युग धारा के समीचीन हो साधु की साधना
साध्वी वैभवश्रीजी ‘आत्मा‘
E-Mail : vaibhavshreepawni@gmail.com

परिवर्तनषील युग की धारा में सभी कुछ बदल रहा है। आज हम सभी लोगों की मानसिकता, बाहय वातावरण, उपलब्ध संसाधन यहॉं तक कि जीवन के प्रत्येक पहलु में बदलाव है। ऐसे में जो साधु वर्ग हैं, उसकी साधना पद्धतियॉं, उपदेष शैली व प्रचार माध्यमों में भी बहुत परिवर्तन आया है।

प्राचीन काल में साधु प्रायः- अरण्यवासी था, अथवा ग्रामीण ईलाकों में रहता था। वह प्रकृति के समीप जीता था अतः उसके लिए प्राकृतिक जीवन जीना बहुत आसान था। वह लोगों की बस्ती के बहुत निकट कभी भी नहीं रहता था, इस कारण से भी वह अनेक तरह की सोच व व्यहार से अप्रभावित था। किन्तु आज अन्य नागरिकों की तरह अधिकांष साधु वर्ग भी शहरों व महानगरों के मध्य विचरण कर रहा है। अब उसका संबंध प्रकृति से कम व उसके प्रदूषणों से ज्यादा हो रहा है। ऐसे में वह यह अपेक्षा रखे कि, वह जंगल में रहने वाली साधनाऐं शहरों में लोगों की कालोनियों के मध्य या अपार्टमेन्टस, फलैट्स में रहकर करना चाहता है, तो क्या ये संभव है ना अरण्यवासी साधु का निंतार अरण्य में होता था यह एक सहज स्वाभाविक प्रणाली थी। आज यदि साधु सोचे कि मैं निहार के लिए कृत्रिक शौचालयों का प्रयोग नहीं करूगा तो शहरी माहौल प्रदुषित होने लग जाएगा। उसे शहर में शहर के योग्य आचार संहिता का पालन करना होगा। इसी प्रकार पहले साधु लोग उपदेष दिया करते तो, कुछ लोग पेड़ के नीचे बैठकर भी सहज रूप से सुन लेते व उसमें डूब जाते थे। उपदेष की भावधारा के साथ जुड़कर तल्लीन हो जाते थे। स्वयं में संगीतमय हो जाते थे, किन्तु अब तो बड़े-बड़े हॉल में प्रवचन सभाऐं होती हैं। हॉंल के चारों ओर आवागमन के कारण शोरगुल रहता है। ध्वनि प्रदूषण के निरंतर प्रहारों से लोगों के सुनने की क्षमता में बहुत कमी आ चुकी है, यदि सैकड़ों की संख्या में श्रोतागण उपस्थित हैं, तो ध्वनिवर्द्धक यन्त्र का उपयोग साधु के लिए आवष्यक सा हो गया है अन्यथा उसकी आवाज श्रोता के भीतर तक जाने में व उसकी भावधारा को जगाने में सक्षम नहीं हो सकेगी। इस बदलते युग में जीने वाले साधु को बदलनी होगी- अपनी साधना शैली, उपदेष शैली, आहार, विहार व निहार चर्या।

आज का साधु वर्ग कन्फयूज सा लगता है। उसे अपनी साधना के पुराने खेल से लगाव बरकरार है व नवीनता के प्रति आकर्षण भी। नवीन शैली को समझपूर्वक स्वीकारने वाले लोग हैं भी तो उन्हें अपमानित दृष्टि से देखने वाले लोगों की भी कमी नहीं। किन्तु जब कोई परिवर्तन विवेक पूर्वक संघस्थ बहुत से साधकों की सहमति से स्वीकृत हो जाए तब तो उसे सभी पर लागू किया जा सकता है अन्यथा कुछ साधु पुरातन परंपरा के प्रति आग्रहशील बने रहेंगे तो कुछ युगानुरूप परिवर्तन के साथ जीने के इच्छुक ध् खैर, मेरा विषय साधु वर्ग में इस भावना को विकसित करना है कि, वह अपनी योग्यताओं को निरन्तर जगाऐ व जागृत प्रतिभा का सृजनात्मक प्रयोग कर मानवता की सेवा में काम आए।

