à¤à¤°à¥‡ सà¥à¤¤à¥‹à¤¤à¥à¤° रचना कर, करी सà¥à¤¤à¥à¤¤à¤¿ मन चाई ।
आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯, मैं तà¥à¤šà¥à¤› बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ हूं, फिर à¤à¥€ साहस ठाऊंगा,
उनà¥à¤¹à¥€ शà¥à¤°à¥€ आदि जिननà¥à¤¦ की, मैं à¤à¥€ महिमा गाऊंगा ।।2।।
देख चनà¥à¤¦à¥à¤° की छाया जल में, बालक का मन जाता है,
जà¥à¤žà¤¾à¤¨ नहीं होने के कारण, उसे पकड़ना चाहता है ।
बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿à¤¹à¥€à¤¨ हूं, निरà¥à¤²à¤œ होकर, तव सà¥à¤¤à¥‹à¤¤à¥à¤° की तैयारी,
करने को उदà¥à¤¯à¤¤ हà¥à¤† मेरा, साहस है अतिशय à¤à¤¾à¤°à¥€ ।।3।।
पà¥à¤°à¤²à¤¯ काल के पà¥à¤°à¤¬à¤² वेग में, सागर जब लहरें देता,
किसकी ताकत à¤à¥à¤œà¤¾ के बल से, पार तैरकर कर लेता ?
उसी à¤à¤¾à¤‚ति है गà¥à¤£ सागर, तेरी गà¥à¤£ महिमा गाने में,
मेरा कà¥à¤¯à¤¾ सामरà¥à¤¥à¥à¤¯ सà¥à¤µà¤¯à¤‚, वृहसà¥à¤ªà¤¤à¤¿ अपूरà¥à¤£ बनाने में ।।4।।
यदà¥à¤¯à¤ªà¤¿ मà¥à¤ में शकà¥à¤¤à¤¿ नहीं है, तेरी महिमा गाने की,
पर à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ के वश में हूं, इचà¥à¤›à¤¾ है सà¥à¤¤à¥‹à¤¤à¥à¤° बढ़ाने की ।
सिंह के मà¥à¤‚ह में देख लाल, शकà¥à¤¤à¤¿ का धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ नहीं लाती है,
पà¥à¤°à¥€à¤¤à¤¿ वश में हो हरिणी, सिंह से लड़ने जाती है ।।5।।
कोयल कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ ना हरदम बोले, बसनà¥à¤¤ ही जब आती है,
आमों की मंजरि ही बस, उसको मीठा बà¥à¤²à¤µà¤¾à¤¤à¥€ है ।
उसी तरह अलà¥à¤ªà¤œà¥à¤ž हूं पर, तव à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ मà¥à¤à¥‡ विवश करती,
शकà¥à¤¤à¤¿ नहीं बस à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ ही इस रचना का कारण रखती ।।6।।
समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ विशà¥à¤µ में घोर तिमिर, छाया रहता है अति à¤à¤¾à¤°à¥€,
पर पल में हो जाय नषà¥à¤Ÿ जब, आती रवि किरणें पà¥à¤¯à¤¾à¤°à¥€ ।
उसी तरह तेरी सà¥à¤¤à¥à¤¤à¤¿, करता हैं जो देह - राधी,
कà¥à¤·à¤£ à¤à¤° में नषà¥à¤Ÿ हो जाते हैं, à¤à¤µ-à¤à¤µ के पातक à¤à¤¾à¤°à¥€ ।।7।।
साधारण जल का बिनà¥à¤¦à¥, कमलिनी के पतà¥à¤¤à¥‹à¤‚ पर होता,
मोती नहीं पर उस पतà¥à¤¤à¥‡ पर, वह मोती सा ही सोहता ।
उसी तरह मà¥à¤ मनà¥à¤¦ मति से, तà¥à¤šà¥à¤› सà¥à¤¤à¥‹à¤¤à¥à¤° बन पावेगा,
