बदलते युग का बदलता साधु
साध्वी वैभवश्रीजी
E-Mail : vaibhavshreepawni@gmail.com
आज जिस किसी धर्म संघ या धार्मिक संस्थाओं में चले जाओ सर्वत्र यही एक प्रष्न बार-बार सुनने को मिलता है कि आज साधु की चर्या कैसी होनी चाहिए जबकि हम इलेक्ट्रोमीडिया के व्यापक प्रयोगो के साथ जी रहे हैं। हमारी वर्तमान पीढ़ी जन्म के कुछ वर्षों के साथ ही मोबाईल फोन, कम्प्यूटर, टेबलेट, इन्टरनेट के साथ-साथ विकसित हो रही है। ऐसे में साधु वर्ग, उनमें भी वह वर्ग जो धर्मषात्रों के प्रचार-प्रसार के लिए निरन्तर प्रयत्नषील है, क्या वह इन उपकरणों का प्रयोग करें? अथवा ना करें?
|
|
अपका जवाब विविधता लिए होगा। कोई कहेगा करें, कोई कहेगा ना करें। दोनों प्रकार के उत्तरों के लिए प्रर्याप्त तर्क दिए जा सकते हैं। हमारे लिए चिंतन के ऐसे अनेक मुधे हैं जो इस बदलते युग की साधु की जीवन शैली के लिए विचारणीय है। एक युग था जब साधु गुरूआज्ञा में लीन, ध्यान मौन में मस्त, एकांत अरण्यवास किया करता था। आज भी यदि वैसा साधुत्व किसी को अभीष्ट है तो कोई वाधा नहीं है, उसे युग की परवाह नहीं है। किन्तु जिस साधु या साधक वर्ग को धर्म की समझ को जनता में प्रसारित करना है, उसे तो जनता के स्तर को समझने के लिए, उसकी समस्याओं के समाधान के लिए ऐसी वृहन दृष्टि की आवष्यकता रहेगी ही जो युग की नब्ज को पढ़ सके। इसके लिए जरूरी है साधु वर्ग का स्वयं का उत्थान। अन्यथा आज साधु या गुरू जिस ग्रुप को लीड कर रहा है वह वर्ग तो पढ़ा-लिखा सुषिभित, आधुनिक उपकरणों से लैस है किन्तु वह साधु अषिक्षित या अल्पषिक्षित। तो भला वर्तमान पीढ़ी उस साधु में अपने गुरू के दर्षन कैसे कर पाएगी।
हमारे अनुसार तो गुरू वह है, जो षिष्य को, साधक को व उसके अपने स्तर की समस्याओं को देखने व समझने में तथा उसका समाधान देने में सक्षम हो। ऐसे में प्रत्येक साधु का अपना युगानुरूप बाहय विकास भी आवष्यक है ताकि वह अपने भीतर की आध्यत्मिक समझ को वैज्ञानिक भाषा में व्यक्त कर सकें। वह जनमानस को उसके प्रष्नों को प्रेक्टीकल समाधान दे सकें। आज मात्र अंधविष्वास का युग नही है। आज ऐसा संभव नहीं है कि साधुनेषधारी ने जो कुछ भी कह दिया लोग उसे अंधभक्ति से स्वीकार कर लें। लोगों के भीतर बुद्वि व तर्क का विकास प्राचीन युग में कई गुना अधिक है, षिक्षा के कारण ऐसे में आज के साधु वर्ग को यदि कोई धार्मिक षिक्षा जनता में देनी है तो वह भी प्रष्नों के तर्क पूर्ष समाधान के साथ हो।
कई साधुजन आज इस बात के प्रति सजग हुए हैं, वे धर्म प्रचार के लिए विकसित तकनीकों का उपयोग करने लगे हैं। अपनी सुविधा के लिए ये साधन न हो किंतु धर्म प्रभावना के लिए संतुलित उपयोग हो तो कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु जब ये साधन एक अपरिपक्व साधक के हाथों में आ जाऐंगे तो बंदर के हाथ में उस्तरे की तरह उसके विनाष का कारण बन जाऐंगे। अतः यह विवेक भी रखना जरूरी है कि किस साधक का मानसिक स्तर कैसा है व उसके भीतर की समझ शुद्ध है, परिपक्व है वह लौकिक आकर्षणों से चंचल होने वाला तो नहीं है। यदि वह योग्य है, तो धर्मसंघ उसकी प्रतिभा का संपुर्ण समाज में योगदान हो सके इस हेतु स्वंम उसे योग्य वातावरण व अवसर सुलभ कराए। ताकि व्यक्तिगत प्रतिभा के सृजनात्मक प्रयोग से पूरा समाज लाभन्वित हो सके। जैन साधु-साध्वी वर्ग को भी मानवता की सेवा के लिए अपनी-अपनी योग्यता नुसार सृजनात्मक माहोल मिले ताकि उनकी प्रतिमाऐं कुष्ठित न हो। तो हम सब मिलकर कुछ नए प्रतिमान स्थापित करें। आओ, कुंठित मानसिकता को त्यागों व विवके पूर्वक समय के साथ जीना सीखो जो समय को जीता है वह आत्मवान है इस छोटे से जीवन को संकीर्णताओं से घिर कर बर्बाद मत होने दो। किसी रचनात्मक कार्य में स्वयं को समर्पित करके आत्मषक्तियों को जगाओ व आनंद पाओ।