साधु वर्ग स्वयं षिक्षित बने, आधुनिक षिक्षा व प्राचीन मूल्यों की षिक्षा इन दोनों प्रकार की षिक्षा से स्वयं को परिष्कृत करता जाए और फिर उचित अवसरों का उपयोग करते हुए जन मानस को धर्म का ज्ञान वैज्ञानिक तरीकों से कराए। धर्म की समझ भी बदलते युग में बदली हुई भाषा, बदलते दृष्टान्तों के साथ जीवन की समस्याओं के समाधान के तौर पर दी जानी चाहिए, ताकि जनमानस के लिए धर्म की उपयोगिता भी बरकरार रहे। अन्यथा हम देखते है कि आज की पीढ़ी यह सवाल करती नजर आती है कि हमें धर्म की आवष्यकता ही कहॉं है? उसमें भी socalled धर्म की जो कि मंदिर-स्थानक, गिरजाघरों में आपसी कलह-कलेष का कारण बना हुआ है। इससे तो अच्छा है कि हम धर्म निरपेक्ष ही रहे। न तो धर्म स्थानों में जाना न ही विसंगतियों के प्रभाव में आना किन्तु ऐसी सोच सम्यक् नही है। हमें धर्म स्थानों में जाने की आवष्यकता व धर्म की आवष्यकता सदैव है। धर्म हमें अपनी क्षमताओं की पहचान कराता है। अपने वास्तविक स्वरूप को समझने में मदद करता है। धर्म व अध्यात्म हर युग में उसे उजागर करने के विविध सूत्र प्रदान करता है। धर्म व अध्यात्म हर युग में जीवन के अभिन्न अंग है, क्योंकि इंसान मात्र मिट्टी का पुतला ही नहीं है उसमें एक जागृत चैतन्य निवास करता है जिसकी उपेक्षा त्रिकाल में संभव नहीं है। अगर मनुष्य मात्र हवा-पानी-मिट्टी का संयोग ही होता तब तो उसे भौतिक उपलब्धियों से परम शान्ति की अनुभूति हो सकती थी किन्तु ऐसा है नहीं। इसलिए धर्म व अध्यात्म को अपनी अभिव्यक्ति के तरीके युगानुरूप बदलने आवष्यक हैं। प्रभु ऋषभ ने जो धर्म की अभिव्यक्ति दी थी, समण महावीर की वही नहीं थी। समण महावीर ने अपने देष, काल, पात्र व भाव के अनुसार शाष्वत मूल्यों को अभिव्यक्ति दी। स्वयं प्रभु महावीर का यह वचन है कि

‘ काले कालं समायरे ‘

अर्थात जब जैसा काल हो वैसा समाचण करे। कालानुसार आचार संहिता में बदलाव हर धर्म-संस्कृति को जीवित रखने के लिए आवष्यक है। कहने का सार यही है कि आज के साधु वर्ग के लिए ऐसी आचार संहिता आचार्य द्वारा प्रसारित हो, जो साधु के अनेकान्त विकास में सहायक हो।

साधु स्वयं को इस योग्य बनाए कि वह निरंतर विकसित होता जाए व उसकी सृजनात्मकता तभी कुठिंत न हो। इसके लिए कई तरह के प्रयोग किए जा सकते हैं, मसलन, हर धर्म स्थानक, उपासरा, मंदिर के साथ एक विद्यालय का निर्माण हो। उस विद्यालय में आधुनिक षिक्षा के साथ-साथ धार्मिक व नैतिक षिक्षा के पाठयक्रम हो। जिन्हें पढ़ाने के लिए साधु-साध्वी स्वयं सेवाऐं देते हो। साधु-साध्वी स्वयं इतने षिक्षित-प्रषिक्षित हो कि वे आधुनिक पीढ़ी के प्रष्नों का नवीन संदर्भों के साथ समाधान कर सके। इसके लिए हर धर्म संघ की यह जिम्मेदारी हो, कि वह अपने पुत्रों के समान साधु वर्ग के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था जुटाऐं।

जो कम उम्र में ही दीक्षित हो चुका हैं। उसका हर दृष्टिकोण से विकास अभी बाकी है। उसके लिए हर धर्म सघों में योग्य प्रषिक्षकों की व्यवस्था रहे। एक केन्द्रीय संघ व्यवस्था सभी संघों पर लागू की जाए व सभी में आध्यात्मिक मूल्यों की वैज्ञानिक समझ विकसित की जाए।

यदि हर साधु-साध्वी अपने व संघ के विकास के लिए अधिकतम दे पाए तो क्या कारण है कि मानीय बीमारियॉं व कमजोरियॉं शीघ्र ही दूर ना हो जाए। अन्यथा क्षमताओं के सृजनात्मक प्रवाह के समुचित मार्ग न खोले गए तो नकारात्मक प्रवाह तो बिना व्यवस्था बनाए भी स्वतः होगा ही। अतः शीघ्र ही हम संभले और समाज में व्याप्त विकारों को मिलने वाली उर्जा को सृजनात्मक मोड़ दे। सबका कल्याण हो।


‘‘ गुरूवर्या श्री वैभव श्री जी ‘‘

परम पूज्या, आगमवेत्ता, चरम मंगल प्रभाविका गुरूवयी, श्री वैभव जी म. सा. ‘आत्मा‘, न केवल सरल स्वभाव त्रतु तपस्विनी है, बल्कि जैनागमों के अलावा, अन्य सभी धर्मो की भी गहन प्रज्ञावान है।