पर तेरे पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ से à¤à¤—वन, सजà¥à¤œà¤¨ के मन à¤à¤¾à¤µà¥‡à¤—ा ।।8।।
सूरà¥à¤¯ उदय से पà¥à¤°à¤¥à¤® पà¥à¤°à¤à¤¾ को, देख कमल खिल उठता है,
सूरà¥à¤¯ देख कर कमल खिले, इसमें कà¥à¤¯à¤¾ आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯ लगता है ।
तेरी केवल चरà¥à¤šà¤¾ ही से, पाप नषà¥à¤Ÿ हो जाये सà¤à¥€,
इस सà¥à¤¤à¥‹à¤¤à¥à¤° से होवेंगे ही इसमें नहीं सनà¥à¤¦à¥‡à¤¹ कà¤à¥€ ।।9।।
उदार हृदय सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ का सेवक, समय पड़े पाकर धनवान
अपने सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ के समान ही हो जाता à¤à¤—वन धनवान ।
उसी तरह हे जग à¤à¥‚षण, जो तेरी महिमा गाते हैं
तेरे समान हो उचà¥à¤š पद पा, विशà¥à¤µ वनà¥à¤¦à¥à¤¯ हो जाते हैं ।।10।।
à¤à¤• बार जो कà¥à¤·à¥€à¤° सागर का, मीठा पानी पी लेता,
फिर खारा पानी पीने की, कैसे इचà¥à¤›à¤¾ रख सकता ।
उसी तरह जो तेरे दरà¥à¤¶à¤¨, कर लेता है सà¥à¤– दाई,
अनà¥à¤¯ देवों के दरà¥à¤¶à¤¨ को वो, कà¤à¥€ न मन देगा à¤à¤¾à¤ˆ ।।11।।
जिन पà¥à¤¦à¥à¤—ल परमाणॠसे नव, शरीर बना है गà¥à¤£ धामी,
वे परमाणॠउतने ही थे, सारे विशà¥à¤µ में हे सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ ।
यदि अधिक परमाणॠहोते, अनà¥à¤¯ रूप कोई बनता,
सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ इस धरती पर नहीं, रूपमाल तà¥à¤à¤¸à¤¾ जंचता ।।12।।
निषà¥à¤•लंक और दिवà¥à¤¯ छवि है, तेरे मà¥à¤– सà¥à¤– कनà¥à¤¦à¤¾ की,
उपमा कैसे दे सकता हूं, उसी कलंकी चनà¥à¤¦à¤¾ की ।
दिन में ढ़ाक के पतà¥à¤¤à¥‡ सा वो, पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¹à¥€à¤¨ हो जाता है,
पर तेरा मà¥à¤– तो है उजà¥à¤œà¤µà¤², सदा à¤à¤• सा पाता है ।।13।।
चनà¥à¤¦à¥à¤° किरण सम निरà¥à¤®à¤², à¤à¤—वन गà¥à¤£ समूह तेरा à¤à¤¾à¤°à¥€,
तीन à¤à¥à¤µà¤¨ का करे उलà¥à¤²à¤‚घन, इसमें कà¥à¤¯à¤¾ आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯à¤•ारी ।
तीन जगत के नाथ आपका, जो à¤à¥€ आशà¥à¤°à¤¯ चितà¥à¤¤ धरता,
à¤à¤²à¤¾ उसे सà¥à¤µà¤¤à¤¨à¥à¤¤à¥à¤° जगत में, कौन अड़चना दे सकता ।।14।।
पà¥à¤°à¤²à¤¯ काल की हवा से à¤à¤—वान, सारे परà¥à¤µà¤¤ हिल जाते,
पर सà¥à¤®à¥‡à¤°à¥ परà¥à¤µà¤¤ को किंचित à¤à¥€ नहीं डिगा पाते ।