‘‘ गुरूवर्या श्री वैभव श्री जी ‘‘
परम पूज्या, आगमवेत्ता, चरम मंगल प्रभाविका गुरूवयी, श्री वैभव जी म. सा. ‘आत्मा‘, न केवल सरल स्वभाव त्रतु तपस्विनी है, बल्कि जैनागमों के अलावा, अन्य सभी धर्मो की भी गहन प्रज्ञावान है।
आपका जन्म, सूर्य नगरी जोधपुर, राजस्थान में, सभी सुखों से संपन्न रांका, ओसवाल परिवार में, दिनांक 12-10-79 हुआ था। आप, बाल्यकाल से ही मेधावी और विनयषील रही हैं। आपको धार्मिक संस्कार आपकी पूज्या माताजी से प्राप्त हुए, जो वर्तमान में, आप ही के संघ में दीक्षित, साध्वी नियाग श्री जी के नाम से विख्यात है।
आप पर, बाल्यकाल से ही, निरंतर गुरू भगवंतो की विषिष्ट कृपा रही है। आत्मज्ञान की शोध में आप 24-4-1999 में दिक्षित हुई। आपके दीक्षा गुरू, जयमल गच्छ के आर्चाय, श्री शुभचंद्र जी म. सा. रहे। किन्तु आत्मज्ञान की सम्यक राह, आपश्री को, पूज्य श्री विराट गुरूजी से प्राप्त हुई। वर्तमान में आप श्रमण संघ के आचार्य ड0 श्री षिव मुनी जी म. सा. एवं श्रमण संघीय सलाहाकार श्री सुमतप्रकाष जी म. सा. की व्यवस्था में साधना रत है।
आपके प्रवचन बडे क्रांतिकारी होते हैं। आपके व्याख्यानों की विषेषता यह है कि, शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को, आप सहज विधियों के साथ अभिव्यक्त करती है। आप जहां भी जाते हैं, सबको जीने की सम्यक शैली सिखाते हैं। ‘जैसी कथनी वैसी करनी‘ आप श्री की चारित्रिक विषेषता है।
विराट गुरूजी से षिक्षा प्राप्त कर, आप नित नूतन साहित्य सृजन कर रही हैं। आप श्री ने अब तक, लगभग 25 पुस्तकों का लेखन व संपादन किया है। जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार है- आचारांग सूत्र पर नवीन व्याख्या से लिखा ग्रंथ ‘क्या कहता है.......... आचारांग‘, सामायिक का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक विष्लेषण प्रस्तुत करता ग्रंथ ‘समय वज्जिका‘, मानसिक विज्ञान को प्रस्तुत करती पुस्तक ‘मन, मान, मानव‘, ‘खुषियॉं खरीदो‘, इत्यादि। आपका साहित्य जनमानस को सूत्रों की तर्कसंगत समझ देता है।
उल्लेखनीय बात यह है कि, आपके पूर्व सांसारिक परिवार में, आपके एक मामा, मौसी, बुआ, बहनों ने, एवं स्वयं आपकी माताजी ने भी दीक्षा ग्रहण की है। आप संप्रदायवाद से दूर, संपूर्ण जैन समाज की एकता में विष्वास रखती हैं। आप धर्म-दर्षन को प्रेक्टीकल एवं मनोवैज्ञानिक विधियों के साथ प्रस्तुत करने की अदभुत कला रखती हैं। आपसे प्ररेणा प्राप्त कर, स्थानकवासी समाज में, पहली क्षुल्लक दीक्षा प्रारंभ हुई। यह दीक्षा क्षुल्लिका प्रतिभा पावनी जी ने ली।
आप वर्तमान में, श्रमण संघ की उज्ज्वल ज्योति के रूप में पहचानी जाती हैं। आपका मिषन धर्म व विज्ञान का सामन्जस्य करते हुए, नई पीढ़ी को धर्म धारा से जोड़ने का है। वर्तमान में, आपके संग मे साध्वी श्री देषना श्री जी, साध्वी श्री चरम श्री जी, मौनी माता द्ध एवं साध्वी श्री नियाग श्री जी, क्षुल्लिका प्रतिभा पावनी जी, अपनी सेंवाऐं समाज के लिए प्रदान कर रही हैं।
--------------------------------------------------------------
The 2013 Chaturmas of Sadhvi Vaibhavshriji will be at Muzaffar Nagar, Uttar Pradesh
She can be Contacted on Telephone Number : 78-3489-7900 & 88-7739-7453
--------------------------------------------------------------
Mail to : Ahimsa Foundation
www.jainsamaj.org
R190613
Related
Related