आपका जन्म, सूर्य नगरी जोधपुर, राजस्थान में, सभी सुखों से संपन्न रांका, ओसवाल परिवार में, दिनांक 12-10-79 हुआ था। आप, बाल्यकाल से ही मेधावी और विनयषील रही हैं। आपको धार्मिक संस्कार आपकी पूज्या माताजी से प्राप्त हुए, जो वर्तमान में, आप ही के संघ में दीक्षित, साध्वी नियाग श्री जी के नाम से विख्यात है।

आप पर, बाल्यकाल से ही, निरंतर गुरू भगवंतो की विषिष्ट कृपा रही है। आत्मज्ञान की शोध में आप 24-4-1999 में दिक्षित हुई। आपके दीक्षा गुरू, जयमल गच्छ के आर्चाय, श्री शुभचंद्र जी म. सा. रहे। किन्तु आत्मज्ञान की सम्यक राह, आपश्री को, पूज्य श्री विराट गुरूजी से प्राप्त हुई। वर्तमान में आप श्रमण संघ के आचार्य ड0 श्री षिव मुनी जी म. सा. एवं श्रमण संघीय सलाहाकार श्री सुमतप्रकाष जी म. सा. की व्यवस्था में साधना रत है।

आपके प्रवचन बडे क्रांतिकारी होते हैं। आपके व्याख्यानों की विषेषता यह है कि, शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को, आप सहज विधियों के साथ अभिव्यक्त करती है। आप जहां भी जाते हैं, सबको जीने की सम्यक शैली सिखाते हैं। ‘जैसी कथनी वैसी करनी‘ आप श्री की चारित्रिक विषेषता है।

विराट गुरूजी से षिक्षा प्राप्त कर, आप नित नूतन साहित्य सृजन कर रही हैं। आप श्री ने अब तक, लगभग 25 पुस्तकों का लेखन व संपादन किया है। जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार है- आचारांग सूत्र पर नवीन व्याख्या से लिखा ग्रंथ ‘क्या कहता है.......... आचारांग‘, सामायिक का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक विष्लेषण प्रस्तुत करता ग्रंथ ‘समय वज्जिका‘, मानसिक विज्ञान को प्रस्तुत करती पुस्तक ‘मन, मान, मानव‘, ‘खुषियॉं खरीदो‘, इत्यादि। आपका साहित्य जनमानस को सूत्रों की तर्कसंगत समझ देता है।

उल्लेखनीय बात यह है कि, आपके पूर्व सांसारिक परिवार में, आपके एक मामा, मौसी, बुआ, बहनों ने, एवं स्वयं आपकी माताजी ने भी दीक्षा ग्रहण की है। आप संप्रदायवाद से दूर, संपूर्ण जैन समाज की एकता में विष्वास रखती हैं। आप धर्म-दर्षन को प्रेक्टीकल एवं मनोवैज्ञानिक विधियों के साथ प्रस्तुत करने की अदभुत कला रखती हैं। आपसे प्ररेणा प्राप्त कर, स्थानकवासी समाज में, पहली क्षुल्लक दीक्षा प्रारंभ हुई। यह दीक्षा क्षुल्लिका प्रतिभा पावनी जी ने ली।

आप वर्तमान में, श्रमण संघ की उज्ज्वल ज्योति के रूप में पहचानी जाती हैं। आपका मिषन धर्म व विज्ञान का सामन्जस्य करते हुए, नई पीढ़ी को धर्म धारा से जोड़ने का है। वर्तमान में, आपके संग मे साध्वी श्री देषना श्री जी, साध्वी श्री चरम श्री जी ; मौनी माता द्ध एवं साध्वी श्री नियाग श्री जी, क्षुल्लिका प्रतिभा पावनी जी, अपनी सेंवाऐं समाज के लिए प्रदान कर रही हैं।

--------------------------------------------------------------
The 2013 Chaturmas of Sadhvi Vaibhavshriji will be at Muzaffar Nagar, Uttar Pradesh
She can be Contacted on Telephone Number : 78-3489-7900 & 88-7739-7453
--------------------------------------------------------------

Mail to : Ahimsa Foundation
www.jainsamaj.org
R220613



Related Articles

Related
पीढ़ियों के बीच अंतर: समझ और समन्वय की आवश्यकता
पीढ़ियों के बीच अंतर: समझ और समन्वय की आवश्यकत...
Read Article
Related
संबंध एवं भावनात्मक जुड़ाव: सशक्त समाज की आत्मा
संबंध एवं भावनात्मक जुड़ाव: सशक्त समाज की आत्à...
Read Article
Related
वरिष्ठों का अनुभव एवं योगदान: सुशासन की आधारशिला
वरिष्ठों का अनुभव एवं योगदान: सुशासन की आधारशà...
Read Article