तेरे समà¥à¤®à¥à¤– देवांगना ने, à¤à¥‹à¤— पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ दिखलाये,
पर वे तेरे विरकà¥à¤¤ à¤à¤¾à¤µ को किंचित à¤à¥€ नहीं डिगा पाये ।।15।।
संसारी दीपक में à¤à¤—वन, तेल धà¥à¤†à¤‚ बतà¥à¤¤à¥€ होती,
जरा हवा के à¤à¥Œà¤•े में ही बà¥à¤ जाती उसकी जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ ।
वो केवल घर का उजियारा, तू तà¥à¤°à¤¿à¤à¥à¤µà¤¨ का दà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤•,
डिगा सके नहीं पà¥à¤°à¤²à¤¯ हवा है सदा अखंडित अविचल जà¥à¤¯à¥‹à¤¤ ।।16।।
सूरà¥à¤¯ असà¥à¤¤ होता संधà¥à¤¯à¤¾ को, तू तो सदा पà¥à¤°à¤•ाशी है,
तीन जगता का तू उजियाला' वो à¤à¤• जमà¥à¤¬à¥ वासी है ।
राहू गà¥à¤°à¤¹à¤£ लगता सूरà¥à¤¯ को, तू निषà¥à¤•लंक सूरà¥à¤¯ का नूर,
उसके तेज को मेघ ढ़के, पर तूने करà¥à¤® किये चकनाचूर ।।17।।
कैसे चनà¥à¤¦à¥à¤° की दू उपमा, वह तो रातà¥à¤°à¤¿ में ही रहता,
साधारण अनà¥à¤§à¤•ार हरे और, राहू गà¥à¤°à¤¸à¥‡ बादल ढ़कता ।
पर तेरा मà¥à¤– सदा उदय, अजà¥à¤žà¤¾à¤¨ मोह तम को हरता,
तीन जगत में सदा पà¥à¤°à¤•ाशी अननà¥à¤¤ कà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥à¤¤à¤¿ का तू धरता।।18।।
पकà¥à¤•ी हà¥à¤ˆ अनà¥à¤¨ राशि पर, गर जो मेघा आकर बरसे,
सिवाय किचà¥à¤šà¤¡à¤¼ फैलाने के अनà¥à¤¯ लाठकà¥à¤¯à¤¾ हो उससे ।
जहां तेरा मà¥à¤– रूपी चनà¥à¤¦à¥à¤°, अजà¥à¤žà¤¾à¤¨ तिमिर को हरता है,
चंदà¥à¤° सूरà¥à¤¯ का शीत ऊषà¥à¤£ वहां वà¥à¤¯à¤°à¥à¤¥ आतपसा लगता है ।।19।।
जो पà¥à¤°à¤•ाश शोà¤à¤¾ पाता है, पà¥à¤°à¤à¥ मणि को पाकर के,
वह कà¥à¤¯à¤¾ शोà¤à¤¾ को पावेगा, कांच टà¥à¤• में जाकर के ।
सà¥à¤µà¤¯à¤‚ पà¥à¤°à¤•ाशी आप सà¤à¥€ को, देते हो जो जà¥à¤žà¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤•ाश,
अनà¥à¤¯ हरिहर में पाने की कर सकता हूं कैसे आश ।।20।।
अचà¥à¤›à¤¾ है हरिहर को देखना, à¤à¤°à¥‡ पड़े रागादि दोष,
वीतरागी जब देख लिया तà¥à¤à¤•ो आ जाता है अतिशय संतोष
पर जब देख लिया तà¥à¤à¤•ो तो अनà¥à¤¯ को जचता नहीं,
मेरे मन का हरण पà¥à¤°à¤à¥‹ फिर कोई कर सकता ही नहीं ।।21।।
यदà¥à¤¯à¤ªà¤¿ अनà¥à¤¯ दिशायें हैं पर, पूरà¥à¤µ दिशा अति पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤•ारी,
वो ही देती जनà¥à¤® सूरà¥à¤¯ को, पà¥à¤°à¤•ाश पाते संसारी ।
इस तरह नाथ जगत में, जननी पद सबने पाया,
पर तेरी माता ने ही जग में, तà¥à¤à¤¸à¤¾ पà¥à¤¤à¥à¤° रतà¥à¤¨ जाया ।।22।।
राग दà¥à¤µà¥‡à¤· से रहित हो निरà¥à¤®à¤², मोह नाश को सूरà¥à¤¯ सà¥à¤µà¤°à¥‚प,
तेरी पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ पर मृतà¥à¤¯à¥ डसे उसे वहीं इस कारण मृतà¥à¤¯à¥à¤‚जय रूप
निरपदà¥à¤°à¤µ मोकà¥à¤· मारà¥à¤— नहीं, अनà¥à¤¯ कोई à¤à¤—वन,
परम पà¥à¤°à¥à¤· अजà¥à¤žà¤¾à¤¨ विनाशक तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ मानते हैं संतजन ।।23।।
हे अवà¥à¤¯à¤¯ अचिनà¥à¤¤à¥à¤¯ विà¤à¥‹, असंखà¥à¤¯à¤• गà¥à¤£à¥‹à¤‚ के धारक हो,
आदि धरà¥à¤® के करà¥à¤¤à¤¾ हो, बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® ईश, विकार संहारक हो ।
अननà¥à¤¤ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के धारी हो, योगेशà¥à¤µà¤° तà¥à¤® में पूरà¥à¤£ विवेक,
असेक में हो à¤à¤• आप, हे नाथ à¤à¤• में सदा अनेक ।।24।।
देवों में समà¥à¤®à¤¾à¤¨à¤¿à¤¤ केवल, जà¥à¤žà¤¾à¤¨ तेरा तà¥à¤® ही बà¥à¤¦à¥à¤§ हो,
तà¥à¤°à¤¿à¤à¥à¤µà¤¨ के कलà¥à¤¯à¤¾à¤£ मारà¥à¤— के, रचना शंकर तà¥à¤® खà¥à¤¦ हो ।
कलà¥à¤¯à¤¾à¤£ मारà¥à¤— की विधी के दाता, बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾ à¤à¥€ तो आप ही हो
पà¥à¤°à¥à¤·à¥‹à¤‚ थे उतà¥à¤¤à¤® होने से पà¥à¤°à¥à¤·à¥‹à¤¤à¥à¤¤à¤® तो साफ ही हो ।।25।।
तà¥à¤°à¤¿à¤à¥à¤µà¤¨ पीड़ा हरण हार हो, तà¥à¤®à¤•ौ मेरा नमसà¥à¤•ार,
जग के उजà¥à¤œà¤µà¤² अलंकार, पà¥à¤°à¤£à¤¾à¤® तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ मेरा हर बार ।
तीन जगत के नाथ आपके, चरणों में जाऊं बलिहार,
à¤à¤µà¤¸à¤¾à¤—र के शोषणकरà¥à¤¤à¥à¤¤à¤¾, तà¥à¤®à¤•ो वनà¥à¤¦à¤¨ बारमà¥à¤¬à¤¾à¤° ।।26।।
जग में जितने गà¥à¤£ थे à¤à¤—वन, सबने तà¥à¤® में किया निवास,
अवगà¥à¤£ रहते सदा घमणà¥à¤¡ में, आते नहीं तà¥à¤®à¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡ पास ।
कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि जग के अनà¥à¤¯ देवों ने, उनको अपना रखा है,
पर दोषों से रहित आपने, गà¥à¤£ ही का रस चकà¥à¤–ा है ।।27।।
नठमें बादल के समीप जब, सूरà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¤¿à¤®à¥à¤¬ छाता है,
शोà¤à¤¾ देता है अति सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤°, सब के मन को à¤à¤¾à¤¤à¤¾ है ।
उसी तरह अशोक वृकà¥à¤· के नीचे, तेरी छवि पà¥à¤¯à¤¾à¤°à¥€,
निरà¥à¤®à¤² अग शोà¤à¤¾ पाता है आसमान सा पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤•ारी ।।28।।
पà¥à¤°à¤•ाशमान मणियों से यà¥à¤•à¥à¤¤ है, रतà¥à¤¨ जड़ित तव सिंहासन,
उस पर कितना पà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¾ लगता, शरीर आपका हे à¤à¤—वन ।
उदयांचल परà¥à¤¬à¤¤ के शिखर पर, जबकि सूरज आता है,
कितना सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤° और मनोहर अति शोà¤à¤¾ को पाता है ।।29।।
समवसरण में उचà¥à¤š सिंहासन पर जब तà¥à¤® बैठे होते,
शà¥à¤µà¥‡à¤¤ कà¥à¤¨à¥à¤œ के पà¥à¤·à¥à¤ª जैसे दो, आस-पास चामर ढà¥à¤²à¤¤à¥‡ ।
सà¥à¤®à¥‡à¤°à¥ गिरि के दोनों तटों पर, मानो दो à¤à¤°à¤¨à¥‡ à¤à¤°à¤¤à¥‡,
चनà¥à¤¦à¤¾ सम निरà¥à¤®à¤² जल बहता वो à¤à¤¸à¥‡ चामर सम लगते ।।30।।
तेरे शीश पर तीन छतà¥à¤°, शोà¤à¤¾ पाते हैं पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤•ारी,
चनà¥à¤¦à¤¾ जैसे कानà¥à¤¤à¤¿ जिनकी, तेज सूरà¥à¤¯ से à¤à¥€ à¤à¤¾à¤°à¥€ ।
मणियों की पड़ रही जाल, वो à¤à¤¸à¤¾ तेज दिखाते हैं,
ऊरà¥à¤§à¥à¤µ मृतà¥à¤¯à¥ पाताल लोक पति, मानो तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ बताते हैं ।।31।।
हे नाथ आपके समवसरण में, देव दà¥à¤‚दà¥à¤à¥€ बजाती है,
उचà¥à¤š सà¥à¤µà¤° गमà¥à¤à¥€à¤° गà¥à¤¨à¥à¤œà¤¾à¤°à¤µ, ये वो à¤à¤¸à¥€ लगती है ।
तीन लोक को करा रही हो मानो तेरा समागमन धà¥à¤¯à¤¾à¤¨,
करती हो तब विजय घोषणा गाती हो तेरा यश गान ।।32।।
गनà¥à¤§à¥‹à¤¦à¤• पानी से à¤à¥€à¤—े, मनà¥à¤¦ पवन सौरठसरसा,
ऊरà¥à¤§à¥à¤µ मà¥à¤–ी पंचवरà¥à¤£à¥€, पारिजातिक पà¥à¤·à¥à¤ªà¥‹à¤‚ की वरà¥à¤·à¤¾ ।
समवसरण में जब होती है, मानो यों कहती सारे,
पà¥à¤·à¥à¤ª रूप कर फारन बरस रहे सà¥à¤µà¤¯à¤‚ बचन पà¥à¤°à¤à¥ के पà¥à¤¯à¤¾à¤°à¥‡à¥¤à¥¤33।।
जहां विराजो आप दयानिधि, वहीं आपके मà¥à¤– के पास,
पà¥à¤°à¤à¤¾ अति तेजसà¥à¤¬à¥€ छाती, à¤à¥‚मणà¥à¤¡à¤² का दिवà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤•ाश ।
यदà¥à¤¯à¤ªà¤¿ सूरà¥à¤¯ à¤à¥€ तेजसà¥à¤µà¥€ है, पर आपात न कर पाता,
शशि जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ जà¥à¤¯à¥‹à¤‚ सौमà¥à¤¯ आपकी बीतरागता दरसाता ।।34।।
समावसरण में आप पà¥à¤°à¤à¥, जब वचनामृत बरसाते हैं,
धरà¥à¤® ततà¥à¤µ को पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ कर, मोकà¥à¤· मारà¥à¤— बरसाते हैं ।
विशà¥à¤¦à¥à¤§ अरà¥à¤¥ और सरल, सरà¥à¤µ ही à¤à¤¾à¤µà¤¾à¤¨à¥à¤—ामिनी है ।
पैंतीस अतिशययà¥à¤•à¥à¤¤ वह à¤à¤¾à¤·à¤¾ सब ही के मनà¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¨à¥€ है।।35।।
खिला हà¥à¤† सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ वरà¥à¤£à¥€, कमल समूह लगता पà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¾,
नख पंकà¥à¤¤à¤¿ यà¥à¤•à¥à¤¤ चरण कमल, तब है उसकी जीतनहारा ।
à¤à¤¸à¥‡ उतà¥à¤¤à¤® चरण कमल हे नाथ, आप जहां रखते हैं,
वहां देवगण पदà¥à¤® कमल की आकर रचना करते हैं ।।36।।
अषà¥à¤Ÿ महा पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤°à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¿ की, इन विà¤à¥‚तियों के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€,
अनà¥à¤¯ हरिहरादà¥à¤°à¤¿ देवों की, नहीं मिले रहती खामी ।
जिस पà¥à¤°à¤•ार अनà¥à¤§à¤•ार हरण की, होती दिवà¥à¤¯ सूरà¥à¤¯ जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ ।
वैसी गà¥à¤°à¤¹ नकà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤¦à¤¿ में पà¥à¤°à¤à¤¾ की कà¤à¥€ नहीं हो सकती ।।37।।
मद से à¤à¤°à¤¤à¤¾ कोष जिसका, मलिन और चंचल होता,
उनà¥à¤®à¤¤ à¤à¤‚वरों की गà¥à¤‚जार से, छाया कà¥à¤°à¥‹à¤§ मान खोता ।
à¤à¤¸à¤¾ रोष à¤à¤°à¤¾ हाथी à¤à¥€, गर जो सामने आवेगा,
मेरा आशà¥à¤°à¤¯ लेने वाला, à¤à¤•à¥à¤¤ नहीं घबरायेगा ।।38।।
मनà¥à¤¦à¥‹à¤®à¤¤ कà¥à¤œà¤° का मसà¥à¤¤à¤• के, जो विदारण करता,
रकà¥à¤¤ मिशà¥à¤°à¤¿à¤¤ मोतियों से, पृथà¥à¤µà¥€ को चमका देता ।
तेरे यà¥à¤—ल चरण परà¥à¤µà¤¤ का, जो à¤à¥€ आशà¥à¤°à¤¯ मन धरता,
कà¥à¤¯à¤¾ ताकत वो पराकà¥à¤°à¤®à¥€ सिंह उसका सामना कर सकता ।।39।।
पà¥à¤°à¤šà¤£à¥à¤¡ पवन तिनके उछले और à¤à¤¯à¤ªà¥à¤°à¤¦ जà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¾ à¤à¤à¤• रही
मानो जग को हड़प जायेगी, à¤à¤¸à¥€ अगà¥à¤¨à¤¿ धधक रही ।
जैसे चनà¥à¤¦à¤¨ का हर à¤à¤• बिनà¥à¤¦à¥, मेटे मनो तेल का कानà¥à¤¤,
तेरा पवितà¥à¤° नाम लेने से होती वह अगà¥à¤¨à¤¿ à¤à¥€ शानà¥à¤¤ ।।40।।
लाल नेतà¥à¤°à¥‹à¤‚ में कà¥à¤°à¥‹à¤§ à¤à¤°à¤¾, और ऊंचा फन फà¥à¤‚कार करे,
मदोनà¥à¤®à¤¤ अति काला सरà¥à¤ª, आ पैरों के नीचे विचरे ।
तेरे नाम की नाग दमनी, जड़ी वह जिसके हृदय है,
सरà¥à¤ª न बाधा पहà¥à¤‚चा सकता चाहे कितना ही निरà¥à¤¦à¤¯ है ।।41।।
घोड़े करे हà¥à¤‚कार गरà¥à¤œà¤¨à¤¾, हाथी à¤à¥€ करते à¤à¤¾à¤°à¥€,
रण में हो बलवान à¤à¥‚पति, ले अपनी सेना à¤à¤¾à¤°à¥€ ।
किनà¥à¤¤à¥ सूरà¥à¤¯ के उदय होते ही, अनà¥à¤§à¤•ार नषà¥à¤Ÿ हो जाता,
इसी तरह तव à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ के बल, रण में जीत पाता ।।42।।
बरस रहे हो बरछी à¤à¤¾à¤²à¥‡, तलवारों की लगकर मार,
बहे बेग में हाथियों के, रकà¥à¤¤ रूपी जहां जल की धार ।
यदà¥à¤¯à¤ªà¤¿ पार करने का इचà¥à¤›à¥à¤•, पर योदà¥à¤§à¤¾ बल हà¥à¤† समापà¥à¤¤
तेरा à¤à¤•à¥à¤¤ तो कर ही लेता, शतà¥à¤°à¥ पकà¥à¤· से जय को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ ।।43 ।।
à¤à¤¯à¤‚कर है मगरमचà¥à¤›, बड़वागà¥à¤¨à¤¿ à¤à¥€ जलती नà¥à¤¯à¤¾à¤°à¥€,
समà¥à¤¦à¥à¤° तरंगों में जहाज, डोलायमान हो रहा à¤à¤¾à¤°à¥€ ।
à¤à¤¸à¤¾ जहाज à¤à¥€ कà¥à¤¶à¤² पूरà¥à¤µà¤•, सागर तट को पा लेता,
तव सà¥à¤®à¤¿à¤°à¤£ à¤à¤•à¥à¤¤à¥‹à¤‚ की यातà¥à¤°à¤¾ सà¥à¤– से पार करा देता ।।44।।
जलोदर आदि रोगों से à¤à¥à¤•, जो कà¥à¤¬à¤¡à¤¼à¤¾ हो जाता,
जीवन आशा छोड़ चà¥à¤•ा जो, दशा शोचनीय को पाता ।
वे नर तेरे चरण कमल की, रज हृदय से अपनाते,
रोग शोक हो दूर शीघà¥à¤° ही, कामदेव से बन जाते ।।45।।
पांव से ले गले तक जो, अंग सांकलों से जकड़ा,
बेड़ियां की बड़ी-बड़ी नोकों ने जंगा को जकड़ा ।
वे नर à¤à¥€ जब तेरे नाम का, धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ हृदय में लाते हैं,
बनà¥à¤§à¤¨ जाते टूट सà¥à¤µà¤¯à¤‚ ही, शीघà¥à¤° मà¥à¤•à¥à¤¤ हो जाते हैं ।।46।।
हसà¥à¤¤à¤¿ सिंह अरॠअगà¥à¤¨à¤¿ सरà¥à¤ª हो, यà¥à¤•à¥à¤¤ शतà¥à¤°à¥ सागर या रोग,
बनà¥à¤§à¤¨ हो या अनà¥à¤¯ कोई à¤à¥€, जीवन में विपदा संयोग ।
हे नाथ आपके इस सà¥à¤¤à¥‹à¤¤à¥à¤° को, à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ यà¥à¤•à¥à¤¤ जो à¤à¥€ गाते,
उनके यह सारे à¤à¤¯ कà¥à¤·à¤£ में सà¥à¤µà¤¯à¤‚ ही डरकर à¤à¤— जाते ।।47।।
पà¥à¤·à¥à¤ª हार जà¥à¤¯à¥‹à¤‚ शोà¤à¤¾ देता, वैसे ही यह गà¥à¤£ का माल,
बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿à¤®à¤¾à¤¨ कर धारण इसको, हो जावेगा परम निहाल ।
कर कणà¥à¤ सà¥à¤¥ गाता जो रचना, मानतà¥à¤‚ग के मन à¤à¤¾à¤¤à¥€,
लकà¥à¤·à¥à¤®à¥€ को लेता 'जीत' वह सà¥à¤µà¤¯à¤‚ विवश होकर आती ।।48।।
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